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ईवीएम को लेकर विपक्ष का 'सेलेक्टिव' रवैया कितना उचित

सार

अब महाराष्ट्र और झारखंड में विधानसभा चुनाव हुए तो महाराष्ट्र में महायुति, जिसमें भाजपा, शिवसेना (शिंदे) और राष्ट्रीय कांग्रेस पार्टी (अजीत पवार) ने एकतरफा जीत दर्ज की। झारखंड में झारखंड मुक्ति मोर्चा के नेतृत्व में इंडी गठबंधन ने सत्ता में पहले से अधिक बहुमत के साथ वापसी की।
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ईवीएम मशीन। - फोटो : Freepik
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विस्तार
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भारत में विपक्ष चुनाव में अपनी हार स्वीकार करने को तैयार नहीं दिखता। जब उसकी हार होती है तो वो तुरंत इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (ईवीएम) पर सवाल खड़े करने लगता है, लेकिन इस बार महाराष्ट्र में बात इससे आगे बढ़ती दिख रही है। शिवसेना (उद्धव ठाकरे) के विधायकों ने विधानसभा में शपथ का बहिष्कार कर दिया है।

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वो ईवीएम पर सवाल उठा रहे हैं। राष्ट्रीय कांग्रेस पार्टी (शरद पवार) के सुप्रीमो शरद पवार ईवीएम के विरोध को लेकर आयोजित विरोध प्रदर्शन में शामिल हुए हैं। आखिर भारतीय विपक्ष किस दिशा में जा रहा है? चुनाव आयोग क्यों विपक्ष को ईवीएम को लेकर विश्वास नहीं दिला पा रहा है? क्या ईवीएम को लेकर विपक्ष का सेलेक्टिव रवैया उचित है? एक स्वस्थ लोकतंत्र के लिए यह बेहद गंभीर बात है। 

कुछ माह पहले हरियाणा में विधानसभा चुनाव हुए थे। मुख्य विपक्षी पार्टी कांग्रेस अपनी जीत को लेकर पूरी तरह आश्वस्त नजर आ रही थी, लेकिन जब परिणाम आए तो भारतीय जनता पार्टी ने जीत की हैट्रिक लगाते हुए पहले से अधिक सीटों पर जीत दर्ज की। कांग्रेस ने ईवीएम में गड़बड़ी को लेकर चुनाव आयोग की प्रक्रिया पर सवाल उठाने में एक क्षण नहीं लगाया। हालांकि, चुनाव आयोग ने कांग्रेस को न केवल फटकारा, बल्कि कार्यवाही की चेतावनी भी दी।
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अब महाराष्ट्र और झारखंड में विधानसभा चुनाव हुए तो महाराष्ट्र में महायुति, जिसमें भाजपा, शिवसेना (शिंदे) और राष्ट्रीय कांग्रेस पार्टी (अजीत पवार) ने एकतरफा जीत दर्ज की। झारखंड में झारखंड मुक्ति मोर्चा के नेतृत्व में इंडी गठबंधन ने सत्ता में पहले से अधिक बहुमत के साथ वापसी की। झारखंड की जीत को लेकर न तो ईवीएम पर कोई सवाल खड़े हुए और न चुनाव में गड़बड़ी की बात कही गई, लेकिन महाराष्ट्र का नतीजा विपक्ष खारिज करने में जुटा है।

साफ है, भारत में विपक्ष दोहरे मापदंड अपना रहा है। जहां-जहां उसकी हार होती है, वहां-वहां ईवीएम पर सवाल उठाना एक फैशन हो गया है। पश्चिम बंगाल, तेलंगना, कर्नाटक, हिमाचल प्रदेश जैसे राज्यों में जब विपक्षी दल जीते तो एक भी सवाल चुनाव प्रक्रिया पर नहीं उठाया गया। क्या यही विपक्ष का असली चेहरा है? लोकतंत्र में हार-जीत होती रहती है, लेकिन पूरी चुनाव प्रक्रिया पर सवाल उठाना कितना जायज है? शरद पवार कह रहे हैं कि महायुति की जीत को लेकर लोगों में उत्साह नजर नहीं आ रहा है। आखिर उत्साह का पैमाना क्या है? यह भी शरद पवार जैसे वरिष्ठ नेता को बताना चाहिए। 

इसी साल गर्मियों में जब लोकसभा चुनाव हुए थे तो 400 सीटों पर जीत का दावा कर रही भाजपा 240 सीटें ला सकी थी। इंडी गठबंधन ने 233 सीटों पर जीत हासिल की थी। राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) ने नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में सरकार बनाई। विपक्ष आज तक लोकसभा चुनाव के नतीजों को भी स्वीकार करने को तैयार नहीं है। क्या यह देश के वोटरों के साथ धोखा नहीं है? क्या विपक्ष को 233 सीटें ईवीएम में पड़े वोटों से नहीं मिलीं? 

थोड़ा ईवीएम के इतिहास को लेकर चर्चा करते हैं। ईवीएम का सबसे पहले इस्तेमाल वर्ष 1982 में केरल की परूर विधानसभा सीट के 50 मतदान केंद्रों पर हुआ था। वर्ष 1989 में संसद ने लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम 1951 में संशोधन किया और चुनाव में ईवीएम के इस्तेमाल का प्रावधान किया। ऐसा नहीं है कि ईवीएम को एकाएक चुनाव प्रक्रिया में लाया गया। इसके लिए बेहद लंबी प्रक्रिया चली है। वर्ष 1992 में विधि और न्याय मंत्रालय ने कानून के संशोधन की अधिसूचना जारी की।

ईवीएम के इस्तेमाल को लेकर वर्ष 1998 में आम सहमति बनी। 1998 में ही राजस्थान, मध्य प्रदेश और दिल्ली की 25 विधानसभा सीटों पर ईवीएम से चुनाव कराए गए। वर्ष 1999 में 45 सीटों पर ईवीएम का इस्तेमाल हुआ। वर्ष 2000 के बाद देश के सभी लोकसभा, विधानसभा और उप चुनावों में ईवीएम के इस्तेमाल में बढ़ोतरी शुरू हो गई। वर्ष 2001 में तमिलनाडु, केरल, पश्चिम बंगाल और पुडुचेरी की सभी सीटों पर ईवीएम से चुनाव कराए गए। आज सभी चुनाव ईवीएम से कराए जा रहे हैं। 

ऐसा नहीं है, आज का विपक्ष ईवीएम पर सवाल उठा रहा है। ईवीएम हमेशा से विपक्ष के लिए एक राजनीतिक हथियार रही है। वर्ष 2009 के लोकसभा चुनाव में पहली बार भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार लालकृष्ण आडवाणी और तत्कालीन जनता पार्टी के अध्यक्ष सुब्रमण्यम स्वामी ने ईवीए के जरिए चुनाव में धांधली की बात कही थी। स्वामी तो सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गए थे और सुप्रीम कोर्ट ने ईवीएम में वीवीपैट के उपयोग का निर्देश दिया था। 

पिछले दिनों भारतीय विपक्ष ने अमेरिकी उद्योगपति एलन मस्क के एक बयान को लेकर मुद्दा उछाला था, जिसमें मस्क ने ईवीएम पर सवाल उठाए थे। हालांकि, एलन मस्क का इशारा अमेरिका में इस्तेमाल हो रही ईवीएम को लेकर था, जो किसी नेटवर्क से जुड़ी होती है, जबकि भारत में ईवीएम एक स्वतंत्र इकाई होती है, जो किसी नेटवर्क से जुड़ी नहीं होती।

चुनाव आयोग अक्सर ईवीएम को हैक करने की चुनौती देता है, लेकिन आज तक कोई भी विशेषज्ञ या नेता ईवीएम को हैक करने के लिए नहीं पहुंचा है। एलन मस्क ने कुछ दिन पहले भारत में मतगणना को लेकर तारीफ की थी और उन्होंने यहां तक कहा था कि भारत में एक दिन में 64 करोड़ मतों को गिन लिया गया, जबकि अमेरिका जैसे विकसित देश में भी यह संभव नहीं है। 

ईवीएम पर भले राजनीतिक दल सवाल उठा रहे हैं, लेकिन यह कागज के इस्तेमाल से बेहद सस्ता उपाय है। बैलेट पेपर से चुनाव होने के दुष्परिणामों को देश पहले देख चुका है। किस तरीके से बूथ कैप्शन होती थी। लोग बैलेट बाक्स लेकर भाग जाते थे। मतों की गणना में कई दिन लगते थे।

विपक्ष का हार स्वीकार न करना और पूरी लोकतांत्रिक प्रक्रिया पर सवाल उठाना उचित प्रतीत नहीं होता। आज जो पार्टी सत्ता में है, कल वो विपक्ष में होगी और जो आज विपक्ष में है, वो सत्ता में होगा। हमें आगे बढ़ना चाहिए, न की बैलेट पेपर जैसी खर्चीली और लंबी प्रक्रिया की ओर लौटना चाहिए। सभी राजनीतिक दलों को चुनाव आयोग के साथ बैठना चाहिए। ईवीएम पर एकराय होना चाहिए। यही सच्चा लोकतंत्र होगा।

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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