पहले आम चुनाव के समय देश में तीन तरह के 28 राज्य थे
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तीन तरह के 28 राज्य थे तब
पहले आम चुनाव के समय देश में तीन तरह के 28 राज्य थे। इनमें पार्ट-ए के 9 राज्यों में असम, बिहार, बम्बई, मध्य प्रदेश ( पूर्ववर्ती सेंट्रल प्रोविन्सेज), उत्तर प्रदेश (पूर्ववर्ती संयुक्त प्रान्त), पश्चिम बंगाल, मद्रास, उड़ीसा और पंजाब शामिल थे। ये राज्य ब्रिटिश काल में भी गर्वनर के अधीन पूरे प्रान्त हुआ करते थे।
पार्ट-बी श्रेणी के 8 राज्य
इसी तरह पार्ट-बी राज्यों की संख्या 8 थी, जिनमें हैदराबाद, जम्मू-कश्मीर, मध्य प्रदेश, मैसूर, पटियाला एवं पूर्वी पंजाब स्टेट्स यूनियन (पेप्सू), राजस्थान, सौराष्ट्र और त्रावनकोर-कोचीन शामिल थे। ये सब रियासती राज्य थे जिनमें चुनाव के बाद राज्य प्रमुख, कैबिनेट और विधायक बनने थे। इन पार्ट-बी राज्यों में से हैदराबाद, जम्मू-कश्मीर, पेप्सू और राजस्थान में कोई विधायिका नहीं थी। जम्मू-कश्मीर की विशेष परिस्थिति के अलावा बाकी में चुनाव के बाद लोकतांत्रिक प्रकृया शुरू होनी थी।
दिल्ली समेत पार्ट-सी के राज्य
पार्ट-सी के 11 राज्य सीधे भारत सरकार द्वारा प्रशासित थे। इन्हें केन्द्र शासित के बजाय पार्ट-सी राज्य कहा जाता था। इनमें अजमेर, भोपाल, बिलासपुर, कुर्ग, दिल्ली, हिमाचल प्रदेश, कुच्छ या कछ, मणिपुर,त्रिपुरा, विन्ध्य प्रदेश और अंडमान निकोबार द्वीप समूह शामिल थे।
केवल 7 राज्यों में विधान परिषदें थीं
लोकसभा के साथ ही अलग-अलग तरह के राज्यों के चुनाव कराना भी एक जटिल चुनौती थी। उस समय 7 राज्यों में द्विसदनीय विधानमंडल थे। विधानसभा के साथ ही विधान परिषदों के चुनाव भी कराए जाने थे। ऐसे राज्यों में बिहार, बम्बई, मद्रास, पंजाब, उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल और मैसूर राज्य शामिल थे। इनमें बिहार, बम्बई, मद्रास, और उत्तर प्रदेश की विधान परिषदों में 72 सीटें, पश्चिम बंगाल की विधान परिषद में 51 और पंजाब तथा मैसूर की विधान परिषदों में 40 सीटें थीं। इन परिषदों के चुनाव आंशिक रूप से निर्वाचन और मनोनयन से होने थे।
विधायकों पर सांसदों का असमान अनुपात
पहले आम चुनाव के परिसमीन में लोकसभा का एक निर्वाचन क्षेत्र अधिकतम् 7.50 लाख और न्यूनतम 5 लाख की जनसंख्या पर तय हुआ था। लेकिन जनसंख्या का यह मानक पार्ट-सी के राज्यों पर लागू नहीं था। क्योंकि ये राज्य छोटे और कम जनसंख्या वाले थे। उस समय उत्तर प्रदेश विधान सभा की 430 सीटें और लोकसभा की 86 सीटें थीं।
इसी प्रकार मद्रास विधानसभा की 375 सीटें और लोकसभा की 75 सीटें तय थीं। उस समय का परिसीमन भी एक समान नहीं था। उत्तर प्रदेश में एक लोकसभा सदस्य पांच गुना विधायक संख्या पर तय था। जबकि बिहार के 6 विधायकों पर एक सांसद था। बम्बई, उड़ीसा, पंजाब, पश्चिम बंगाल और हैदराबाद राज्यों में 7 विधायकों पर एक सांसद और मध्य प्रदेश, राजस्थान, में 8 विधायकों पर एक सांसद तय था। इसी प्रकार असम, मैसूर त्रावनकोर कोची में 9 विधायकों पर एक सांसद सौराष्ट्र में 10 विधायकों पर तथा पेप्पसू में 12 विधायकों पर एक सांसद की सीट तय थी।
कुछ सीटों पर दो सांसदों का चयन
शुरू में राज्यों की विधानसभाओं और लोकसभा के चुनाव एक साथ होने के साथ ही उस समय अनुसूचित जातियों और जनजातियों के लिए आरक्षित सीटें अलग न हो कर सामान्य सीटों के साथ ही आरक्षण की व्यवस्था 10 सालों के लिए थी। इस तरह पार्ट ए और बी श्रेणी के राज्यों में कुछ सीटों पर सामान्य श्रेणी के प्रत्याशियों के साथ ही आरक्षण वाले प्रत्याशी भी मैदान में थे और एक ही सीट पर मतदाताओं को दो सांसदों का चयन करना था। लेकिन पार्ट सी के राज्यों में यह व्यवस्था नहीं थी।
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