ग्रीष्म ऋतु ने अभी अपना प्रचण्ड रूप दिखाना शुरू ही किया है कि देश के कोने-कोने से हाहाकार की आवाजें आने लगी हैं। मैदानी इलाकों में पारा 48 डिग्री सेल्सियस के आंकड़े को छूकर इंसानी बर्दाश्त की परीक्षा ले रहा है, तो वहीं हमारे पहाड़ों और जंगलों से उठती लपटें यह गवाही दे रही हैं कि स्थिति अब नियंत्रण से बाहर हो चुकी है। कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक, भारत के हरे-भरे फेफड़े यानी हमारे जंगल इस समय भीषण आग की चपेट में हैं।
उत्तराखंड से लेकर सुदूर दक्षिण के जंगलों तक, सिर्फ धुआं नजर आ रहा है। यह केवल पेड़ों का जलना नहीं हैय यह हमारी सभ्यता, हमारी जैव विविधता और हमारे भविष्य का स्वाहा होना है। हिमालय की बर्फीली चोटियों तक पहुंचती ये लपटें इस बात का अलार्म हैं कि यदि हम अब भी नहीं जागे, तो प्रकृति के इस असंतुलन को संभालना असंभव हो जाएगा।
भारतीय वन स्थिति रिपोर्ट 2023 के अनुसार देश के वनावरण का 36 प्रतिशत से अधिक बारंबार अग्नि के लिए प्रवण अनुमानित किया गया। देश के वनावरण का 2.85 प्रतिशत अग्नि के लिए अत्यंत प्रवण था, जबकि 7.85 प्रतिशत अति उच्च प्रवण पाया गया।
लगभग 27.5 करोड़ ग्रामीण आबादी आजीविका सुरक्षा के लिए वनों पर निर्भर है। ये लोग गैर-काष्ठ वनोपज तथा अधिकांश अन्य पारिस्थिक सेवाओं पर आधारित अपनी आजीविका के लिए प्रत्यक्ष रूप से वनों पर निर्भर हैं।
जंगल केवल लकड़ियों का समूह नहीं होते, वे एक अत्यंत समृद्ध, जटिल और संवेदनशील पारिस्थितिकी तंत्र होते हैं। जब जंगलों में आग लगती है, तो सबसे दर्दनाक प्रहार वहां के मूक जीव-जंतुओं पर होता है। इस भीषण आग की लपटों में घिरे असंख्य वन्यजीव, रेंगने वाले प्राणी, दुर्लभ कीट-पतंगे और पक्षी जलकर खाक हो जाते हैं।
बड़ी संख्या में जंगली जानवर अपनी जान बचाने के लिए इंसानी बस्तियों की तरफ भागते हैं, जिससे मानव-वन्यजीव संघर्ष एक नया और हिंसक रूप ले रहा है। वहीं, जो जीव भाग नहीं सकते, जैसे छोटे नवजात शावक, घोंसलों में रखे पक्षियों के अंडे और रेंगने वाले जीव, वे उसी आग की लपटों में हमेशा के लिए विलीन हो जाते हैं।
परिणाम यह हो रहा है कि हमारे समृद्ध जंगल आज पूरी तरह जीवधारियों से विहीन होते जा रहे हैं। इसके साथ ही, कई ऐसी नाजुक और अत्यंत दुर्लभ औषधीय वनस्पतियां इस आग में जलकर हमेशा के लिए विलुप्त होने की कगार पर पहुंच गई हैं।
वैज्ञानिक दृष्टिकोण से देखें तो जंगल हमारी पृथ्वी के ‘‘कार्बन सिंक’’ कहलाते हैं। वे वायुमंडल से भारी मात्रा में कार्बन डाइऑक्साइड को सोखकर उसे अपने भीतर सुरक्षित रखते हैं, जिसे कॉर्बन स्टॉक कहा जाता है। लेकिन जब यही पेड़-पौधे और सूखी पत्तियां धू-धू कर जलती हैं, तो सदियों से जमा यह कार्बन स्टॉक अचानक मुक्त होकर पुनः हमारे वातावरण में फैल जाता है।
यह स्थिति एक खतरनाक वैश्विक दुष्चक्र को जन्म देती है, जहां वनाग्नि से होने वाला कार्बन उत्सर्जन वैश्विक तापमान में और अधिक वृद्धि करता है और यह बढ़ी हुई गर्मी भविष्य में और भी भयंकर सूखे और आग का कारण बनती है।
इस विनाशकारी आग से निकलने वाला ब्लैक कार्बन यानी कालिख, हवा के तेज झोंकों के साथ उड़कर हिमालय के ग्लेशियरों पर जमा हो रहा है। जब सफेद चमकीली बर्फ पर यह काली परत बैठती है, तो बर्फ की सूर्य की किरणों को परावर्तित करने की प्राकृतिक क्षमता काफी कम हो जाती है।
इसके कारण हमारे ग्लेशियर सामान्य से कहीं अधिक तेजी से पिघल रहे हैं, जो आने वाले समय में पहाड़ी और मैदानी इलाकों में भयंकर बाढ़ और उसके बाद बारहमासी नदियों के हमेशा के लिए सूखने का एक बड़ा माध्यम बनेगा।
उत्तराखंड जैसे पहाड़ी राज्यों में यह आग विकराल रूप धारण करके सीधे गांवों और इंसानी बस्तियों के बिल्कुल करीब पहुंच चुकी है। धुएं के घने गुबार के कारण स्थानीय लोगों का सांस लेना दूषित हो गया है, जिससे बच्चों और बुजुर्गों में आंखों में जलन, त्वचा रोग और फेफड़ों की गंभीर बीमारियां तेजी से घर कर रही हैं। इससे भी अधिक हृदयविदारक बात यह है कि इस आपदा में हर साल इंसान भी जानें गंवा रहे हैं।
उत्तराखण्ड के वन मंत्री सुबोध उनियाल के अनुसार पिछले 10 वर्षों में राज्य में 14 हजार से अधिक वनाग्नि कांड हुये और 35 लागों ने अपनी जानें गंवाई हैं। हाल ही में उत्तराखंड में आग बुझाने के प्रयासों के दौरान दो महिलाओं सहित एक फायर वॉचर की दर्दनाक मौत हो गई और कई अन्य लोग गंभीर रूप से झुलसकर घायल हो गए।
यद्यपि गर्मियों के मौसम में तापमान का अत्यधिक बढ़ना, तेज हवाएं चलना और चीड़ के पेड़ों की सूखी पत्तियों का आपस में रगड़ खाना वनाग्नि का एक प्राकृतिक कारण माना जाता है, लेकिन आंकड़े बताते हैं कि नब्बे प्रतिशत से अधिक वनाग्नि की घटनाएं विशुद्ध रूप से मानवीय लापरवाही का ही परिणाम होती हैं। पर्यटकों द्वारा जलती हुई बीड़ी-सिगरेट के टुकड़े लापरवाही से फेंक देना या कैंपफायर को बिना पूरी तरह बुझाए छोड़ देना एक आम बात है।
इसके अलावा, कुछ असामाजिक तत्वों और अवैध शिकारियों द्वारा जानवरों को फंसाने के लिए या भू-माफियाओं द्वारा वन भूमि पर कब्जा करने की नीयत से भी जानबूझकर जंगलों में आग लगा दी जाती है।
यह भी आम धारणा है कि कुछ भ्रष्ट कर्मचारी वृक्षारोपण के फर्जीवाड़े को छिपाने के लिये भी वनाग्नि का सहारा लेते हैं इसलिए हर साल पौधारोपण के जलने के आंकड़े जरूर सामने आते हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में एक पारंपरिक सोच यह भी है कि सूखी घास को आग लगाने से नई घास उगती है, लेकिन वे यह भूल जाते हैं कि यह छोटी सी आग वन्यजीव संसार को तबाह कर देती है।
इस संकट से प्रभावी ढंग से निपटने के लिए हमें सबसे पहला उपाय यह है कि हमें वनों के प्रबंधन में स्थानीय लोगों और वन पंचायतों को सीधे तौर पर सशक्त और जवाबदेह बनाना होगा। जब तक जंगलों के आसपास रहने वाले ग्रामीणों में यह भावना नहीं जागेगी कि जंगल उनकी अपनी अमूल्य संपत्ति हैं, तब तक वनों की वास्तविक रक्षा असंभव है।
इसके साथ ही आधुनिक तकनीक का व्यापक समावेश करना होगा, जिसमें सैटेलाइट इमेजरी, ड्रोन निगरानी और एआई आधारित अर्ली वार्निंग सिस्टम शामिल हैं, ताकि जंगल में आग लगते ही शुरुआती कुछ मिनटों में ही उसकी सटीक पहचान कर उसे फैलने से रोका जा सके।
हमारे फायर वॉचर्स को आधुनिक सुरक्षात्मक गियर, फायर-प्रूफ सूट और उन्नत उपकरण प्रदान किए जाने चाहिए, और अत्यंत दुर्गम पहाड़ी क्षेत्रों में पानी की बौछार करने वाले हेलीकॉप्टरों की तैनाती की जानी चाहिए।
उत्तराखंड में चीड़ की सूखी पत्तियों (पिरुल) को एकत्र कर उनसे बायोमास पेलिट्स या हस्तशिल्प बनाने वाले उद्योगों को बढ़ावा देना चाहिए, ताकि ईंधन को उपयोगी आर्थिक संसाधन में बदला जा सके।
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