विश्वसनीयता को पत्रकारिता का प्राण माना जाता है और इसी विश्वास पर लोग अखबारों में छपी बातों को सत्य मान लेते हैं
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हिन्दी पत्रकारिता की निरन्तर उपेक्षा
भारत 30 मई 1826 से शुरू हुआ हिन्दी पत्रकारिता का सफर काफी गौरवशाली रहा। विज्ञान एवं प्रोद्योगिकी के तीब्र विस्तार के साथ ही संचार और सूचना क्रांति ने तब और अब के हालात में जमीन आसमान का अंतर कर दिया है। लेकिन हिन्दी पत्रकारिता को मिलने वाले सम्मान में वृद्धि के बजाय निरन्तर ह्रास होता गया। समाचार पत्रों का पंजीकरण भारत के समाचार पत्रों के पंजीयक (आरएनआइ) द्वारा किया जाता है और उसके रिकार्ड में सबसे पुराने हिन्दी अखबार का नाम ’’जैन गजट’’ साप्ताहिक दर्ज है।
जिसका प्रकाशन वर्ष 1895 बताया गया है। जबकि जुगल किशोर सुकूल जी का ’’उदन्त मार्तण्ड’’ 1826 का है। उत्तराखण्ड में ही 1867 में नैनीताल से हिन्दी उर्दू ’’समय विनोद’’ शुरू हो चुका था। इसी तरह जैन गजट हिन्दी साप्ताहिक से पहले उत्तराखण्ड के ही अल्मोड़ा से 1871 में ’’अल्मोड़ा अखबार’’ शुरू हो चुका था। इसका मतलब है कि भारत में हिन्दी अखबारों और हिन्दी पत्रकारिता का सम्पूर्ण रिकार्ड तक नहीं है।जबकि स्वाधीनता आन्दोलन में भी हिन्दी पत्रकारिता की महत्वपूर्ण भूमिका रही।
सर्वाधिक प्रकाशन हिन्दी के फिर भी दोयम दर्जा
भारत के समाचार पत्रों के पंजीयक (आरएनआइ) के रिकार्ड के अनुसार 2020-21 तक देश में दैनिक, सप्ताहिक और पाक्षिक सहित कुल 1,44,520 पंजीकृत प्रकाशन या पत्र पत्रिकाएं थीं। इनमें सर्वाधिक 55,349 प्रकाशन हिन्दी के, 19,845 अंग्रेजी के, 10,160 मराठी के और 6,930 उर्दू के थे। कुल 19971 दैनिक अखबारों में भी सर्वाधिक 8,562 दैनिक हिन्दी के थे। उसके बाद क्रम से उर्दू, तेलगू और अंग्रेजी के दैनिक थे। साप्ताहिकों में भी सर्वाधिक साप्ताहिक हिन्दी के ही पंजीकृत थे। महानगरों में अंग्रेजी के प्रकाशन हिन्दी से अधिक होने का मतलब भी समझा जा सकता है। 2020-21 में भी सर्वाधिक 476 पंजीकरण हिन्दी के प्रकाशनों के हुये ।
हिन्दी पत्रकारिता की पहुंच सर्वाधिकलोगों तक, फिर भी रुतवा कम
जहां तक रीडरशिप या अखबारों की प्रसार संख्या का सवाल है, तो उसमें भी हिन्दी पत्रकारिता आगे है। आरएनआइ के रिकार्ड के अनुसार 2020-21 में सर्वाधिक 18,93,96,236 प्रसार संख्या हिन्दी के प्रकाशनों की ही थी जो कि सभी भाषाओं के प्रकाशनों की कुल प्रसार संख्या का 49.01 प्रतिशत है। भारत में विदेशी भाषाओं सहित कुल 189 भाषाओं में दैनिक, सप्ताहिक और पाक्षिक आदि पत्र-पत्रिकाएं छपती हैं। हिन्दी के बाद किसी भारतीय भाषा के बजाय अंग्रेजी की प्रसार संख्या सबसे अधिक 3,49,27,239 है। अंग्रेजी के बाद मराठी की 3,15,90,611 और उर्दू की प्रसार संख्या 2,61,14, 412 है।
वर्ष 2011 की जनगणना में भारत में हिन्दी भाषियों की संख्या 52,83,47,193 थी। जो कि कुल भाषा भाषियों की संख्या का 43.63 प्रतिशत है। हिन्दी भाषी 52.83 और हिन्दी के प्रकाशन 18.93 के हिसाब से देखा जाय तो हिन्दी भाषी लोगों में से भी लगभग एक तिहाई लोग ही हिन्दी के पत्र या पत्रिकाएं पढ़ते हैं। भले ही शून्य की कीमत शून्य या कुछ नहीं होती है लेकिन पत्र-पत्रिकाओं (चाहे किसी भी भाषा की क्यों न हों) के लिये शून्य बहुत लाभकारी होता है। प्रसार संख्या पर एक शून्य जोड़ने से भारी उछाल आ जाता है।
विश्वसनीयता का संकट तो अवश्य है
विश्वसनीयता को पत्रकारिता का प्राण माना जाता है और इसी विश्वास पर लोग अखबारों में छपी बातों को सत्य मान लेते हैं लेकिन आज की आधुनिक पत्रकारिता व्यावसायिक हो गयी है और उस व्यावसायिकता ने उस सहज और स्वाभाविक "विश्वसनीयता’’ के "प्राण’ निकालकर अपनी सहूलियत की विश्वसनीयता को पैदा कर नये जमाने की आधुनिक पत्रकारिता के अन्दर जान के रूप में फूंक दिया है। ऐसा नहीं कि पहले अखबारों को जीवित रखने के लिये सत्ता या संसाधनों पर काबिज लोगों के संरक्षण की जरूरत नहीं होती थी।
लेकिन तब संरक्षणदाताओं की नीयत इतनी खराब नहीं होती थी और वे स्वयं अपनी या अपने वर्ग की आलोचना को सहन करने सहनशक्ति रखते थे। उनको लोकलाज का डर होता था। लेकिन आज स्थिति भिन्न है। सत्ताधरियों को अप्रिय समाचार देशद्रोह की श्रेणी में रखे जा रहे हैं। सरकारों को भी "सत्य’’ के ये थोक और फुटकर विक्रेता रास आ रहे हैं और इन विक्रताओं की औकात के हिसाब से उनके बिकाऊ "सत्य’’ को खरीदा जा रहा है। सोशियल मीडिया अफवाह फैलाने का प्रमुख साधन बन गया है।
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