सबसे मजेदार और अनोखी बात है यहां की तेज हवा। मैच के दौरान ये ठंडी हवा सिहरन पैदा करती है और कई बार ऐसा लगता है कि इतनी तेज हवा के बीच खिलाड़ी सामंजस्य कैसे बिठाते हैं। लेकिन, स्टेडियम में दर्शकों का जिस तरह से ख्याल रखा जाता है वो बीसीसीआई के लिए सीखने लायक बात है।
दुनिया के सबसे अमीर क्रिकेट बोर्ड को ये बात जरूर सोचनी चाहिए कि अगर न्यूजीलैंड जैसे एक छोटे से मुल्क के वेलिंग्टन जैसे शहर में दो क्रिकेट मैदान हो सकते हैं तो भारत में दिल्ली, कोलकाता, बेंगलुरु और चेन्नई जैसे बड़े शहरों में क्यों नहीं 2-3 स्टेडियम हों? क्यों हर साल आईपीएल के 8 मैचों के अलावा, टेस्ट, वन-डे टी-20 और फर्स्ट क्लास मैचों का आयोजन एक ही मैदान पर हो? इस बात का एहसास मुझे वेलिंग्टन में आने के बाद हुआ।
करीब 34 हजार की क्षमता वाला मैदान यूं तो इस मैच के लिए भी पूरा भरा नहीं था, लेकिन भारतीय और स्थानीय समर्थकों के उत्साह और नाच-गाने को देखते हुए इसका आभास भी नहीं हुआ। जो बीस फीसदी जगह खाली रही उसके लिए टिकटें सबसे महंगी थी। स्थानीय लोगों को करीब 97 डॉलर यानि की भारत के मुताबिक लगभग 5 हजार रुपये।
न्यूजीलैंड के मध्य-वर्गीय लोगों के लिए भी ये टिकटें महंगी ही रही। एक और दिलचस्प बात देखने को ये मिली कि ये मैदान रेलवे लाइन से बेहद करीब होकर गया है। यानि दूर-दराज से लोग अपने-अपने प्लेटफॉर्म पर कार पार्क करके मैदान में सीधे एंट्री करते हैं और शहर मैच के दौरान ट्रैफिक की समस्या से वैसे नहीं जूझता है जैसा कि अक्सर फिरोजशाह कोटला में मैच के आयोजन के दौरान दिल्ली में दिखाई देता है।
कुल मिलाकर देखा जाए तो वेलिंग्टन शहर क्रिकेट को एक अलग तरीके से आपसे परिचय कराता है। ऐसा परिचय जिसे आप भूल नहीं सकतें हैं। भारत में ही क्यों दुनिया के कई मशहूर क्रिकेट शहरों से
वेलिंग्टन अपने आप को जुदा करता है। लेकिन, एक बात जो मुझे सबसे ज्यादा हैरान कर गई वो था एक स्थानीय खिलाड़ी ग्रेम स्टीवर्ट से बात-चीत।
स्टीवर्ट लंबे समय तक क्लब क्रिकेट से जुड़े थे और करीब 60 साल की उम्र तक खेल में सक्रिय थे। वो अपनी पत्नी के साथ मैदान के अंदर जा रहे थे। मैंने उनसे पूछा कि आपका पसंदीदा भारतीय खिलाड़ी कौन है तो वो ठहर गए। लेकिन, बड़ी मासूमियत और ईमानदारी से उनका जवाब था वो किसी भारतीय खिलाड़ी को नहीं जानते हैं।
अपने कानों पर मुझे ये यकीन नहीं हुआ कि आखिर ऐसा कैसे हो सकता है कि एक क्रिकेट प्रेमी मैच देखने के लिए मैदान में आ रहा हो और उसे टीम इंडिया के एक खिलाड़ी तक का नाम पता ना हो! लेकिन, ये सच था। जब मैनें उनसे ये पूछा कि घरेलू टीम में पसंदीदा खिलाड़ी तो उनका जवाब था मार्टिन गप्टिल!
चलते-चलते एक और बात ने मुझे वेलिंग्टन में चौंकाया। न्यूजीलैंड टीम के मीडिया मैनेजर विलि निकोल्स से जब मेरा परिचय हुआ तो मैंने उनसे कहा कि निकोल्स! मैनें यूं ही मजाकिया लहजे में कहा
कि आप हेनरी निकोल्स के रिश्तेदार तो नहीं तो उनका जवाब था- हां मैं उनका भाई हूं। हेनरी पिछले 5 सालों से न्यूजीलैंड के लिए हर फॉर्मेट में खेलतें हैं और ठीक-ठाक सफल भी हैं।
अच्छा है ये न्यूजीलैंड है वरना भारत में तो हितों के टकराव का मामला बन सकता था! हेनरी निकोल्स तो खेलते रहते, लेकिन उनके भाई जो कि मीडिया मैनेजर हैं उनके करियर को लेकर को लेकर कई लोग सवाल जरूर खड़े करते। लेकिन, भारत में भ्रष्टाचार और हितों को टकराव कोई चौंकाने वाली खबर नहीं होती, लेकिन यहां न्यूजीलैंड में ऐसी ईमानदारी है कि कोई ऐसे मुद्दों पर सोचता तक नहीं है। ऐसी ईमानदारी और पारदर्शिता हम भारतीयों को इस छोटे मुल्क से इतनी बड़ी बात सीखने में काफी मदद कर सकती है।
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