जेमिमा ने आसुओं की एक नई परिभाषा लिखी। उसने यह साबित कर दिया कि रोती हुई लड़की कमजोर नहीं होती। उसके आंसू मुश्किलों का सख्त चट्टानें तोड़कर बहे..।
उलहाना, जिल्लत, अनगिनत तानों की गर्द जमी थी उसके भीतर। वह रोज खुद से लड़ती थी और हार जाती थी। हर रात को वह सोने से पहले रोती थी। जैमिमा ने इस यादगार मैच में आस्ट्रेलिया को नहीं खुद की कमजोरियों को भी हराया।
वह 100-50 रनों के लिए नहीं खेली। उसके बल्ले से निकले चौके-छक्के रन नहीं थे, जवाब थे, हर उन सवालों के, जो रोज उससे पूछा जाते थे। क्या तुम्हारे पिता धर्मांतरण कराते है? तुम अच्छा क्यों नहीं खेल पाती हो? इन सवालों के जवाब शब्दों में नहीं होते थे उसके पास।
इंदौर के होलकर स्टेडियम में 22 अक्टूबर को जब भारत और इंग्लैड के बीच मैच खेला गया तो वह मैदान के बाहर थी। उसे टीम-11 के लायक नहीं समझा गया।
जिंदगी के सबसे मुश्किल दौर से गुजर रही जेमिमा के पास खोने को कुछ नहीं बचा था। उसकी लड़ाई खुद से थी और उसे ही खुद को हराना था। उसे बस मौका चाहिए था। गुरुवार को वह खुशनुमा पल आया। उसे पांच मिनट पहले बताया कहा गया- तुम्हें तीसरे क्रम पर बल्लेबाजी करना है।
उसने खुद को समेटा और आत्मविश्वास का एक ऐसा हिमालय गढ़ा खुद के भीतर और उतर गई मैदान में...।
जेमिमा बल्लेबाजी के साथ झेले गए अपमान, तनाव और कमजोरियों को पीटने उतरी थी। जेमिमा खूब खेली। खूब रोई। इस बार रोती हुई लड़की अच्छी लगी...।
भीगी पलकों के साथ मैच जीतने के बाद निकले शब्द दिल से निकले थे। सुनिए क्या बोली...
मुझे पता ही नहीं था कि मैं नंबर तीन पर बल्लेबाजी करने जा रही थी। मैं तो शॉवर ले रही थी, मैंने बस कह दिया था कि मुझे बता देना। पाँच मिनट पहले, मुझे बताया गया कि मैं नंबर तीन पर जा रही हूँ। यह खुद को साबित करने के बारे में नहीं था, यह भारत को जीत दिलाने के बारे में था, क्योंकि हम पहले ऐसी परिस्थितियों में कई मैच गंवा चुके हैं।
सबसे पहले, मैं ईश्वर को धन्यवाद देना चाहती हूँ, क्योंकि मैं यह सब अकेले नहीं कर सकती थी। मुझे पता है कि उन्होंने ही आज मुझे इस मुश्किल दौर से निकाला। मैं अपनी माँ, पिताजी, कोच और हर उस व्यक्ति का शुक्रिया अदा करना चाहती हूं, जिन्होंने इस दौरान मुझ पर विश्वास किया। यह पिछले कुछ महीने वाकई बहुत मुश्किल रहे, लेकिन यह एक सपने जैसा लग रहा है, और अभी तक पूरी तरह से साकार नहीं हुआ है।
पिछले साल मुझे इस वर्ल्ड कप से बाहर कर दिया गया था। मैं फॉर्म में थी, लेकिन चीजें एक के बाद एक होती गईं, और मैं कुछ भी कंट्रोल नहीं कर पा रही थी। मैं इस पूरे टूर के दौरान लगभग हर दिन रोई हूँ। मैं मानसिक रूप से ठीक नहीं थी, चिंता से जूझ रही थी। लेकिन मुझे पता था कि मुझे बस मैदान पर उतरना है, और ईश्वर सब संभाल लेंगे।"
शुरुआत में, मैं बस फोकस बनाए रखने की कोशिश कर रही थी और लगातार खुद से बातें कर रही थी। लेकिन अंत में, मैं बाइबल की एक आयत दोहरा रही थी, क्योंकि मेरी ऊर्जा खत्म हो चुकी थी, मैं बहुत थक गई थी। वह आयत थी: 'बस स्थिर रहो, और परमेश्वर तुम्हारे लिए लड़ेंगे।' मैं वहीं खड़ी रही, और उन्होंने मेरे लिए लड़ाई लड़ी।"
"जब मैं आगे नहीं बढ़ पा रही थी, तो मेरी टीम की साथी खिलाड़ी मुझे प्रोत्साहित कर रही थीं। दीप्ति (शर्मा) हर गेंद पर मुझसे बात करती रही। ऋचा (घोष) आई और उसने मुझे ऊपर उठाया। मैं खुद इसका श्रेय नहीं ले सकती, मैंने कुछ नहीं किया। हर एक दर्शक जो चीयर कर रहा था, जिसने विश्वास किया, उनके हर रन पर चिल्लाने से मुझे ऊर्जा मिलती थी।"
‘आज का दिन मेरे 50 या 100 के बारे में नहीं था, यह भारत को जीत दिलाने के बारे में था। मुझे लगता है कि ईश्वर ने सब कुछ सही समय पर किया।
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