कुछ दिन पहले चुनाव की छांव में यह खबर आई थी,“वह नींद में पैर छूते हैं।” तब से सोच रहा हूं और इस नतीजे पर पहुंचा हूं कि यही हमारे देश में संस्कारों की सबसे बड़ी खूबी है। हमारे संस्कार आदमी को कभी अकेला नहीं छोड़ते, सोते समय भी नहीं। दिनभर आदमी कितना ही आधुनिक बना फिरे, रात को बिस्तर पर जाते ही भीतर बैठा हुआ संस्कार विभाग अपनी फाइलें खोल लेता है।
अब यह बात विज्ञान की समझ में आए या न आए, पर हमारे समाज को इसमें कोई आश्चर्य नहीं दिखता। यहां तो जागते हुए लोग कम, सोते हुए ज्यादा सजग पाए जाते हैं। मैंने अपने गांव के गुजरी गुरु से फोन पर पूछा कि लोगों को यह नींद में पैर छूने की आदत कैसे पड़ जाती है?
गुजरी गुरु दार्शनिक अंदाज में बोले, “देखो, दिन में समय नहीं मिलता। सुबह ऑफिस, शाम ट्रैफिक, रात मोबाइल। ऐसे में अगर पैर छूने का संस्कार कहीं अटका रह जाए, तो लोग रात में अपनी ड्यूटी खुद पूरी कर लेते है। यह ‘शास्त्र सम्मत’ है। इसमें कोई हर्ज नहीं है।”
यह सुनकर मुझे लगा कि आने वाले समय में हमारे संस्कारों का पूरा विभाग ‘ऑटोमेटिक’ हो जाएगा। आदमी सोएगा और भीतर बैठा हुआ ‘संस्कार एप’ अपडेट होता रहेगा। सुबह उठते ही नोटिफिकेशन मिलेगा, “आपने रात में तीन बार प्रणाम किया, दो बार क्षमा मांगी और एक बार आशीर्वाद प्राप्त किया। वगैरह-वहैरह।”
यह परंपरा रफ्तार पकड़ ले तो बच्चा सोते-सोते अचानक उठेगा, पैर छुएगा और फिर सो जाएगा। माता-पिता खुश होकर कहेंगे, “देखो, हमारा बेटा कितना संस्कारी है, नींद में भी नहीं भूलता।”
संस्कारों की यह नई तकनीक हमें बहुत दूर ले जा सकती है। तब समाज का मूल्यांकन भी बदल जाएगा।लोग पूछेंगे, “आप दिन में क्या करते हैं?” जवाब मिलेगा, “कुछ खास नहीं।”
फिर पूछा जाएगा, “और रात में?” गर्व से जवाब आएगा, “मैं नींद में पांच लोगों के पैर छूता हूं।”
लेकिन इस मूल प्रश्न में मुझे एक टेक्निकल दिक्कत दिख रही है। जिसका पैर छुआ जा रहा है, वह भी अगर नींद में हो तो? तब यह पूरा संस्कार किस खाते में जाएगा?
हमारे यहां हर क्रिया के साथ प्रतिक्रिया का बड़ा महत्व है। प्रणाम हुआ तो आशीर्वाद होना चाहिए। बिना आशीर्वाद के प्रणाम अधूरा माना जाता है। लेकिन यदि दोनों ही पक्ष नींद में है तो यह लेन-देन कुछ वैसा हो जाता है, जैसे दो बंद बैंक आपस में चेक पास कर रहे हों। यहां असली संकट प्रमाण का है। जागते हुए प्रणाम का गवाह पूरा परिवार होता है, लेकिन नींद में किए गए प्रणाम का गवाह केवल तकिया होता है, जो स्वयं हर रात दबाव में रहता है।
अब कुछ लोग समाधान भी खोज रहे हैं। एक परिवार ने तय किया है कि सोते समय एक व्यक्ति जागता रहेगा, ताकि यदि कोई नींद में पैर छुए तो वह सोए हुए के बदले तत्काल आशीर्वाद दे सके।
लेकिन आप देखियेगा, धीरे-धीरे समाज इस निष्कर्ष पर पहुंचेगा कि नींद में किए गए संस्कारों के लिए अलग से कोई विभाग हो, जहां यह तय हो कि किसका प्रणाम वैध है और किसका आशीर्वाद लंबित। कुछ लोगों ने सुझाव दिया कि सोने से पहले एक रजिस्टर रख दिया जाए। जो भी रात में पैर छुए, सुबह उसमें साइन कर दे। प्रणाम पाने वाला सुबह दूसरे कॉलम में आशीर्वाद लिख दे।
ऐसा नहीं हुआ तो अभी की स्थिति में लोग सुबह उठकर एक-दूसरे से पूछेंगे, “कल रात आपने मेरा प्रणाम स्वीकार किया था या वह अभी भी पेंडिंग है?” और जवाब आ सकता है, “देखिए, मैं तो गहरी नींद में था, आप आज फिर से ट्राई कर लीजिए।”
प्रणाम को हम लोग ‘मिस्ड कॉल’ की तरह नहीं ले सकते। इस मामले में एक नई व्यवस्था लागू करने की भी बात चल रही है, ‘संस्कार एटीएम’। कार्ड डालो, रात में प्रणाम अपने आप हो जाएगा और सुबह मैसेज आएगा, “आपका आशीर्वाद सफलतापूर्वक प्रोसेस हो गया है।”
कुछ न कुछ तो करना ही पड़ेगा। प्रश्न केवल प्रणाम का नहीं, उसके स्वीकार का भी है। अगर ऐसा हो पाया तो शायद, नींद में किया गया प्रणाम ही सबसे सच्चा माना जाएगा, क्योंकि उसमें न दिखावा होगा, न दर्शक, सिर्फ आदत और व्यवस्था का निर्विवाद असर। हालांकि इस मामले में मेरे फोन करने के कुछ देर बाद गुजरी गुरु का उधर से फोन आया। इस मामले में काफी मनन करने के बाद वह विचलित हो गए थे। उन्होंने मुझसे पूछा कि अगर सम्मान भी अब नींद में ही होना है तो जागते हुए हम आखिर कर क्या रहे हैं?
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