गुजरात के लोथल से भी कुछ हवनकुंड मिले हैं। लेकिन यह कालीबंगा से कुछ भिन्न हैं। लोथल की खोज 1954 में की गई थी।
- फोटो : राजेश बादल
भारत का सबसे पुराना बंदरगाह
गुजरात के लोथल से भी कुछ हवनकुंड मिले हैं। लेकिन यह कालीबंगा से कुछ भिन्न हैं। लोथल की खोज 1954 में की गई थी। इसके बाद क़रीब दो साल तक यहां खुदाई चलती रही। लोथल में एक सम्पूर्ण सभ्यता के सारे प्रमाण मिले हैं। साबरमती नदी की एक धारा के माध्यम से यह शहर बंदरगाह से भी जुड़ा था,जहां से अंतर्राष्ट्रीय कारोबार होता था। लोथल की खोज करने वाले एस.आर.राव ने लोथल को मिनी हड़प्पा का नाम दिया है।
यहां धातु-विज्ञान उस समय अत्यंत उन्नत अवस्था में था। इसके अलावा मोती मनके ,सोने और और क़ीमती रत्नों के समंदर पार व्यापार का लोथल बड़ा केंद्र था। अनेक पुरातत्वविद इसे हिन्दुस्तान का सबसे पुराना बंदरगाह भी मानते हैं, किन्तु अधिकृत तौर पर कुछ कहने से मैं बचना चाहूंगा। मोती मनके तैयार करने वाले एक कारख़ाने के प्रमाण भी यहां मिले हैं।
टोनी जोसेफ अपनी "द अर्ली इंडियंस-द स्टोरी ऑफ़ अवर एंसेस्टर्स एंड व्हेयर वी केम फ्रॉम" में लिखते हैं- लोथल के ज़माने से आज दक्षिण एशियाई लोगों के रहन-सहन में कोई ख़ास फ़र्क़ नहीं आया है।
उनके अनुसार लोथल में उत्खनन के दौरान एक कलश मिला था। इसमें आगे कौए का चित्र बना है और पीछे हिरण दिख रहा है। कुछ किस्से-कहानियां जो आज हम अपने बच्चों को बताते हैं, वे शायद वही हैं जो लोथल के लोग अपने बच्चों को बताया करते थे।
राखीगढ़ी और धौलावीरा भारत में उस दौर के श्रेष्ठतम उदाहरण हैं।
- फोटो : राजेश बादल