नस्लीय बर्बरता और हिंसा की वजह से सुर्खियों का हिस्सा बने बांग्लादेश में भारतीय विदेश सचिव के दौरे के बाद आशंकाओं का बादल अब और भी साफ होने चला है। कहना गलत नहीं होगा कि वो जो कातिल है वही निज़ाम वही मुंसिफ है वो क्या ख़ाक हिन्दू अल्पसंख्यकों के हक़ में फैसला लेगा। बांग्लादेश की राजधानी ढाका में वार्षिक द्विपक्षीय वार्ता में हिस्सा लेने पहुंचे भारतीय विदेश सचिव विक्रम मिसरी की यात्रा के परिणामो के लेकर जिस तरीके के कयास लगाए जा रहे थे ठीक वैसा ही फलाफल निकल कर सामने आया है।
दरअसल, बांग्लादेश में हो रहे अल्पसंख्य हिन्दू उत्पीड़न पर भारतीय विदेश सचिव की बेलाग और वाज़िब बयान पर अंतरिम सरकार के निज़ाम यूनुस और उनके प्रशासन ने इसे बांग्लादेश का आंतरिक मामला भर कहकर अपनी मंशा और योजना दोनों जाहिर कर दी है। इसी बीच मज़हबी कट्टरपंथी बांग्लादेशी नेताओं के बड़बोलेपन पर पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने भी तल्ख़ पलटवार किया है। बांग्लादेश की अपदस्थ प्रधानमंत्री शेख हसीना ने मोहम्मद यूनुस और उनके शासन को फासीवादी करार देते हुए बांग्लादेशी कानून के मुताबिक निज़ाम और उनके सरपरस्तों का हिसाब करने की कसम उठाई है।
सत्ता के संरक्षण में सम्पूर्ण बांग्लादेश में हिन्दू नरसंहार की वीभत्स योजना पर काम कर रहे कार्यवाह प्रधानमंत्री यूनुस के नोबल पुरस्कार के खिलाफ भी नागरिक समूहों ने नोबेल कमेटी के सामने आपत्ति खड़े किए हैं। इन सभी घटनाक्रमों के बीच बांग्लादेश खबरों की सुर्खियों का हिस्सा है। इन चर्चाओं मे सबसे बड़ी चर्चा फिलहाल वहां के अल्पसंख्यक हिंदू विरोधी चरित्र को लेकर है। ऐसा भी नही है कि यहां ये सब कोई पहली बार हो रहा है।
दरअसल, अतीत में भी यहां के हिंदू समुदाय को यह सब झेलना पड़ा है, लेकिन पांच अगस्त 2024 के बाद से हालात कहीं बुरे है। इस दिन यहां एक अप्रत्याशित मगर सुनियोजित घटना उपरांत निर्वाचित सरकार को अपदस्थ कर दिया गया था तब से बांग्लादेश की बागडोर उन हाथों में है जिनका विश्वास लोकतंत्र एवं मानवाधिकार मे कतई नहीं है और जिसका प्रमाण सत्ता प्रायोजित अनवरत् जारी हिंसा और दमन है।
बात तत्कालीन घटना की करें तो यह एक हिंदू साधु चिन्मय कृष्ण दास के गिरफ्तारी से संबंधित है। पहले इन्हें राष्ट्रद्रोह के आरोप मे फिर इनके सहयोगियों को हिरासत में लिया गया है। यहां तक कि जेल में इन साधुओं को बाहर से भोजन उपलब्ध कराने के नाते भी गिरफ्तारियां हुई है, क्योंकि अपने भोजन संबंधित नियमों के नाते ये कुछ भी और कही का भी खाना नहीं खा सकते हैं। इस नाते कई दिन बिना भोजन के भी इन लोगों ने गुजारा है।
बात इनके आंदोलन की करें तो धार्मिक उत्पीड़न और हिंसा का शिकार हिंदू समुदाय अपने एक आठ सूत्री मांग के साथ देशव्यापी प्रदर्शन कर रहा था। इस दौरान पूरे बांग्लादेश में शांतिपूर्ण सभाओं का दौर जारी था। इसी का चेहरा गौड़ीय वैष्णव परंपरा से संबद्ध संस्था इस्कॉन के चटगांव आश्रम प्रमुख साधु चिन्मय प्रभु थे। ऐसे में बजाय अराजक तत्वों पर अंकुश की जगह शासन ने विरोध के स्वर को कुचलने के लिए ये बर्बर कार्यवाही की है।
इधर, रहा सवाल आरोपों का तो ये मसला न्यायालय के विचार का है, लेकन जिस प्रकार से इसे अनावश्यक तूल दिया गया है वो बेहद खतरनाक है। पूरे देश में हिंदू विरोधी हिंसा का माहौल है। इसी क्रम में एक अप्रत्याशित दुखांत घटना भी घटी है। विरोध प्रदर्शनों के बीच एक मुस्लिम वकील की हत्या हो गई, जिसके उपरांत हिंदू उत्पीड़न का सिलसिला सा पुनः चल पड़ा है और जिसकी परिणति चिन्मय प्रभु के पक्षकार अधिवक्ता के ऊपर आत्मघाती हमला है जिसके उपरांत वो अस्पताल में मौत से जूझ रहे हैं।
यही नही मुस्लिम अधिवक्ता हत्या मे बिला वजह 70 हिंदू वकीलों को आरोपी बनाया गया है। इस नाते भय के कारण कोई भी वकील इनके लिए न्यायालय में खड़े होने को तैयार नहीं हैं। न्यायालय पर मतांध शासन और मजहबी भीड़ दोनों का दबाब है। इस नाते सुनवाई अब जनवरी मे होनी है। यहां न्याय की मांग कर रहे हिंदुओं पर मतांध मुस्लिम भीड़ का टूट पड़ना अब सामान्य बात है। जबकि आपत्ति व्यक्त करने पर प्रशासन उलटे इन्हीं के साथ जोर जबरदस्ती कर रहा है।