भारत के स्वाधीनता संग्राम के इतिहास में सन् 1893 का साल कई दृष्टि से काफी महत्वपूर्ण रहा है। सन् 1893 में स्वामी विवेकानंद जी का शिकागो के विश्व धर्म सम्मेलन में भाषण, महर्षि अरविंद का इंग्लैण्ड से भारत वापसी, महात्मा गांधी का दक्षिण अफ्रीका प्रस्थान और एनी बेसेंट का भारत आगमन। इन चारों विभूतियों में एक सामान्य बात यह है कि ये भारत की सुप्त आध्यात्मिक परंपरा को जागृत कर विश्व को एक नई सभ्यता-संस्कृति से परिचित कराना चाहते थे, ताकि भारत समेत दुनिया को पश्चिम की पतनशील सभ्यता-संस्कृति से मुक्ति की राह मिल सके।
स्वामी विवेकानंद दुनिया को यह संदेश देने में कामयाब रहे कि दूसरे देशों में समन्वय वालात् लाने का प्रयत्न किया गया. अर्थात किसी एक ही जाति की संस्कृति को शेष अन्य जातियों पर लादकर। उसके परिणाम स्वरूप एक अल्पकालिक शांतिपूर्ण जीवन की उत्पत्ति हुई और फिर विघटन हो गया।
इसके विपरीत भारत में समस्या जितनी विराट रही, पर्यटन उतना ही सौजन्यपूर्ण रहा और अति प्राचीनकाल से ही विभिन्न समुदायों के रीतिरिवाजों और विशेषकर धर्मों के प्रति सहिष्णुता बरती गई। परिणाम यह हुआ कि अभेद प्रतीत होने वाले दुर्ग भी ढ़हकर खंडहर हो गए, उदाहरण हैं- यूनान,रोम और नार्मन लोग।
महर्षि अरविंद की भी यही राय थी कि भारत अपने अतीत के उदघाटन में अपने भविष्य की आशा देखता है। मानव प्रगति के अगले महान कर्म में भौतिक नहीं, आधात्मिक, नैतिक और अतीन्द्रिय विकास करना है, और इसके लिए स्वतंत्र एशिया तथा उसके अंतर्गत स्वतंत्र भारत को अगुवा होना चाहिए। यहां ध्यान देना जरूरी है कि महर्षि अरविंद की यह घोषणा भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के शुरुआती दिनों की है।
महर्षि अरविंद का 150वां जन्मदिवस
भारत आजाद हुआ 15 अगस्त 1947 को, संयोग से यह तिथि महर्षि अरविंद का 75वां जन्म दिन था, और आज जब भारत अपनी आजादी का अमृत महोत्सव मना रहा है, तो महर्षि अरविंद का 150वां साल भी इसी साल पूरा हो रहा है।
15 अगस्त 1947 को अपने रेडियो संदेश में महर्षि अरविंद घोषणा करते हैं कि यह दिन उनके लिए प्राचीन युग की समाप्ति तथा नए युग के सूत्रपात की निशानी है। एक स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में हम अपने जीवन और क्रियाओं से इस दिन को मानवता के राजनीतिक, सामाजिक, सांस्कृतिक और आधात्मिक भविष्य तथा सम्पूर्ण विश्व के लिए एक नए युग के शुभारंभ का महत्वपूर्ण दिन बना सकते है।
महर्षि अरविंद के क्रांतिकारी राजनीतिक जीवन की आयु कम ही रही है।अलीपुर षडयंत्र मामले में जेल से रिहा होने के बाद 30 मई 1909 को उत्तरपाड़ा के ऐतिहासिक भाषण के बाद उन्हें पहले चंदरपुर और फिर पांडिचेरी जाने का दैवीय आदेश प्राप्त होता है, जो जीवन लीला समाप्ति तक उनकी आधात्मिक और रचनात्मक गतिविधियों का केंद्र रहा। उनकी यह लीला 5 दिसंबर 1950 को पूरी हुई।
यूरोपीय सभ्यता के चमकदार सितारे उनीसवीं सदी के अंतिम दशक तक बिल्कुल धूमिल होने लगे थे। इस तथ्य को पश्चिम के विद्वान भी रेखांकित करने लगे थे। सन् 1891 में मैडम एच पी बलावत्स्की ने 'सभ्यता कला और सौंदर्य की मृत्यु' शीर्षक से लिखे एक लेख, जो उन्होंने अपनी मृत्यु से कुछ ही समय पूर्व लिखा था, उसमें कहा कि- घिनौने कोढ़ की तरह हमारी सभ्यता पूरे विश्व को चारों ओर से खाती चली जा रही है। उसने मनुष्य के ह्रदय को पत्थर बना दिया है। वह शब्दों से परे स्वार्थी, लोलुप और पाशविक हो चुकी है।