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होली और राजस्थान के रंग: दूध-दही से लेकर बारूद से भी खेली जाती है होली, एक नहीं कई रंग हैं त्योहार के

सार

पश्चिमी राजस्थान के बीकानेर में लगभग 300 वर्ष से डोलची (बाल्टी) मार होली खेली जा रही है। इसमें पुरुष ऊंट की खाल से बनी डोलची में पानी भरकर एक-दूसरे पर फेंकते हैं। मेवाड़ की बारूद की होली विश्व प्रसिद्ध है। उदयपुर से करीब 45 किलोमीटर दूर मेनार गांव में जमराबीज पर जबरी गेर के नाम से यह अनूठी होली खेली जाती है। मेवाड़ की इस होली में रंग नहीं, बारूद इस्तेमाल होता है। बंदूकों और तलवार की आवाज से युद्ध जैसे दृश्य देखने को मिलते हैं।
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जालोर के आहोर में पत्थर मार होली खेली जाती है, जिसे भाटा गेर भी कहते हैं - फोटो : Adobe Stock
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विस्तार
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भारत के अन्य राज्यों की भांति राजस्थान में होली की अलग-अलग परंपराएं हैं। राज्य में अबीर-गुलाल से लेकर बारूद की होली भी विश्व प्रसिद्ध है। राज्य का डीग क्षेत्र ब्रजभूमि का ही हिस्सा है। डीग के गुलाब कुंड को होली का उद्गम स्थल माना जाता है। ऐसी मान्यता है कि जब भगवान कृष्ण ने अपने श्याम वर्ण को लेकर माता यशोदा से प्रश्न किया था, तब माता ने गोपियों और राधा के साथ होली खेलने की सलाह दी थी और तभी से यह परंपरा शुरू हुई। आज भी यहां पर लट्ठमार होली बरसाना और नंदगांव की तर्ज पर खेली जाती है। 

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पश्चिमी राजस्थान के बीकानेर में लगभग 300 वर्ष से डोलची (बाल्टी) मार होली खेली जा रही है। इसमें पुरुष ऊंट की खाल से बनी डोलची में पानी भरकर एक-दूसरे पर फेंकते हैं। मेवाड़ की बारूद की होली विश्व प्रसिद्ध है। उदयपुर से करीब 45 किलोमीटर दूर मेनार गांव में जमराबीज पर जबरी गेर के नाम से यह अनूठी होली खेली जाती है। मेवाड़ की इस होली में रंग नहीं, बारूद इस्तेमाल होता है। बंदूकों और तलवार की आवाज से युद्ध जैसे दृश्य देखने को मिलते हैं।


होली के दिन पांच महलों से ओंकारेश्वर चौक पर मेवाड़ी पोशाक में सज-धजकर योद्धा हवाई फायर और तोपों से गोले दागते हैं। मध्य रात्रि को तलवार की जबरी गेर भी खेली जाती है। बारूद से होली की यह परंपरा पिछले 400 साल से अधिक वर्षों से चली आ रही है। बारूद की होली के लिए पूरे गांव को दुल्हन की तरह सजाया जाता है।

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राजस्थान का इतिहास लिखने वाले इतिहासकार कर्नल जेम्स टॉड ने भी मेनार गांव का उल्लेख अपनी किताब 'एनाल्स एंड एंटीक्विटीज ऑफ राजस्थान' में मनिहार नाम के गांव से किया है। गांव का संबंध महाराणा प्रताप के पिता उदय सिंह से भी जुड़ा हुआ था। 

जालोर के आहोर में पत्थर मार होली खेली जाती है, जिसे भाटा गेर भी कहते हैं। इसमें दो गुट एक-दूसरे पर पत्थर फेंकते हैं। ऐसी मान्यता है कि देवी के वरदान से चोटें सात दिन में ठीक हो जाती हैं। यह परंपरा 100 साल से अधिक पुरानी है, जिसे आज भी गांव के लोग निभा रहे हैं। नाथद्वारा में होली से पहले नंद महोत्सव होता है, जिसमें दूध और दही से होली खेलने की एक परंपरा है। श्रीनाथजी को केसर मिश्रित दूध-दही से भोग लगाया जाता है और फिर भक्तों पर इसका छिड़काव किया जाता है।

राजस्थान में सहरिया जाति की होली दुनियाभर में अपने अनोखे अंदाज के लिए प्रसिद्ध है। सहरिया जाति स्वांग नृत्य, परंपरागत् फाग व रसिया गीत गाते हैं, जिसमें राम-रावण युद्ध, कृष्ण लीला आदि से संबंधित प्रसंग होते हैं। ढोल, मटकी, नागरी, मजीरा जैसे पारंपरिक वाद्य यंत्रों का उपयोग किया जाता है। सहरिया स्वांग की विशेषता यह है कि शरीर पर गुलाल लगाकर नृत्य किया जाता है। सहरिया क्षेत्र के गांव में होली से 8 दिन पहले ही लोग रात-रात भर फाग गाते हैं।

जोधपुर के प्राचीन गंगश्याम मंदिर में फागुन मास की शुरुआत से रंग पंचमी तक 40 दिनों तक होली खेली जाती है। भगवान कृष्ण के सामने होली के गीतों के साथ अबीर गुलाल और फूलों का प्रयोग होता है।


डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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