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विश्व सिनेमा की जादुई दुनिया: रोजेटा- सार्थकता की तलाश वाली फिल्म

सार

बिना तड़क-भड़क वाली इस फिल्म रोजेटा को दो भाइयों जीन-पियरे डार्डेन तथा लुक डार्डेन ने मिलकर निर्देशित किया है। इसका स्क्रीनप्ले भी दोनों भाइयों ने मिल कर लिखा है। 1999 कान फिल्म समारोह इसका प्रथम प्रदर्शन हुआ।
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1999 में बनी फिल्म ‘रोजेटा’ - फोटो : Twitter
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विस्तार
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किसी फिल्म के लिए पुरस्कारों से बढ़ कर सम्मान है यदि वह समाज में कोई बदलाव लाने में सहायक हो पाती है। अगर कानून में परिवर्तन लाने जैसा कार्य कोई फिल्म कर पाती है, तो इससे बड़ी बात क्या होगी? बेल्जियम की एक यथार्थवादी फिल्म ने वहां के कानून में बदलाव ला दिया। वहां किशोरों को काम का समान वेतन नहीं मिलता था, नए कानून ने यह असमानता समाप्त कर दी। साथ ही युवाओं के लिए मजदूर नियमों में कई अन्य सुधार भी हुए। एक फिल्म अगर ऐसा कर पाती है तो उसे किसी अन्य सफलता की जरूरत नहीं है। इस फिल्म में न कोई स्पेशल इफेक्ट प्रयोग किया गया है, न ही नाच-गाना है। फिर भी प्रदर्शित होने पर इसे खूब जमकर प्रशंसा मिली।

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प्रेस तथा समीक्षकों ने इस बिना म्युजिकल स्कोर की फिल्म की जम कर तारीफ की है। एक और विशेषता है, इस फिल्म की, इसमें पूरा फिल्मांकन हाथ में कैमरा ले कर किया गया है। बिना किसी शक के इस बहुत छोटी-सी यूरोपियन फिल्म को कला फिल्म की संज्ञा दी जा सकती है।

आखिर एक व्यक्ति अपने जीवन में क्या चाहता है? खाना-कपड़ा-मकान मूलभूत आवश्यकताएं हैं। इनके अलावा उसे थोड़ा-सा प्यार और थोड़ा-सा सम्मान चाहिए होता है, थोड़ा-सा अपनापन चाहिए होता है। पर सबको यह कहां मिल पाता है? इन छोटी-छोटी खुशियों के लिए भी कई लोगों को आजीवन संघर्ष करना पड़ता है। दुर्भाग्य उनके पीछे हाथ धो कर पड़ा रहता है।
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खाने के लिए रोज खुद ही इंतजाम करना पड़े, घर के नाम पर ‘द ग्रैंड कैनियन’ के ट्रेलर पार्क में उठाऊ घर हो, परिवार-अपनों के नाम पर एक पियक्कड़ मां हो, जिसका फायदा आस-पास के लोग उठा रहे हों। सम्मान के नाम पर काम की जगह से बिना किसी गलती के भगा दिया जाए, निकाल दिया जाए। आखिर जीवित रहने के लिए कितना संघर्ष करेगा एक व्यक्ति? वह भी मात्र 17 साल का बच्चा। बच्चा नहीं बल्कि बच्ची। कोई सहारा नहीं, कोई आसरा नहीं। पूरी दुनिया से अपने अस्तित्व, अपने सम्मान के लिए लड़ती अकेली लड़की।


1999 में बनी फिल्म ‘रोजेटा’

मैं बात कर रही हूं 1999 में बनी फिल्म ‘रोजेटा’ की। 17 साल की रोजेटा (एमिली डेक्वीन) को फूड प्रोसेसिंग कंपनी से निकाल दिया गया है। वह फूड प्रोसेसिंग प्लांट के मालिक, सुरक्षा गार्ड और पुलिस से लड़ती है कि उसे क्यों निकाला जा रहा है। वह काम करना चाहती है। कोई उसकी एक बात नहीं सुनता है और उसे निकाल कर बाहर फेंक दिया जाता है। वह काम की तलाश में कई दरवाजे खटखटाती है, हर जगह से नकारात्मक उत्तर मिलता है।

कभी पुराने, रफू किए कपड़े बेचती है, कभी कुछ और करती है। ट्रेलर पार्क के अपने घर आती है तो नशे में धुत्त मां (एन येरनॉक्स) वहां के जेनिटर के साथ शारीरिक क्रिया में रत है। भाड़ा नहीं दिया गया है अत: पानी काट दिया गया है। रोजेटा रकम भर कर पानी का कनेक्शन लेती है।
 

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‘रोजेटा’ फिल्म का दृश्य - फोटो : Twitter

परिस्थितियों से जूझती बच्ची की कहानी

बच्ची रोजेटा रात को सोते समय खुद से जो कहती है, वह उसकी आंतरिक दृढ़ता का परिचय देता है। वह अपनी मां की तरह का जीवन नहीं बिताना चाहती है। उसे एक अच्छे साफ-सुथरे जीवन की तलाश है। सोने से पहले वह खुद से कहती है, ‘तुम्हारा नाम रोजेटा है, मेरा नाम रोजेटा है। तुम्हें एक काम मिल है। मुझे एक काम मिला है। तुम्हें एक दोस्त मिला है, मुझे एक दोस्त मिला है। तुम्हारी एक सामान्य जिंदगी है। मेरी एक सामान्य जिंदगी है। तुम कीचड़ में नहीं पड़ोगी, मैं कीचड़ में नहीं पड़ूंगी। गुड नाइट-गुड नाइट।’ अच्छी जिंदगी पाने के लिए एक स्थाई आमदनी होनी जरूरी है इसके लिए रोजेटा दर-दर भटक रही है। रोजेटा का नैतिक बल बहुत उच्च है। इसी कारण वह गलत काम करने को कभी राजी नहीं होती है।

यहां उल्टी गंगा बह रही है। बच्ची वयस्क की भूमिका में है। बड़ों का दायित्व निभाते हुए बेटी मां को संभाल रही है। उसे भागने से रोक रही है। मां है कि बेटी को चहबच्चे में ढ़केल कर भाग जाती है। बेटी मां, मां, मुझे बचाओ, पानी-कीचड़ से निकालो चिल्लाती रह जाती है और नशे में धुत्त मां भाग जाती है। रोजेटा की दृष्टि सदा नीचे झुकी रहती है। सिर झुकाए सदा दौड़ती-भागती रोजेटा को देख कर एरिना में साढ़ की याद आती है।

वह आक्रमण को तत्पर रहता है, रोजेटा दुनिया में अपनी जगह बनाने को संघर्षरत है। जब कभी वह आंख उठा कर देखती है तो क्या उसकी दृष्टि में होती है, हताशा, निराशा और होती है एक तड़फ। डेढ़ घंटे की इस फिल्म में नायिका का अधिकांश समय दौड़ते हुए बीतता है। मुश्किल है इस लड़की को जब-तब भयंकर पेट दर्द उठता है, बीमारी क्या है?

बच्चा जब परिवार-समाज के बीच बड़ा होता है तो वह संबंध बनाना, निभाना सीखता है। कह सकते हैं कि रोजेटा परिवार-समाज, रिश्तेदार-दोस्त विहीन बड़ी हुई है इसीलिए जब बेकरी स्टोर में काम करने वाला युवक रिक्वेट (फैबरिज़िओ रोन्गीवन) उसकी ओर दोस्ती का हाथ बढ़ाता है, तो रोजेटा इसके लिए तैयार नहीं है। जॉब पाने के लिए वह रिक्वेट की जान लेने की बात सोचती है। यह बेल्जियम फिल्म फ्रैंच भाषा (इंग्लिश सबटाइटिल्स) में है।


कान फिल्म समारोह में प्रदर्शन

बिना तड़क-भड़क वाली इस फिल्म रोजेटा को दो भाइयों जीन-पियरे डार्डेन तथा लुक डार्डेन ने मिलकर निर्देशित किया है। इसका स्क्रीनप्ले भी दोनों भाइयों ने मिल कर लिखा है। 1999 कान फिल्म समारोह इसका प्रथम प्रदर्शन हुआ और इस नवयथार्थवादी फिल्म को पॉम ड’ओर पुरस्कार मिला, नायिका एमिली डेक्वीन को कान समारोह में सर्वोत्तम अभिनेत्री का पुरस्कार मिला। इसके अलावा तमाम अन्य पुरस्कार भी इसकी झोली में आए।

शायद सारे दर्शकों को यह न जंचे, मगर बहुतों को खूब जंचेगी। रोजेटा की मुसीबतों का अंत नहीं है, फिल्म में रोजेटा को देखते हुए दर्शक तहे दिल से चाहने लगता है कि किसी तरह उसकी परेशानियां समाप्त हो जाएं। दर्शक चाहता है कि उसे नौकरी मिल जाए, उसे दोस्त मिल जाएं, उसका जीवन सामान्य हो जाए ताकि वह गुड नाइट कह कर आराम से सो सके। यथार्थ जीवन में ऐसा कहां होता है, फिल्म की बात और है। रोजेटा फिल्म को नि:संदेह महान क्लासिकल फिल्म की श्रेणी में रखा जा सकता है।



डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदाई नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।
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