नि:शस्त्र प्रतिरोध की पदचाप
निजाम राज्य की स्थिति को प्रत्यक्ष देखने के लिए महाराष्ट्र प्रांतीय हिंदू महासभा के अध्यक्ष लक्ष्मण बलवंत उपाख्य अण्णा साहब भोपटकर की सूचनानुसार महाराष्ट्र प्रांतीय हिंदू महासभा के कार्यवाह शंकर रामचंद्र उपाख्य मामाराव दाते, सतारा हिंदूसभा के नेता और सतारा जिला संघचालक शिवराम विष्णु उपाख्य भाऊराव मोड़क और बार्शी (जिला सोलापुर) हिंदूसभा के नेता गोविंद रघुनाथ उपाख्य बाबाराव काले ने मार्च-अप्रैल 1938 में मराठवाड़ा का गोपनीय दौरा किया।
आर्य समाज ने प्रस्तावित संघर्ष में सहभागी होने का आश्वासन दिया। जुलाई 1938 को दिल्ली में 'अंतरराष्ट्रीय आर्यन लीग' के कार्यकारी मंडल की बैठक में धार्मिक स्वतंत्रता को लेकर चौदह मांगें रखीं गईं। हैदराबाद के प्रश्न पर विचार करने के लिए राज्य की सीमा पर महाराष्ट्र में या फिर मध्य प्रांत में अखिल भारतीय आर्यन कांग्रेस पांच माह के भीतर आयोजित करने का निश्चय किया गया। साथ ही यह प्रस्ताव भी पारित किया गया कि यदि हैदराबाद राज्य के अधिकारी आर्य समाज के प्रति अपनी धारणा में बदलाव न लाने वाले हों तो भी सत्याग्रह तक सभी वैध और शांतिपूर्ण मार्ग अनुसरण करने हेतु सभी आर्य समाजियों से विनती की जाए (केसरी, 5 जुलाई, 1938)।
आर्य समाज डिफेंस कमेटी के सचिव एस. चंद्रा और आर्य समाज के अध्यक्ष घनश्याम दास गुप्ता ने हैदराबाद राज्य का दौरा कर अखिल भारतीय हिंदू महासभा के अध्यक्ष स्वातंत्र्यवीर सावरकर से नासिक में भेंट कर उन्हें वहां की परिस्थिति से अवगत कराया (केसरी, 9 अगस्त, 1938)।
23 सितंबर, 1938 को पूर्व क्रांतिकारी सेनापति पांडुरंग महादेव बापट पुणे से हैदराबाद में शांतिपूर्ण विरोध के लिए निकल पड़े। बापट ने निजाम राज्य के प्रतिबंधों और वहां पर भाषण करने पर लगे प्रतिबंधों की चिंता नहीं की। लेकिन हैदराबाद पहुंचते ही निजाम पुलिस ने उन्हें बंदी बनाकर वापस पुणे भेज दिया। वापस आकर उन्होंने कहा कि ब्रिटिश भारत में प्रचार कर वे 1 नवंबर को पुनः नि:शस्त्र प्रतिरोध हेतु जाएंगे (केसरी, 27 सितंबर,1938)। दिनांक 11 अक्टूबर, 1938 को वीर सावरकर और सेनापति बापट के बीच हैदराबाद में प्रस्तावित आंदोलन को लेकर पुणे में लगभग एक घंटे तक विचार-विनिमय हुआ।
इसके बाद उसी दिन शनिवारवाडा पर हुई विशाल सभा में सावरकर ने आंदोलन की सैद्धांतिक भूमिका स्पष्ट की। उन्होंने कहा-
प्रतिरोध करने के दो मार्ग होते हैं। जिसमें एक सशस्त्र प्रतिरोध और दूसरा नि:शस्त्र प्रतिरोध होता है। इसमें से पहला, यानी सशस्त्र प्रतिरोध, फिलहाल उचित प्रतीत नहीं होता। सशस्त्र मार्ग का अनुसरण पाप है, ऐसा मानने वालों में मैं नहीं हूँ और पाप के भय से मैं उसे एक तरफ रख रहा हूँ ऐसा भी नहीं है। फिर भी उस मार्ग का अनुसरण अभी हम झेल पाएंगे या नहीं, इस पर विचार करना होगा। इस परिप्रेक्ष्य में हैदराबाद में नि:शस्त्र प्रतिरोध करना आज के लिए उचित है।
संघ स्वयंसेवकों की सत्याग्रह में सहभागिता
इसी सभा में लोकमान्य तिलक के पोते और ‘मराठा’ के संपादक गजानन विश्वनाथ केतकर की अध्यक्षता में 'हिंदुत्वनिष्ठ नागरिक सत्याग्रह सहायक मंडल' (संक्षिप्त में भागानगर हिंदू सत्याग्रह मंडल) की स्थापना की गई (केसरी,14 अक्टूबर 1938)। निजाम के राज्य में लोगों को भाषण, मुद्रण, लेखन, संघ, सभा और धर्म सहित सात मुद्दों पर मौलिक स्वतंत्रता दिलाना इस संघर्ष का उद्देश्य निश्चित किया गया। इस मंडल का केंद्र पुणे और उसकी शाखाएं महाराष्ट्र, मध्य प्रांत तथा बरार में सभी जगहों पर आरंभ की गई। इस मंडल द्वारा किए गए नि:शस्त्र प्रतिरोध में प्रमुख रूप से वर्णाश्रम स्वराज्य संघ, हिंदू महासभा, लोकशाही स्वराज्य दल और हिंदू युवा संघ शामिल हुए (केसरी, 1 नवंबर, 1938)।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयंसेवकों ने भी इसी मंडल के माध्यम से सत्याग्रह किया। दंगों में मारे गए मृतकों के अनाथ परिवारों को सहायता देने और अभियुक्तों को प्रतिबंधात्मक व्यय के लिए ‘भागानगर हिंदू सहायता निधि’ प्रारंभ की गई। नि:शस्त्र प्रतिरोध संघर्ष हेतु ‘भागानगर हिंदू सत्याग्रह निधि’ नाम से अलग निधि शुरू करने का निवेदन सावरकर ने घोषित किया (केसरी,8 नवंबर 1938)।
दूसरे सत्याग्रह हेतु 31 अक्टूबर को पुणे से निकलने से पूर्व 30 अक्टूबर को सायंकाल कुछ कांग्रेस के लोगों ने सेनापति बापट की अध्यक्षता में एक सभा आयोजित की और 'स्टेट कांग्रेस सहायक कांग्रेसनिष्ठ सत्याग्रह मंडल' की स्थापना की। वास्तव में सेनापति बापट ने जो सत्याग्रह आरंभ किया था वह स्वतंत्र और स्वयंभू था। सत्याग्रह हेतु जाने का निश्चय उन्होंने पहले से ही किया हुआ था। पर पुणे में कांग्रेस के लोगों ने बहती गंगा में हाथ धोते हुए सेनापति बापट और उनके विश्वस्त सहयोगियों को नए मंडल का पहला सत्याग्रही बना दिया।
हैदराबाद स्टेट कांग्रेस पर जातीयता के साथ-साथ 'बाहर वाला' होने का आरोप भी लगाया जा रहा था। पुणे के कांग्रेसियों की यह करतूत स्टेट कांग्रेस के लिए भी असुविधाजनक सिद्ध हुई। यहां तक की स्टेट कांग्रेस के चौथे अधिनायक (डिक्टेटर) बलवंत राव को बंदी बनाए जाने पर यह संदेश देना पड़ा कि 'बाहर की किसी भी संस्था से हमारा संबंध नहीं है" (केसरी, 8 नवंबर, 1938)।
ये घटनाएं जब महाराष्ट्र में घटित हो रही थीं, तब वीर यशवंत दिगंबर जोशी, दत्तात्रय लक्ष्मीकांत जुक्कलकर प्रभृति हैदराबाद हिंदू सभा के नेता पुणे हिंदूसभा के नेताओं और स्वातंत्र्यवीर सावरकर के संपर्क में थे। परिणामस्वरूप वीर यशवंतराव जोशी ने 'नागरिक हिंदू स्वातंत्र्य संघ' की ओर से हैदराबाद के दिवंगत हिंदू नेता वामनराव नाईक की स्मृति में 21 अक्तूबर, 1938 को लगभग तीन हजार लोगों का जुलूस निकालकर प्रतिबंध तोड़ा। उन्हें 21 माह का सश्रम कारावास और दो सौ रुपये के अर्थदंड की सजा सुनाई गई।
नि:शस्त्र प्रतिरोध आंदोलन आरंभ हो चुका था। प्रतिबंधित हैदराबाद स्टेट कांग्रेस ने इस घटना के पश्चात 24 अक्टूबर, 1938 को और आर्य समाज ने 27 अक्टूबर, 1938 को संघर्ष शुरू किया। 25 दिसंबर, 1938 को लोकनायक बापूजी अणे की अध्यक्षता में भाई परमानंद, स्वातंत्र्यवीर सावरकर जैसे प्रबुद्ध नेताओं की उपस्थिति में अखिल भारतीय आर्य परिषद का खुला अधिवेशन सोलापुर में हुआ, जिसमें निजाम विरोधी संघर्ष में शामिल लोगों की संख्या 22,000 बताई गई (केसरी, 30 दिसंबर 1938)।
इसके बाद 28 दिसंबर, 1938 को स्वातंत्र्यवीर सावरकर की अध्यक्षता में नागपुर में अखिल भारतीय हिंदू महासभा का अधिवेशन हुआ, जिसमें निजाम विरोधी संघर्ष जारी रखने संबंधी प्रस्ताव पारित हुआ। सावरकर के आशीर्वाद से हिंदू सत्याग्रह मंडल की प्रथम टुकड़ी 7 नवंबर, 1938 को पुणे से निकली। हैदराबाद राज्य में नागरिक स्वतंत्रता का संघर्ष सितंबर 1938 में आरंभ होकर अगस्त 1939 तक चला, जिसमें हिंदू महासभा,आर्य समाज और स्टेट कांग्रेस ने भाग लिया। आर्य समाज का संघर्ष धार्मिक स्वतंत्रता तक सीमित था। हिंदू महासभा ने विषय को व्यापक और विस्तारित करते हुए अन्य नागरिक स्वतंत्रता के मुद्दे भी उसमें समाविष्ट किए, जबकि स्टेट कांग्रेस का जोर उत्तरदायी शासन प्रणाली पर था।
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