एड्स मरीजों के इलाज के लिए हजारों वैज्ञानिक इस गुत्थी को सुलझाने में लगे हैं।
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बंदरों ने दिखाया इलाज का रास्ता
कहते हैं कि एड्स अफ्रीका के बंदरों से आया। वैज्ञानिकों ने पाया कि अफ्रीका के 70 फीसदी बंदरों के खून में वही एचआईवी वायरस मौजूद है जो एड्स रोगियों के खून में है। लेकिन हैरत की बात यह थी कि इस वायरस का उन पर कोई ऐसा विपरीत प्रभाव नहीं दिखा जो इंसानों पर दिखता है। और वे बंदर बरसों से सामान्य जीवन जी रहे हैं।
इससे वैज्ञानिक उत्साहित हुए। एड्स मरीजों के इलाज के लिए हजारों वैज्ञानिक इस गुत्थी को सुलझाने में लगे हैं। एड्स के मौजूदा प्रचलित इलाज एंटीरिटरोवायरल थेरेपी यानी एआरटी की सफलता भी इसी खोज से मिली। यह एचआईवी के वायरस को खत्म नहीं करता बल्कि वह वायरस के जीवनचक्र को तमाम स्तरों पर ब्लॉक कर देता है ऐसे में इस वायरस की गुणात्मक बढ़ोत्तरी रुक जाती है। और जिस्म पर वायरस का असर कम हो जाता है।
एक सेहतमंद इंसान का सीडी4 काउंट 500 से 1600 सेल्स के बीच होता है। ये व्यक्ति को इम्यूनिटी को दर्शाता है। बुखार और अन्य मौसमी बीमारियों में सीडी4 काउंट नीचे गिर जाता। फिर स्वस्थ होने पर बढ़ जाता है। लेकिन एड्स ग्रस्त रोगी का सीडी4 काउंट नीचे गिरता चला जाता है। जब वह 200 सेल्स से नीचे चला जाता है तो उसे एड्स का मरीज कहा जाता है। ऐसे में उसका इलाज अनिवार्य हो जाता है।
यानी ये दावा मरीज के जिस्म में इम्यूनिटी बढ़ाने के लिए जिम्मेदार सीडी4 काउंट को नीचे गिरने से रोकती है। नई खोजें कहती हैं कि तीस साल की उम्र में पता चलता है कि व्यक्ति एचआईवी पाजिटिव है तो वह एआरटी की दवाओं से पचास साल और जिन्दा रह सकता है। शर्त यह है कि वह इन दवाओं को नियमित ले। ये दवाएं मरीज को रोजाना लेनी पड़ती हैं।
एचआईवी एड्सः भारत में इस दवा से इलाज का सालाना खर्च औसत: प्रति मरीज 15,000 रु. है।
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क्या हैं नई दवाएं
अत्यधिक सक्रिय एंटीरेट्रोवायरल थेरेपी (HAART), जिसमें कम से कम तीन एंटीरेट्रोवाइरल (एआरवी) दवाओं का संयोजन शामिल है, का उपयोग एचआईवी संक्रमित रोगियों के जीवन काल को बढ़ाने के लिए किया गया है। एंटीरेट्रोवाइरल थेरेपी में खासतौर पर तीन दवाएं शामिल हैं जिन्हें न्यूक्लियोसाइड रिवर्स ट्रांसक्रिपटेस इनहिबिटर कहा जाता है।
दरअसल, ये दवाएं न केवल एचआईवी के रोगी की रोग प्रतिरक्षा प्रणाली को मजबूत करती हैं बल्कि अवसरवादी संक्रमण को रोकता है, जो अक्सर एड्स रोगियों के मौत का कारण बनता है।
महंगा है इलाज
विश्व एड्स संगठन की नई गाइडलाइन कहती है कि एचआईवी का पता चलते ही दवा देना शुरू कर दो। गरीब और विकासशील देशों की सरकारों के पास इतना पैसा नहीं कि वह ऐसे इलाज पर अंधाधुंध पैसा खर्च करना शुरू कर दें जिसकी मरीज को तत्काल जरूरत नहीं।
एड्स के थर्ड लाइन ट्रीटमेंट में प्रति मरीज प्रति वर्ष एक लाख का सरकारी खर्च है। प्राइवेट अस्पतालों में यह खर्च कई लाख में है। भारत में हर साल एचआईवी के कोई दो लाख नए मरीज जुड़ रहे हैं। गरीब देशों के पास टीबी, कालाजार, मलेरिया जैसे दूसरे अवसरवादी संक्रमक रोग हैं जिससे ज्यादा लोग प्रभावित होते हैं। भारत जैसे देश में जहां स्वास्थ के लिए बजट जीडीपी का एक फीसदी हो वो कैसे इन महंगी दवाओं को मुफ्त बांट पाएगा।
बेशक ये एक महंगा इलाज है
भारत में इस दवा से इलाज का सालाना खर्च औसत: प्रति मरीज 15,000 रु. है। सेंकड लाइन के मरीजों के लिए यह खर्च 40,000 रु. आता है। यह दवा सरकारी कीमत है, जो सरकार पंजीकृत रोगियों को मुफ्त देती है। बाजार में इस दवा की कीमत कई गुना ज्यादा है।
भारत सरकार 2004 से एटीआर केन्द्रों पर मुफ्त दवा दी जा रही है। एचआईवी के लिहाज से भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा देश है। भारत में एड्स का पहला मामला 1986 में तमिलनाडु के चेन्नई शहर में सामने आया था। वह एक सेक्स वर्कर थी। अगले साल तक 135 मामले सामने आए। 2006 तक 5.6 लाख केस सामने आ गए।
नाको के मुताबिक इस समय भारत में करीब 21 लाख एचआईवी के साथ जी रहे हैं। इनमें 87,000 नए केस हैं। हर साल करीब 69,000 मौतें एड्स के कारण हो रही हैं।
अभी एटीआर क्लीनिकों पर यह दवा सिर्फ उन एचआईवी ग्रस्त मरीज को दी जाती है जिनका सीडी4 काउंट 350 सेल्स से नीचे है। अभी कम बजट के कारण नेशनल एड्स कंट्रोल आर्गनाइजेशन यानी नाको 15 लाख पंजीकृत मरीजों में से करीब 12 लाख मरीजों को दवा के दायरे में ला पाया है। ये दवाएं सरकार देश भर में बने 554 एटीआर केन्द्रों पर फ्री में दी जा रही है।
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