15 अगस्त 1947 को भारत को आजादी तो मिली लेकिन छत-विछत रूप में। अंग्रेजों ने देश का बंटवारा तो कर ही दिया था साथ में 565 देशी रियासतों को हवा में लटकता छोड़ दिया। जिन्हें अंग्रेजों की कूटनीति के चलते भारतीय संघ में शामिल होने या न होने का अधिकार दे दिया गया था। हैदराबाद, जम्मू-कश्मीर और जूनागढ़ रियासतों ने अंग्रेजों के इसी चाल का फायदा उठाते हुए भारत में विलय नहीं कर स्वतंत्र रहने की बात कही। ऐसी प्रतिकूल स्थिति में राष्ट्र की एकता और अखंडता को हर तरह से खतरा था।
इस खतरे को देखते हुए ही आजाद भारत के पहले गृहमंत्री सरदार वल्लभ भाई पटेल ने तमाम मुश्किलों और चुनौतियों का सामना करते हुए न सिर्फ इन रियासतों का भारत संघ में विलय कर भारत को सुदृढ़ किया बल्कि उसे स्थायित्व भी प्रदान किया। आजाद भारत के एकीकरण की इस प्रक्रिया में सबसे आखिर में हैदराबाद रियासत का विलय हुआ। जो आजादी के एक साल बाद काफी संघर्ष के बाद संभव हुआ और तब कहीं जा कर भारत का एकीकरण पूर्ण हो पाया।
इस वर्ष हैदराबाद के भारत में विलय की 75वीं वर्षगांठ मनाई जा रही है। लेकिन भारत की सबसे बड़ी रियासतों में से एक हैदराबाद के विलय की कहानी जितनी दिलचस्प है, उतनी ही संघर्षपूर्ण।
अंग्रेज जब देश छोड़कर जा रहे थे तब देश में करीब 565 देशी रियासतें मौजूद थी। अंग्रेजों ने इन देशी रियासतों को यह छूट दे दी थी कि वे अपनी मर्जी के मुताबिक भारत या पाकिस्तान, किसी में भी मिल सकते हैं या चाहें तो स्वतंत्र रह सकते हैं। इसके लिए उन्होंने रियासतों को चालीस दिन का समय दिया था। पूरे राष्ट्र का इस तरह छोटे-बड़े खंडों में बंटे रहना आर्थिक-सामाजिक प्रगति में बहुत बड़ी बाधा थी। राजनीतिक शक्ति के मामले में भी एक रियासत दूसरी रियासत से क्षेत्रफल और जनसंख्या आदि में काफी अलग थी। ऐसे में भारत की एकता और अखंडता के लिए इन रियासतों का विलय करना बेहद जरूरी था।
हैदराबाद के निजाम ने विलय प्रस्ताव को कर दिया नामंजूर
हालांकि, 15 अगस्त 1947 तक इन रियासतों में से तीन को छोड़कर बाकी ने भारत में विलय का फैसला किया। लेकिन जम्मू-कश्मीर, जूनागढ़ और हैदराबाद रियासतों ने भारत में शामिल न होकर स्वतंत्र मुल्क के रूप में रहने की बात कही। इनमें जम्मू-कश्मीर का 26 अक्टूबर 1947 और जूनागढ़ का 20 फरवरी 1948 को भारत में विलय हो गया। लेकिन हैदराबाद रियासत के निजाम ने किसी भी कीमत पर भारत में विलय के प्रस्ताव को नामंजूर करते हुए खुद को स्वतंत्र रहने का एलान कर दिया। आजाद भारत के लिए न तो भौगोलिक रूप से और न ही सांस्कृतिक और राजनीतिक रूप से यह संभव था कि हैदराबाद देश के बीचो-बीच एक नासूर की तरह बना रहे।
सरदार पटेल ने हैदराबाद को ‘भारत के पेट में कैंसर’ कहा था और आखिरकार 17 सितंबर 1948 को ‘पुलिस एक्शन’ के तहत एक संघर्ष के बाद हैदराबाद का भारत में विलय करते हुए भारत के एकीकरण को पूरा कर राष्ट्र को स्थायित्व दिया।
दरअसल, 15 अगस्त 1947 से पहले भारत में तीन तरह के क्षेत्र थे। एक ब्रिटिश भारत का क्षेत्र जो सीधे गवर्नर जनरल के अधीन था। दूसरा फ्रांस और पुर्तगाल के औपनिवेशिक क्षेत्र, जिनमें चंदननगर, पाण्डिचेरी और गोवा शामिल थे। और तीसरा देशी राज्य, जो सैकड़ों राजे-रजवाड़ों और स्थानीय शासकों के अधीन बंटा हुआ था। जिन्हें प्रिंस्ली स्टेट्स, रियासत, रजवाड़े, देशी रियासत आदि नामों से जाना जाता था। भारत के कुल क्षेत्रफल के 2/5 यानी 40 फीसदी भूमि पर इन रियासतों का कब्जा था और करीब 9 करोड़ जनता इन रियासतों में रहती थी।
इन रियासतों के शासक भारतीय जरूर थे लेकिन इन पर पूरी तरह से ब्रिटिश शासन का नियंत्रण था। बदले में इन्हें ब्रिटिश पैरामाउंटसी के तहत अनेक प्रकार की स्वायत्ता प्राप्त थी। यही वजह थी कि रियासतों के शासकों को अपनी प्रजा की कोई परवाह नहीं थी और इन रियासतों में रहने वाली प्रजा की स्थिति काफी दयनीय थी।
जब 20 फरवरी 1947 को तत्कालीन ब्रिटिश प्रधानमंत्री क्लीमेंट एटली ने भारत की स्वतंत्रता का एलान करते हुए कहा कि “सम्राट की सरकार पैरामाउंटसी के तहत अपनी शक्तियों और कर्तव्यों को ब्रिटिश भारत के किसी भी सरकार को सौंपने का इरादा नहीं रखती है”। तब अंग्रेजों की इसी कूटनीति का फायदा उठाते हुए इन रियासतों ने खुद को भारत में विलय नहीं करने की बात कह कर स्वतंत्र रहने की बात कही। इनमें हैदराबाद रियासत तो अंतिम समय तक इस बात के लिए तैयार नहीं हुआ, जब तक कि भारत ने सेना भेजकर उसका विलय नहीं कर लिया। हैदराबाद रियासत के इस नापाक इरादे को मोहम्मद जिन्ना ने भी उसे स्वतंत्र रहने की बात कर काफी उकसाया था।
सबसे बड़े रियासतों में से एक थी हैदराबाद की रियासत
हैदराबाद रियासत आजादी के समय भारत के सबसे बड़े रियासतों में से एक थी। जो 82 हजार वर्ग मील से भी ज्यादा क्षेत्र में फैली हुई थी और उसका क्षेत्रफल इंग्लैंड और स्कॉटलैंड के कुल क्षेत्रफल से भी अधिक था। जनसंख्या करीब एक करोड़ सत्तर लाख थी।
हैदराबाद रियासत में आज का मराठवाड़ा, कर्नाटक के कई इलाके और पूरा तेलंगाना शामिल था। इनमें 28 फीसदी मराठी, 22 फीसदी कन्नड़ और 50 फीसदी लोग तेलुगू भाषी थे। इनमें करीब 21 लाख उर्दू बोलने वाले भी शामिल थे। राज्य की कुल आबादी में करीब 85 फीसदी हिंदू, 12 फीसदी मुसलमान और बाकी ईसाई, जैन और अन्य धर्म के लोग थे।
चारों तरफ से जमीन से घिरी यह रियासत आबादी और कुल राष्ट्रीय उत्पादन के लिहाज से भारत का सबसे बड़ा राजघराना था। जो खाद्य, कॉटन, तिलहन, कोयला और सीमेंट उत्पादन में आत्मनिर्भर था। हालांकि पेट्रोल और नमक उसे ब्रिटिश भारत से मंगाना पड़ता था। गुलामी के दिनों में भी हैदराबाद रियासत की अपनी सेना, एयरलाइन, दूरसंचार प्रणाली, रेलवे नेटवर्क, डाक प्रणाली, मुद्रा और रेडियो प्रसारण सेवा थी।
निजाम का शहर और मोतियों का शहर के नाम से मशहूर हैदराबाद की स्थापना 1591 में कुतुबशाही वंश के पांचवे शासक मुहम्मद कुली कुतुबशाह ने मूसी नदी के किनारे किया था। लेकिन हैदराबाद में निजामशाही की शुरुआत 1724 में तब हुई जब दक्कन का मुगल सूबेदार कमर-उद्दीन सिद्दीकी ने मुगल सल्तनत से विद्रोह कर खुद को आजाद घोषित कर दिया और ‘आसफ जाह’ के खिताब के साथ हैदराबाद पर अधिकार कर एक स्वतंत्र राज्य की स्थापना की। दरअसल औरंगजेब के निधन के बाद मुगल शासक मुहम्मद शाह ने मीर कमर-उद्दीन सिद्दीकी को 1713 में ‘निज़ाम-उल-मुल्क’ के खिताब के साथ दक्कन का सूबेदार नियुक्त किया था। लेकिन वह विद्रोह कर 1724 में हैदराबाद का सुल्तान बन बैठा।
बाद में आसफ जाह के उत्तराधिकारियों ने हैदराबाद स्टेट पर राज्य किया और वे निजाम कहलाए। हैदराबाद राज्य के सातवें और आखिरी निजाम मीर उस्मान अली खान थे जो 1911 में हैदराबाद के निजाम बने और 1948 तक सत्ता पर काबिज रहे।
हैदराबाद भारत का पहला देशी राज्य था जिसने 1802 में अंग्रेजों के साथ सहायक संधि पर हस्ताक्षर किया। इससे खुश होकर अंग्रेजों ने हैदराबाद के निजाम को ‘हिज एग्जॉल्टेड हाईनेस’ की उपाधि प्रदान की थी, जबकि अन्य रियासत के शासकों को ‘हिज हाईनेस’ की उपाधि दी थी। इसी तरह हैदराबाद निजाम के बेटे को प्रिंस ऑफ वेल्स की तरह ‘प्रिंस ऑफ बरार’ की उपाधि दी थी।