मोदी सरकार और बदलती राजनीति
सन् 2014 तक आते-आते नरेन्द्र मोदी ने सामाजिक न्याय और धर्मनिरपेक्षता के विमर्श को भी बदल दिया। आज और मोदी के पहले कार्यकाल में भी मोदी सरकार पर कुछ खास औद्योगिक घरानों को सत्ता का संरक्षण दिए जाने के बहाने से और लोकतांत्रिक संस्थाओं के कमजोर करने के हवाले से भी मोदी सरकार को चुनौती देने की कोशिश हो रही है। पर आज के दौर में असल सवाल यह है कि जो दल और जिनके नेता इन सवालों को उछाल रहे हैं, उनकी अपनी राजनीतिक साख जनता के बीच कितनी बची है? और जनता उनके कहे पर क्या आंख मूंदकर भरोसा कर रही है?
विपक्षी दलों की एकता और साझा कार्यक्रम जैसे फार्मूले भी कितने बार आजमाए जा चुके हैं। आजादी के 75 साल बाद की संसदीय राजनीति के अनुभवों ने जनता को कम से कम इस हद तक तो परिपक्व कर ही दिया है कि वे अपनी वोट की ताकत और राष्ट्रीय और राज्यों के चुनावों के फर्क जानने-समझने लगे हैं।
सोशल मीडिया के इस दौर में अंतरराष्ट्रीय राजनीति और खासकर कोरोना काल के बाद की वैश्विक परिदृश्य को देखने समझने के लिए जनता के पास न जाने कितने साधन उपलब्ध हैं।
अब जनता को 'एजेंडा' के तहत बहकाना कठिन
कुल मिलाकर उसे किसी खास 'एजेंडा' के तहत बहकाना और लामबन्द करना पहले के किसी वक्त के मुकाबले अब ज्यादा मुश्किल हो गया है। ऐसे वक्त में किसी भी राजनीतिक दल और नेता के लिए निराशा के गहराते संकट से उबरना भी उतना ही श्रमसाध्य और चुनौतीपूर्ण होता जा रहा है। इतिहास के ऐसे ही दौर में राम मनोहर लोहिया के सामने भी यही सवाल था कि" क्या ऐसी कोई व्यवस्था बन सकती है कि सत्ता पर थोड़ा-बहुत नियंत्रण रख सकें? क्या मनुष्य जाति कभी समर्थ होगी, ऐसे आदमी पैदा करने में जो आदतन सिविल नाफरमानी करें।
षडयंत्र और हथियार के जरिए निरंतर क्रांति तो असंगत बात है, पर सिविल नाफरमानी के जरिए निरंतर क्रांति की संभावना निश्चित है। सत्ता के दूसरे पहलू अय्याशी और रुतबे की भूख की भी यह एकमात्र दवा है। आज राजनीतिक सुचिता के अर्थ में सिविल नाफरमानी का अर्थ अच्छाई की खोज करना है। किसी भी तरह के अन्याय और अत्याचार के विरुद्ध अवज्ञा है।
यह भी एक विचारणीय प्रश्न है कि आजादी के आंदोलन और उसके बाद के दौर में भी सबसे प्रतिभाशाली राजनीतिक फौज समाजवादियों की थी। पर जल्दबाजों की यह बेलगाम फौज किसी निर्णायक मुकाम पर पहुंचकर भी हमेशा छोटे स्वार्थों की वजह से टूटती-बिखरती रही।
बावजूद इन विसंगतियों के आज के राजनीतिक दौर में लोहिया की यह राजनीतिक सीख कम महत्वपूर्ण नहीं कि हार के बाद हार केवल वही झेलते हैं जो तकदीर के फेर- पलट से डरते नहीं या निःसाहस नहीं होते हैं। जीत लाजिमी तौर पर सफलता नहीं है, और न हार असफलता। राजनीतिक दौड़ -धूप में सफलता का मतलब आदमी में उन महान गुणों का उभार होना चाहिए जो अन्याय और अत्याचार से लड़ाई की प्रेरणा दें और जिससे भलाई और शान्ति की स्थापना हो सके। इस लिए दुनिया को भी एक नहीं कई पराजयों से सीखने की जरूरत है।
---------------------------
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदाई नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।