इन युवाओं की चिंता का सबसे बड़ा कारण तालिबान का अफगानिस्तान की सरकारी सेना के प्रति नफरत और उनका क्रूरतम व्यवहार है।
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अपने परिवारों के लिए चिंतित हैं अफगानी सैनिक
भारत में सैन्य प्रशिक्षण प्राप्त कर रहे इन युवा सैन्य अधिकारियों का भविष्य तो अधर में लटक ही गया, लेकिन अफगानिस्तान में उनके परिवारों की खैरियत को लेकर उनकी बेचैनी भी बढ़ा दी है। उनकी चिंता का सबसे बड़ा कारण तालिबान का अफगानिस्तान की सरकारी सेना के प्रति नफरत और उनका क्रूरतम व्यवहार है।
अब इनका भविष्य भारत सरकार के अगले कदम पर निर्भर है। अगर उनका प्रशिक्षण जारी रखा जाता है तो प्रशिक्षण पूरा होने पर भी उनका भविष्य अधर में है।
अफगानियों का आतंकवादी विरोधी प्रशिक्षण भी भारत में
भारत ने अफगानिस्तान की सेना को सशक्त बनाने के लिए 4 एमआइ-25 सशस्त्र हेलीकॉप्टर एवं 3 चीता हेलीकॉप्टर सहित काफी आधुनिक सैन्य साजो सामान दिया है। विगत् कई वर्षों से भारत अफगानिस्तान के सशस्त्र बलों को आतंकवाद विरोधी प्रशिक्षण भी देता रहा है।
अफगानी युवा अधिकारियों को इन्फेंट्री स्कूल में ‘यंग ऑफिसर्स कोर्स और मिजोरम के वैरेंग्टे स्थित संस्थान में जंगल वॉरफेयर और आतंकवाद विरोधी प्रशिक्षण भी देता रहा है।
ऐसे विशिष्ट संस्थानों में प्रति वर्ष लगभग 700 से लेकर 800 तक अफगानी सैन्यकर्मी प्रशिक्षण पाते रहे हैं। पिछले ही महीने अफगानिस्तान के सेना प्रमुख जनरल वली मोहम्मद अहमदजई का भारत के साथ और अधिक सैन्य सहयोग बढ़ाने के इरादे से भारत आने का कार्यक्रम था, लेकिन तालिबानियों के बढ़ते खतरे को देखते हुए उन्हें अपना दौरा स्थगित करना पड़ा।
अफगानिस्तान की सुरक्षा पर अमेरिका ने खर्चे 83 अरब डाॅलर
भारत के साथ ही अमेरिका ने भी अफगानी सेना का मजबूत, आत्मनिर्भर और किसी भी चुनौती का सामना करने के लिए तैयार करने पर अरबों डॉलर खर्च कर रखे हैं।
न्यूयॉर्क टाइम्स में 13 अगस्त को छपी थाॅमस जिब्बन, फहीम अबेद और शैरिफ हसन की साझा रिपोर्ट के अनुसार अमेरिका ने पिछले दो दशकों में अफगानिस्तान की सुरक्षा के लिए हथियारों, अत्याधुनिक उपकरणों और प्रशिक्षण पर 83 अरब डाॅलर से अधिक राशि खर्च कर डाली। लेकिन वहां के राजनीतिक नेतृत्व की कमजोरी के कारण अफगानी सैनिकों ने तालिबानियों के आगे हथियार डाल दिए, जिस कारण अरबों डॉलर मूल्य के अत्याधुनिक हथियार भी तालिबान के हाथ लग गए।
वहां लगभग 3 लाख की सरकारी सेना लड़ती भी तो किसके लिए? वहां सन् 2001 से लेकर अब तक 60 हजार से अधिक अफगानी सैनिक तालिबान से लड़ते हुए मारे गए। अफगानी राजनीतिक नेतृत्व की कमजोरी के कारण भारत के प्रयास भी बेकार गए।
भारत में अफगानी छात्रों का भविष्य भी अधर में
सैन्य प्रशिक्षुओं की भांति भारत में स्काॅलरशिप के आधार पर पढ़ रहे छात्रों के समक्ष भी गंभीर संकट उत्पन्न हो गया है। भारत में इस तरह के लगभग 2200 छात्र बताए जा रहे हैं। हालांकि उनकी देखभाल की जिम्मेदारी इंडियन काउंसिल फाॅर कल्चरल रिलेसन्श की है, फिर भी उनके देश में मची भगदड़ के कारण उनका भी अपने परिजनों को लेकर चिंतित होना स्वाभाविक ही है।
इनमें से कई छात्रों की शिक्षा की अवधि पूर्ण होने वाली है। ऐसे छात्रों को वजीफा नहीं मिलना है। कई छात्रों की वीजा की अवधि भी पूरी होने वाली है, इसलिए वे भी भारत सरकार के अगले कदम पर निर्भर हैं।
छात्रों के अलावा विभिन्न अन्य क्षेत्रों में आपसी सहयोग के अंतर्गत कार्यरत या प्रशिणरत अफगानी विशेषज्ञों का भविष्य भी अधर में लटका हुआ है।
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