1950 ई के दशक में भारत में हिंदुस्तानी संगीत
1950 ई के दशक में भारत में हिंदुस्तानी संगीत के प्रमुख केंद्र उत्तर प्रदेश का बनारस, लखनऊ, रामपुर आदि, मध्यप्रदेश में ग्वालियर, भोपाल, दिल्ली, पंजाब के अनेक क्षेत्र सम्मिलित थे। साथ ही गांधर्व महाविद्यालय की संस्थागत शिक्षा का प्रचार किया जा रहा था। लखनऊ में भातखंडे विद्यापीठ भी बेहतर तरीके से काम कर रहा था।
संगीत के शिक्षण प्रशिक्षण पर सरकार का पर्याप्त ध्यान था। इस हिसाब से यह कहना गलत नहीं होगा कि आजादी के बाद भी संगीत को बरकरार रखने के लिए कई प्रयास किए गए। लेकिन निराशा की बात यह है कि भारत में बदलते दौर के साथ संगीत का स्वरूप भी बदल गया। आज के समय में ज्यादातर गीत व्यावसायिक दृष्टीकोण से रचे जाते हैं, फिर चाहे इसके लिए संगीत के नियमों को तोड़ना ही क्यों न पड़े।
आज हमारे पास संगीत और कला प्रदर्शन के लिए विभिन्न अवसर और मंच उपलब्ध हैं। हर कोई तकनीक और संसाधनों के उचित इस्तेमाल से अपनी कला का प्रदर्शन कर अपनी पहचान बनाने की क्षमता रखता है। लेकिन समय के साथ शास्त्रीय संगीत पर ढीली होती पकड़ ने शास्त्रीय संगीत के ढांचे को कमजोर कर दिया है। इसके लिए सैकड़ों वर्षों की गुलामी को भी जिम्मेदार ठहराया जा सकता है।
जब लोग केवल जीने के लिए भी संघर्ष करते थे, ऐसे में अपनी धरोहरों की रक्षा करना कोई आसान काम नहीं था। हालांकि, आज भी कई ऐसे महान कलाकार हैं, जो लगातार इसका प्रचार प्रसार कर रहे हैं और संगीत को आगे बढ़ा रहे हैं। ऐसे कलाकारों और गुरुओं को हमें नमन करना चाहिए।
शास्त्रीय संगीत की धुंधली पड़ती छवि
एक समय था जब रागों से रोगों का उपचार किया जाता था। एक समय था जब मेघ मल्हार के स्वर आसमान से पानी धरती तक खींच लाते थे। एक समय वो भी था जब मृदंग महर्षि स्वामी पागल दास जी की मृदंग से निकले ताल ने डाकुओं से उनकी जान बचाई थी।
शास्त्रीय संगीत की ताकत को दर्शाने वाली कई ऐसी कहानियां हैं, जिनके बारे में सुनकर यकीन करना मुश्किल होता है। लेकिन यह दुर्भाग्य की बात है कि समय ने इस गहरी छवि को हल्का कर दिया है। आज के समय में शोर शराबे को भी लोगों ने संगीत का नाम दे दिया है। लेकिन वास्तव में भारतीय शास्त्रीय संगीत हमें कई मायनों में बेहतर स्तर प्रदान करता है।
शास्त्रीय संगीत हमें तनाव से मुक्ति दे सकता है। इससे हमारे आस पास एक सकारात्मक ऊर्जा का निर्माण होता है। शास्त्रीय संगीत हमारी जीवनशैली को स्तर प्रदान करता है। इसलिए संगीत सुनने वाले श्रोताओं को हमेशा अच्छी कोटि का संगीत ही सुनना चाहिए। फिर चाहे वह शास्त्रीय संगीत हो या लोकसंगीत।
हम सबको संगीत सीखना चाहिए, लेकिन अगर यह संभव नहीं है तो अच्छा संगीत तो जरूर सुनना चाहिए। यह हमारे जीवन को उच्चतम स्तर प्रदान करता है। इसकी मदद से हम अपनी शक्ति समाज के सृजनात्मक कार्यों में और अधिक सक्रियता के साथ लगा सकते हैं। क्योंकि संगीत से उत्पन्न होने वाली बेहतर मानसिकता, रचनात्मकता, सृजनात्मकता और एकता ही विकसित भारत 2047 का निर्माण करेगी।
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