फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

होली विशेष: बाबा विश्वनाथ की नगरी काशी में मसाने की होली का रंग

सार

ऐसा नहीं है कि होली, ईद, दशहरा, दीपावली कोई पहली बार एक ही दिन पड़ रहा हैं। पर इस बार माहौल में कुछ ज्यादा ही तनाव है। कहीं मस्जिदें ढंकी जा रही हैं, तो कहीं अस्पतालों में हिन्दू और मुसलमानों के लिए अलग-अलग वार्ड बनाए जाने की बात हो रही है।
विज्ञापन
फागुन में होली उल्लास का पर्व (प्रतीकात्मक एआई तस्वीर) - फोटो : अमर उजाला / आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस
विज्ञापन

विस्तार
वॉट्सऐप चैनल फॉलो करें

होली के कई रंग हैं। पर सबरंग मिलाकर जो एक रंग बनता है, वह है अपने -पराये , ऊच- नीच , बड़े -छोटे , पंथ - सम्प्रदाय, भाषा - भूसा,यहां तक कि स्त्री -पुरुष  के भेद को मिटकर एकमेव होने  की प्रवृत्ति।यह प्रवृत्ति दअरसल  देश - काल की परिधि में घटित होने वाली चेतन सत्ता का विस्तार है।

विज्ञापन


इसलिए यह  पृथ्वी  अनेक धर्मों के मानने वाले, अनेक भाषाओं को बोलने  वाले जनों का  निवास स्थान बनी हैं.अथर्ववेद के ऋषि  ने पृथ्वी -सूक्त में इस  तथ्य को पहचाना और बताया कि नानात्व के भीतर छिपी एकता , सहिष्णुता और समवाय के स्वर ही किसी राष्ट्रजीवन का मूलमंत्र है। जीवन का वरदान है।

                            जनं बिभ्रति बहुधा विवाचसं
                                  नाना धर्माणां पृथ्वी यथौकसम् ।।

 

ऋत् और सत् हमारे अस्तित्व काल से विश्व जीवन की नियामक शक्तियां रही हैं।  यही आगे चलकर धर्म कहलाया।धर्म की यहीं परिभाषा वैदिक संहिताकार और महाभारतकार वेदव्यास ने भी किया है।धर्म के विषय में उनका अभिव्यक्त विचार तो स्वर्णाक्षरों में अंकित करने लायक है -

विज्ञापन

                           

                          नमो धर्माय महते धर्मो धारयति प्रजा:।
                             यत्स्याद् धारण संयुक्तं स धर्म इत्युदाहृत:।।


अर्थात् उस धर्म को प्रणाम है, जो सब मनुष्यों को धारण करता है। सबको धारण करने वाला जो नियम है , वहीं धर्म है।धर्म की इस सर्वव्यापी- सर्वस्पर्शी वैदिक  परम्परा से अनजान लोग  ही आनंदोत्सव और हर्षोल्लास के पर्व होली पर तमाम तरह का वितंडा खड़ा कर रहे हैं, जो न उचित है और न विवेक सम्मत ही।

ऐसा नहीं है कि होली, ईद, दशहरा, दीपावली कोई पहली बार एक ही दिन पड़ रहा हैं। पर इस बार माहौल में कुछ ज्यादा ही तनाव है। कहीं मस्जिदें ढंकी जा रही हैं, तो कहीं अस्पतालों में हिन्दू और मुसलमानों के लिए अलग-अलग वार्ड बनाए जाने की बात हो रही है।

फिर भी इस राजनीतिक तनाव से बेफिक्र काशी के मसाने की होली का अपना अलग रंग -ढंग और मिजाज है। बरसाने की लड्डूमार होली और लठमार होली से बिल्कुल अलग। पुण्य कमाने और शारीरिक पवित्रता के अलावा तमाम तरह के  द्वेष और कलुष को जीवन से मिटाने की होली। इस साल कुम्भ से लौटे नागा साधुओं के लिए यह  होली कुछ ज्यादा ही खास है। प्रयागराज में कुम्भ स्नान के बाद ये नागा संन्यासी काशी आते हैं। बाबा विश्वनाथ के दरबार में पाक-साफ होने और चिंता भस्म से अपने को पवित्र करने -

                                         चढ़े खाक बिल्वा पाप अलख निरंजनअपिया।।


भगवान शिव के शक्ति स्वरूप बाबा मसाननाथ के भस्म लगाने भर से हर तरह के पाप  धूल जाते हैं।इसलिए हर छ: साल के बाद कुम्भ स्नान के बाद नागा साधुओं,अघोरियों और किन्नरों के लिए बाबा मसाननाथ की चित्ता की भस्म होली का विशेष महत्व है। इसके  बाद नागा साधु कहां चले जाते हैं, कुछ पता नहीं। इस भस्म होली में वैसे तो गृहस्थों और स्त्रियों को भाग लेने की मनाही है।पर भगवान शिव की शोभायात्रा में हजारों की संख्या में लोग भाग लेते हैं।

काशी में ऐसी मान्यता है कि भगवान शिव रंगभरी एकादशी के दिन माता पार्वती की गौना के बाद द्वादशी के दिन महाश्मशान में अपने गणों के बीच होली खेलने पहुंचते है। उनके पहुंचते ही भूत, प्रेत, पिशाच सब निहाल हो गये। परंपरा के अनुसार  शक्ति स्वरूप बाबा मसाननाथ और मां मसान काली की पूजा की जाती है।

आरती -पूजन के बाद भोग-प्रसाद, लाल- नीला - गुलाल और चिंता भस्म चढ़ाया जाता है। फिर बाबा मसाननाथ की शोभायात्रा निकाली जाती है। होली का यह उत्सव काशी में पांच दिनों तक भिन्न-भिन्न तरीके से  चलता हैं। इसके बाद होली के पहले मंगलवार को 'बुढ़वा मंगल'  का कार्यक्रम आयोजित होता है। इसमें काशी के बड़े-बुजुर्गों का सम्मान किया जाता है।

एक  जमाने में सबसे ज्यादा काशीवासियों को इंतजार रहता था हाल-हाल तक अस्सी चौराहे पर आयोजित होने वाले कवि सम्मेलन का। इस अवसर के लिए बड़े जतन, सूझबूझ, और  साहित्यिक प्रतिभा का पूर्ण प्रदर्शन  करने वाली पत्रिका का प्रकाशन होता रहा है। काशी की परंपरा  को जानने वाले इस पत्रिका को सालभर सहेज कर रखते हैं और बड़े चाव से अपने खास मित्रों के बीच इसका सामूहिक पाठ करते हैं।

यह अवसर साल में भले  एक दिन आता है, पर एक  जगह इकट्ठा होकर काशीवासी साल भर  अन्तरमन में  बसे भड़ास को एक -दूसरे को गाली देकर निकालते रहे हैं। इस कवि सम्मेलन में जिन कवियों  की विशेष तौर पर मांग होती थी, उनमें कुछ प्रमुख नाम हैं- चकाचक बनारसी ऊर्फ रेवती रमण श्रीवास्तव, सूंड़ जी ऊर्फ दान बहादुर सिंह, बेढ़व बनारसी ऊर्फ कृष्ण प्रसाद गौड़, चोंच बनारसी ऊर्फ कामता नाथ पांडेय राजहंस  चोंच और बेधड़क बनारसी ऊर्फ काशी नाथ उपाध्याय।

इनमें से किसी एक के कवि सम्मेलन के संचालन अथवा उपस्थिति मात्र से पर्याप्त भीड़ इकट्ठा होने और  उस कवि सम्मेलन की सफलता की पक्की गारंटी होती थी। इनमें  शायद  ही अब कोई इस दुनिया में बचा हों।काशी के बड़े साहित्यकारों, संगीतज्ञों और रसिकों  के अलावा इन कवि सम्मेलनों  में से आसपास के कई जिलों के कवि बड़े उत्साहपूर्वक भाग लेते हैं।

इस कवि सम्मेलन की खासियत यह होती थी कि देश -विदेश के बड़े - बड़े नेताओं को ऐसी -ऐसी गालियों  से नवाजा जाता हैं कि उसका अर्थ शायद ही किसी शब्दकोश में मिलें।लगभग हर कवि माइक पर बड़े ज़ोर से किसी कविता की एक लाइन पढ़ता  है और बाकी काम वहां उपस्थित जनता के हवाले-   बड़े - बड़े विद्वान तुम्हारी मां ...........  बाकी हजारों की संख्या में उपस्थित जनसमुदाय अगली लाइन खूब जोरों दुहराते हैं।

होली के मिजाज पर हिन्दू कवियों से कुछ कम कविताई मुसलमान कवियों ने नहीं किया है।ख़ासकर राधा -कृष्ण प्रसंग को लेकर अथवा सूफियाना अंदाज में। यह परंपरा अमीर खुसरो की कविता में अपने अंदाज में प्रकट होती है।... 

खुसरो बाजी प्रेम की मैं खेलूं पी के संग। जीत गयी तो पिया मोरे हार पी के संग।।
प्रेम का बंदनवार अमीर खुसरो के यहां कुछ इस रूप में दिखाई देता है -

         

दैया री मोहे भिजोया री, शाह निज़ाम के रंग में।
           कपरे रंगने से कुछ न होवत है, या रंग में मैंने तन को डुबोया री।
           पिया रंग मैंने तन को डुबोया, जाहि के रंग से शोख रंग सनगी।
              खूब ही मल मल  के धोया री, पीर निज़ाम के रंग में भिजोया री।।


फागुन  की बहार  को मशहूर शायर नज़ीर अकबराबादी किस अंदाज में पेश करते है, उसकि एक बानगी -
               

                 कुछ तबले खड़के रंग भरे, कुछ ऐश के दम मुंह चंग भरे।
                कुछ घुंघरू ताल छनकते हों, तब देख बहारें होली की।।
                उस रंग भरी पिचकारी को अंगिया पर तक कर मारी हो।
                 सीनों से रंग ढलकते हों, तब देख बहारें होली की.....।।

 
भक्ति में प्रेम की गहराई की अभिव्यक्ति उन्मुक्त भाव से मीराबाई के पदों में दिखायी देती है।
                           

                          फागुन के दिन चार होली खेल मना रे।।
                          बिन करताल  पखावज बाजै, अणहद झणकार रे।
                          उड़त गुलाल लाल भयो अंबर, बरसत रंग अपार रे।
                            घटके सब पट खोल दिये हैं, लोकराज सब डार रे।
                             मीरा के प्रभु गिरधर नागर चरण कंवल बलिहार रे।।


कबीर के लिए फागुन का रंग इस संसार की मोह-माया से विरक्त होकर पिया से मिलने की घड़ी है - 

                  कोई पिया से मिलावे, सोई पिया की मनमानी।
                  खेलत फाग अंग नहीं मोड़े, सतगुरु से लिपटानी।।
                  इक इक सखियां खेल घर पहुंची, इक इक कुल अरुझानी।
                   इक इक नाम बिना बहकानी, हो रही ऐंचातानी।।


कवि केदारनाथ सिंह के यहां फागुन के दिन उल्लास से भरा मन गीत गाने को चहक उठता है।

                          गीतों भरे दिन फागुन के ये गाये जाने को जी करता।
                           ये कोयल  के बोल उड़ा करते, इन्हें थामे हिया रहता।
                            अनगाये भी ये इतने मीठे, इन्हें गायें तो क्या गायें।
                             ये आते, ठहरते, चले जाते इन्हें पायें तो क्या पायें।।

           
होली के रंग का कुल भाव कटुता, वैर-द्वेष, मानसिक कलुष मिटाने का त्योहार है। यह आपसी सौहार्द और मेल-मिलाप का त्योहार है।यह हर तरह की वैमनस्यता और विषमता को मिटाकर विविधता के बीच एकता कायम करने का त्योहार है। इसकी प्रतिष्ठा शान्ति और सौहार्द से ही कायम रह सकती है। किसी और तरीके से नहीं। इस भावना से ही होली खेलने और मनाने का औचित्य है।

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

और पढ़ें...
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें