सत्यजित राय से कौन भारतीय सिने-प्रेमी परिचित नहीं है। अधिकांशत: उनके निर्देशक रूप एवं उनकी फिल्मों की चर्चा होती है। उनकी पहली फिल्म ‘पथेर पांचाली’ ने भारतीय फिल्मों को दुनिया के सिने-मानचित्र पर अंकित कर दिया। शायद यह बहुत कम लोगों को ज्ञात होगा कि उन्होंने तकरीबन अपनी सब फिल्मों का स्क्रीनप्ले लिखा। इतना ही नहीं, अक्सर वे संवाद भी खुद लिखते और सिनेरिओ भी तैयार करते थे।
वे बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे उन्होंने कहानियां लिखी, फिल्मों का संगीत बनाया, अपनी और दुनिया के कई अन्य निर्देशकों की फिल्म कला पर लेखन किया। उन्होंने बहुत तरह का लेखन किया मगर यहां उनके स्क्रिप्ट लेखन के विचार को ही लिया गया है।
उन्होंने अपनी फिल्म बनाने की प्रक्रिया पर कई स्थानों पर लिखा और कई स्थानों पर उससे संबंधित बात की है। हाल ही में उनके बेटे के द्वारा संपादित एक किताब आई है ‘सत्यजित राय मिसलेनी’। इसमें एक खंड खासतौर पर उनके स्क्रेनप्ले लेखन पर है। इसमें वे बताते हैं कि बहुत कम सिने-निर्देशक अपनी स्क्रिप्ट स्वयं लिखते हैं। जो लिखते हैं उनमें से वे बर्गमैन, फेलिनी, एन्टोनिओनी आदि का नाम लेते हैं।
उनके अनुसार अधिकतर निर्देशक संवाद लिखने के लिए भी लेखकों को रखते हैं। उनका विचार है, निर्देशक को स्वयं स्क्रिप्ट लिखनी चाहिए। मेरा मानना है कि सबके पास सब तरह की कुशलता नहीं होती है, यदि आवश्यकता हो तो दूसरों से सहायता लेनी चाहिए।
सत्यजित राय जबसे फिल्म बनाने लगे अपना सिनेरिओ स्वयं लिखने लगे, बल्कि वे फिल्म बनाने के पहले से स्क्रीनप्ले लिख रहे थे। सबसे पहले उन्होंने रेने क्लैयर की स्क्रिप्ट देखी थी, फिल्म का नाम था, ‘द घोस्ट गोज वेस्ट’। यहीं से उन्हें समय काटने केलिए स्क्रीनप्ले लिखने का विचार मिला। यह काम वे समय काटने केलिए और अपने शगल केलिए करने लगे।
जिस साहित्यिक कृति पर फिल्म बनाए जाने की घोषणा होती उस पर लेखन करते और जब वह फिल्म देखते तो अपने लिखे से उसकी तुलना करते। यह कार्य उन्हें काफी रचनात्मक लगता परंतु जब उन्होंने अपनी पहली फिल्म ‘पथेर पांचाली’ बनाई तो कोई लिखित स्क्रिप्ट नहीं थी लेकिन सारा कुछ उनके दिमाग में स्पष्ट था। वे कहते हैं सिनेमा रीडिंग केलिए फिल्म देखते हुए अंधेरे में नोट्स लेते रहते थे। वे यह विभिन्न निर्देशकों की खासकर अमेरिकन निर्देशकों जैसे फोर्ड, काप्रा, हुस्टन की फिल्म देखते हुए करते थे।
स्क्रिप्टराइटिंग-फिल्मों को लेकर एकाग्रता का भाव
शुरू में अक्सर स्क्रिप्टराइटिंग के लिए वे घर से दूर कहीं एकांत में चले जाते, पत्नी और बेटे को भी संग न ले जाते। वे किसी समुद्र किनारे होटल जैसे गोपालपुर, पुरी आदि स्थान में बैठ कर यह काम करते। किसी की सहायता न लेते और दिन में सोलह-सत्रह घंटे काम करते। ऐसा करते हुए वे कम समय में काफी काम समाप्त कर लेते थे। हालांकि जब वे लौट कर फिल्म बनाते तो सारा कुछ उनके दिमाग में होता। उन्हें अधिक-से-अधिक दस दिन लगते थे सिनेरिओ बनाने में। वैसे अंत तक संवाद में परिवर्तन और इम्प्रोवाइजेशन चलता रहता। बाद में उन्हें पता चला आवाज से बचना मुश्किल है अत: वे हल्ला-गुल्ला के बीच में लिखने के आदि हो गए।
वे स्क्रिप्ट लिख रखने के फायदे बताते हैं, इसका सबसे बड़ा फ़ायदा है पैसों की बचत यदि स्क्रिप्ट नहीं है तो अक्सर शूटिंग के दौरान काफ़ी कुछ दोबारा शूट करना पड़ता है जिससे बजट असंतुलित हो जाता है। उन्हें सबसे कम शूटिंग ‘कंचनजंघा’ फिल्म के दौरान करनी पड़ी। यह फिल्म रंगीन थी, अत: मंहगी थी, इसलिए भी वे अधिक सावधानी से, अधिक अनुशासन के साथ शूटिंग कर रहे थे।
इस फिल्म के साथ एक और बात थी, उनके पास कुशल-अनुभवी अभिनेता छबि बिश्वास थे, वे सत्यजित राय के काम करने के तरीके से भली-भांति परिचित थे। अभिनेता पहले से तैयारी करके आते अत: इस फिल्म की शूटिंग में कम समय और कम खर्च लगा। नए अभिनेता भी अच्छे थे जल्द सीख रहे थे। मगर पहली ‘पथेर पांचाली’ का केस भिन्न था। उसके बनाते समय कई बार सही परिणाम पाने के लिए उन्हें सही पल पकड़ने के लिए उन्हें एक दर्जन टेक लेने पड़े।