विश्व सिनेमा का इतिहास
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द्वितीय विश्वयुद्ध के पश्चात कोल्डवार के काल में प्रोपगेंडा फिल्में खूब बनीं। ‘टीयर ऑफ पर्ल’ फिल्म सैनिक सत्ता के महत्व को स्थापित करती हुई फिल्म थी। इसी तरह ‘द पीपुल विन थ्रू’ कम्युनिस्ट के खिलाफ प्रचार की फिल्म थी। इसी समय बर्मा के प्रसिद्ध लेखक और सिने-निर्माता ने कई फिल्में प्रड्यूस कीं, उनकी सर्वाधिक प्रसिद्ध फिल्म ‘द लाइफ साइकल’ है। पचास के दशक के प्रधान मंत्री यू. नो ने इसकी स्क्रिप्ट तैयार की थी। 1952 में बर्मा ने अपना पहला अकादमी अवॉर्ड्स समारोह किया था।
बर्मा में साठ के दशक में फिल्म देखना बड़ी सामान्य बात थी, सिनेमाहॉल एयरकंडीशंड थे और वहां बैठने के लिए सोफा हुआ करते थे। उस समय रंगून में करीब 400 सिनेमाहॉल थे।
बर्मा में सालाना फिल्मों की दर 80 थी। आज वहां सिनेमाहॉल की संख्या घट कर 57 पहुंच गई है और ये हॉल भी पेशाब की बदबू से गंधाते रहते हैं। यहां तिलचट्टे और चूहे दौड़ते रहते हैं। इन सिनेमाघरों में दशकों पुरानी भारतीय फिल्में दिखाई जाती हैं। मशीनें इतनी खराब हैं कि चित्र धुंधले होते हैं, उससे भी स्थिति बुरी आवाज की होती है। फिर भी कुछ लोग फिल्में देखने को मजबूर हैं और कभी-कभी मशीन रुक जाने से पूरी फिल्म देखना भी संभव नहीं हो पाता है। यह सब मैं नहीं कह रही हूं यह सब लॉस एन्जेल्स टाइम्स में प्रकाशित है।
जब सिनेमाघर इतने खस्ताहाल हैं तो जिनके पास सुविधा है, वे वीडियो थियेटर में हॉलीवुड की फिल्में देखते हैं। बर्मा में काफी बड़े, कई तो 150 सीट वाले वीडियो थियेटर हैं। इन फिल्मों को देख कर फर्राटेदार इंग्लिश बोलने वाले बर्मा में खूब मिलते हैं। एक समय बर्मा के दर्शकों के बीच एन्थॉनी क्विन, शेर्ली मैक्लैन, पॉल न्यूमैन खूब लोकप्रिय थे। एन्थॉनी क्विन तथा इन्ग्रिड बर्गमैन की ‘द विजिट’, शैर्ली मैक्लैन, पॉल न्यूमैन की ‘व्हाट ए वे टू गो’, ‘किंग कॉन्ग एस्केप्स’, ‘दि एडवेंचरर्स’ आदि फिल्में यहां खूब चलीं। कॉउबॉय फिल्में खूब पसंद की जाती थीं।
सत्तर और अस्सी का दशक और फिल्में
सत्तर और अस्सी के दशक में कई लचर फिल्में बनीं तथा कई फिल्में विदेशी फिल्मों की नकल मात्र थीं। 1989 में बर्मा में सरकार ने आर्थिक उदारीकरण की नीति अपनाई तथा फिल्म उद्योग का निजीकरण कर दिया। जो फिल्म अभिनेता राजनैतिक सरगर्मियों में लिप्त थे, उनकी फिल्में प्रतिबंधित कर दी गईं। अन्ग ल्विइन, तुन वाइ जैसे अभिनेता तथा विन पे जैसे निर्देशक प्रतिबंधित हो गए।
इसी तरह इक्कीसवीं सदी में सिल्वस्टर स्टालिओन की ‘रेम्बो’ शृंखला की चौथी फिल्म दिखाने की बर्मा अनुमति नहीं मिली। ‘द सिम्सन्स’ फिल्में भी प्रतिबंधित हुईं। इसे रोकने का कारण बड़ा अजीब था, इसे रोक गया क्योंकि इस फिल्म में पीला और लाल रंग प्रयोग हुआ था।
आजकल बर्मा में अधिकांशत: कॉमेडी फिल्में बनती हैं। 2008 में करीब 800 वीडियो सीडी बने लेकिन मात्र 12 फिल्में अकादमी अवॉर्ड के योग्य मानी गईं। 2009-2011 के बीच मात्र छ: मिनी-थियेटर का निर्माण हुआ। बर्मा का पहला ए1 फिल्म स्टूडियो जिसके पास एक जमाने में 25 एकड़ जमीन थी, आज उसके पास मात्र एक एकड़ बची है, जंगल के बीच एक तख्ती पर लिखा उसका नाम शायद ही दिखता है।
सिनेमाघरों को तोड़ कर शॉपिंग मॉल बनाए जा रहे हैं। लोग बर्मा में बनी बेकार की फिल्म नहीं देखना चाहते हैं। वे थाई, चीनी, साउथ कोरियन, अमेरिकी फिल्मों की डीवीडी देखते हैं, बाजार इनके पायरेटेड संस्करण से भरा पड़ा है।
बर्मा के सिने-इतिहस में इस बीच एक अच्छी बात हुई है। बर्मा का एक सर्वोतम कॉमेडियन जागनार राजनैतिक कारणों से जेल में था, वह रिहा हुआ। तो इस कॉमेडियन ने जनवरी 2012 में इन्डिपेंडेन्ट फिल्म का एक समारोह आयोजित किया। इसमें ‘बैन दैट सीन’ ने पुरस्कार जीता, यह फिल्म सेंसरशिप के भ्रष्टाचार और ढपोरशंख पर तीखा व्यंग्य करती है। प्रसिद्ध राजनेता मिस सु ची ने इसके पुरस्कार समारोह में हिस्सा लिया।
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