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विश्व सिनेमा की जादुई दुनिया: मंगोलिया का सिनेमा, दक्षिण एशिया से हटकर

सार

मंगोलिया की फिल्में एक भिन्न दुनिया में ले जाती हैं। यहां की दुनिया, भाषा, संस्कृति सब अलग है। प्राकृतिक दृष्टि से भी यह देश भिन्न है, यहां तमाम तरह के आदिवासी अभी भी हैं। मंगोलिया में कहानी-कहन की अनोखी और संमृद्ध परम्परा है। यहां सजीव ड्रामा, एतिहासिक गाथाएं, लोक कथाएं फिल्म में गूंथी जाती हैं।
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मंगोलिया की फिल्मों का इतिहास - फोटो : Twitter
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विस्तार
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एशिया के कई देशों का सिनेमा भारत के सिनेमा से प्रभावित और प्रेरित रहा है, पर मंगोलिया का सिनेमा उससे हट कर है। मंगोलिया के सिनेमा पर भारत का नहीं बल्कि रूस का प्रभाव रहा है और इसी कारण यहां का सिनेमा एशिया के अन्य देशों से भिन्न है। पूर्वी एशिया का यह पठारी, बड़ा देश चारो ओर से दूसरे देशों- रूस, चीन आदि से घिरा हुआ है।

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अगर हम मंगोलिया के सिने-इतिहास की बात करें, तो इसका प्रारंभ 1903 से माना जाता है। मगर बहुत खंगालने पर भी यहां के सिनेमा पर अधिक सामग्री प्राप्त नहीं होती है। पहले यह निजी प्रदर्शन के रूप में विकसित हुआ, मगर सोशलिस्ट आंदोलन के बाद, मंगोलिया की पीपुल’स रिवलूशनरी पार्टी ने अपनी पांचवीं पार्टी कॉन्ग्रेस (1925) में सिनेमा को जन-शिक्षा के माध्यम के रूप में प्रयोग करने का निर्णय लिया।

1926 से घुमंतु सिनेमा यहां निरंतर सोवियत फिल्में दिखाने लगे। पहले-पहल स्थाई सिनेमा 1934 में राजधानी में खुला। आज इस शहर को लंबटॉर (Ulaanbaatar) कहा जाता है। धीरे-धीरे स्थाई सिनेमा जमता गया और घुमंतु सिनेमा नेग्डेर मंक्स- जिन्हें मंगोल्स भी कहते हैं, के यहां सिमट कर रह गया। लेकिन नब्बे के दशक में दोनों तरह के सिनेमा थियेटर ठप्प हो गए, उनके क्रिया-कलाप कम हो गए।

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‘द नेशनल फिल्म स्टूडियो’ की स्थापना

मंगोल कीनो अर्थात ‘द नेशनल फिल्म स्टूडियो’ की स्थापना 1935 में हुई। इसकी स्थापना में सोवियत यूनियन का तकनीक सहयोग रहा। इसने पहले मई दिवस के लिए डॉक्युमेंट्री बनाई और इनकी पहली फीचर फिल्म ‘संस ऑफ मंगोलिया’ थी, जिसका निर्देशन रूस के इलया ट्राउबर्ग तथा मंगोलिया के डेम्ब्रेरेल बार्डैन ने मिल कर किया था।

‘नोर्जमाजिन जाम’ किसी मंगोलियन द्वारा निर्देशित पहली फिल्म है। इसे 1938 में वैर्धान ने प्रड्यूस किया, इस लघु श्वेत-श्याम फिल्म के विषय में खास जानकारी नहीं मिलती है। इसके बाद मंगोलिया में प्रोपेगंडा तथा प्राचीन लोककथाओं पर आधारित फिल्में बनने लगीं, क्योंकि उस समय देश रूस के नियंत्रण में था। ‘सुखबातार’ (1942) तथा ‘सोग्त तैजी’ (1945) इस समय की प्रमुख फिल्में हैं। मंगोल कीनो स्टूडियो ने डॉक्युमेंट्री तथा तत्कालीन खबरों पर रिपोर्ट भी बनाईं।

द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद पार्टी ने अपना ध्यान कामगर नायकों की ओर केंद्रित किया, नतीजन सेवेनी जैन्ड्रा निर्देशित ‘शिन जिल’ (1954), एस. जेंडेन कृत ‘सेरेल्ट’ (1957) तथा ‘द रिजेक्टेड गर्ल’ जैसी फिल्में बनीं। मंगोलिया में पहली म्युजिकल कॉमेडी 1955 में बनी, इस तरह की फिल्में साठ के दशक तक बनती रहीं।

‘द गोल्डेन यर्ट’ (1961) यहां बनने वाली पहली रंगीन फिल्म है, जो एक लोककथा पर आधारित है। इसे एल. मोर्डोर्जी ने लिखा है और यह पूर्वी जर्मनी की सहायता से निर्मित हुई है। इसका संगीत भी पूर्वी जर्मनी के रेडियो ऑर्केस्ट्रा ने तैयार किया और रिकॉर्डिंग भी इसी रेडियो स्टूडियो में हुई। जल्द ही यह क्लासिकल मंगोलियन सिम्फनी बन गया। इसमें सिनेमा की कई तकनीक का प्रयोग किया गया है। 
 

सत्तर के दशक का सिनेमा

सत्तर के दशक में मंगोलिया में काल्पनिक कहानियों के स्थान पर जीवन पर फिल्में बनने लगीं, साथ ही डॉक्युमेंट्री का बनना बढ़ गया। लेकिन इसी दौरान र्रैवजैनजिन दोर्जपैराम ने 1970 में बनाई ‘द क्रिस्टल क्लियर तमिल रिवर’ बनाई। यह फिल्म चद्रालिन लोदोइदम्बा के उपन्यास पर आधारित है तथा 1921 के मंगोल आंदोलन की बात करती है।

‘द लेजेंड ऑफ द मदर ओयासिस’, ‘द रेनबो’, ‘फाइव कलर्स’, ‘द लीडिंग रेसलर गरुड़’, क्वीन मैन्डुकाई द सेज’ आदि इस समय की कुछ अन्य प्रमुख फिल्में हैं। 1983 की ‘द लीडिंग गरुड़’ एक मील का पत्थर फिल्म है, जिसमें लेखकों के सत्ता संरचना से मुक्त होनी की बात कही गई है।

1987 की मंगोलियन फिल्म ‘क्वीन मंडुकी द सेज’ शग्डैराजाविन तित्लेजाविन के इसी नाम के उपन्यास पर आधारित है और पेरेस्त्रोइका के समय हुई मंगोलियन राजनीति के सुधार को परिलक्षित करती है।

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फिल्मों का इतिहास - फोटो : Istock
एक समय ऐसा आया जब मंगोलिया के फिल्म निर्माताओं को साथी खोजने पड़े, लेकिन इसी समय कुछ युवा फिल्मकार सामने आए जो परिवर्तनकारी सिद्ध हुए। इनमें से एन. जेनक्याग, बी. उरैन्चिमेग तथा जे. बिंदर प्रमुख हैं। ‘चेंगेज खान, अंदर द पॉवर ऑफ दि इटर्नल स्काई’ पहली फिल्म थी जिसका निर्माण जापान के सहयोग से हुआ। 1998 में ‘स्टेट ऑफ डॉग्स’ बनी फिल्म का लेखन तथा निर्देशन बेल्जियम के साझापन से हुआ। इसमें बेल्जियम के पीटर ब्रोसेन्स तथा मंगोलिया के द्रुखैन्दिन तुमुरंग का सहयोग था।

बाईम्बैसुरेन दैवर के निर्देशन में जर्मन-मंगोलियन को-प्रोडक्शन में बनी ‘द टेल ऑफ द वीपिंग कैमल’ को अंतरराष्ट्रीय सफलता हासिल हुई। इस डॉक्युमेंट्री को 2003 तथा 2005 में विदेशी फिल्म के रूप में ऑस्कर नामांकन मिला। 2005 की फिल्म ‘द येलो डॉग केव’ में एक छोटी बच्ची माता-पिता के न चाहते हुए भी एक पिल्ले से दोस्ती करती है। 2008 की एन्कतैवान अग्वैनसेरेन निर्देशित फिल्म ‘पर्ल्स इन द फोरेस्ट’ 1930 की घटनाओं को दिखाती है और मंगोलिया पर सोवियत के कम्युनिज्म की बात करती है।

यह अपने ढंग की पहली फिल्म है, क्योंकि यह मंगोलिया के अभी भी अस्तित्व में होने वाले आदि-समुदाय बुर्यैट लोगों का इतिहास पहली बार दिखाती है। 

मंगोलिया में चंगेज खान को लेकर फिल्में

1965 में हेनरी लेविन ने स्टीफन ब्यॉयड, ओमर शरीफ आदि को लेकर ‘चंगेज खान’ फिल्म हॉलीवुड में बनाई थी। मंगोलिया में चंगेज खान को लेकर कई फिल्में बनी हैं। बायम्बासुरेन दैवा निर्देशित ड़ेढ़ घंटे की डॉक्युमेंट्री ‘द टू होर्सेस ऑफ चंगेज खान’ चायनीज कल्चरल रिवल्यूशन के दौरान दादी द्वारा बाध्य होकर नष्ट की गई वायलिन की कहानी है। वायलिन पर प्राचीन मंगोलियन गीत ‘द टू होर्सेस ऑफ चंगेज खान’ उकेरा हुआ था, मगर सांस्कृतिक तूफान में वायलिन का सिर और गर्दन बच रही थी। अब उरना को अपनी दादी से किए वायदे को पूरा करना है।

उसे वायलिन को मुक्कमल कराना है और गीत के नष्ट हुए बोल खोज निकालने हैं। फिल्म को 2009 का सेंट्रल यूरोप पुरस्कार प्राप्त हुआ। फिल्म मंगोल जीवन में घोड़े और उसके आध्यात्मिक महत्व को स्थापित करती है, साथ ही पुरातन एवं आधुनिक के बीच के तनाव को फिल्माती है।

सर्गेई बोडरोव निर्देशित, ऑस्कर के लिए नामित ‘मंगोल: द राइज ऑफ चंगेज खान’ (2007), काले लम्बेर्ट निर्देशित, बायोग्राफी-ड्रामा ‘द चिल्ड्रेन ऑफ चंगेज’ ऐसी ही फिल्में हैं। 2007 की फिल्म ‘द चिल्ड्रेन ऑफ चंगेज’ चंगेज खान के प्रारंभिक जीवन को दिखाती है, जब वह गुलाम था। यह उसके 1206 में दुनिया जीतने के अभियान के पहले के काल को समेटती है।

मंगोलिया की फिल्में एक भिन्न दुनिया में ले जाती हैं। यहां की दुनिया, भाषा, संस्कृति सब अलग है। प्राकृतिक दृष्टि से भी यह देश भिन्न है, यहां तमाम तरह के आदिवासी अभी भी हैं। मंगोलिया में कहानी-कहन की अनोखी और संमृद्ध परम्परा है। यहां सजीव ड्रामा, एतिहासिक गाथाएं, लोक कथाएं फिल्म में गूंथी जाती हैं। शायद इसी कारण से आज विश्व मंगोलिया की फिल्मों की ओर आकर्षित है।

तो मौका मिलते मंगोलिया की फिल्में देखिए तथा एक अलग दुनिया की सैर कीजिए।


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डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): 
यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकताु, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदाई नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।
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