हिंदी दिवस पर पुरस्कार की यात्रा
हिंदी दिवस पर हिंदी के प्रति लोगों को उत्साहित करने हेतु पुरस्कार समारोह भी आयोजित किया जाता है। जिसमें कार्य के दौरान अच्छी हिंदी का उपयोग करने वाले को यह पुरस्कार दिया जाता है। यह पहले राजनेताओं के नाम पर था, जिसे बाद में बदलकर राजभाषा कीर्ति पुरस्कार और राजभाषा गौरव पुरस्कार कर दिया गया।
राजभाषा गौरव पुरस्कार ऐसे लोगों को दिया जाता है जिन्होंने भाषा को सम्मान दिलाया हो, जबकि राजभाषा कीर्ति पुरस्कार किसी विभाग, समिति आदि को दिया जाता है। गौरव पुरस्कार व्यक्तिगत होता है और कीर्ति पुरस्कार समूह को दिया जाता है।
गौरव पुरस्कार तकनीकी या विज्ञान के विषय पर लिखने वाले किसी भी भारतीय नागरिक को दिया जाता है। इसमें दस हजार से लेकर दो लाख रुपये के 13 पुरस्कार होते हैं। इसमें प्रथम पुरस्कार प्राप्त करने वाले को दो लाख रूपए, द्वितीय पुरस्कार प्राप्त करने वाले को डेढ़ लाख रुपए और तृतीय पुरस्कार प्राप्त करने वाले को पचहत्तर हजार रुपये मिलता है, साथ ही दस लोगों को प्रोत्साहन पुरस्कार के रूप में दस-दस हजार रूपए प्रदान किए जाते हैं।
पुरस्कार प्राप्त सभी लोगों को स्मृति चिह्न भी दिया जाता है। इसका मूल उद्देश्य तकनीकी और विज्ञान के क्षेत्र में हिंदी भाषा को आगे बढ़ाना है। राजभाषा कीर्ति पुरस्कार योजना के तहत कुल 39 पुरस्कार दिए जाते हैं। यह पुरस्कार किसी समिति, विभाग, मण्डल आदि को उसके द्वारा हिंदी में किए गए श्रेष्ठ कार्यों के लिए दिया जाता है। इसका मूल उद्देश्य सरकारी कार्यों में हिंदी भाषा का उपयोग करने से है।
कई हिंदी लेखकों और हिंदी भाषा जानने वालों का कहना है कि हिंदी दिवस केवल सरकारी कार्य की तरह है, जिसे केवल एक दिन के लिए मना दिया जाता है। इससे हिंदी भाषा का कोई विकास नहीं होता है, बल्कि इससे हिंदी भाषा को हानि होती है। कई लोग हिंदी दिवस समारोह में भी अंग्रेजी भाषा में लिख कर लोगों का स्वागत करते हैं।
सरकार इसे केवल यह दिखाना चाहती है कि वह हिंदी भाषा के विकास हेतु कार्य कर रही है। आज भी अधिकतर सरकारी कार्यालयों का कार्य अंग्रेजी में हो रहा है। यह केवल केन्द्र सरकार में नहीं जिस राज्य की मातृभाषा हिंदी है वहां भी यही हाल है।
अब भी नहीं मिली है हिंदी को यहां जगह
भारत में न्यायालय की भाषा तो अंग्रेजी ही है। खासकर उच्च एवं सर्वोच्च न्यायालयों में हिंदी का तो कोई स्थान ही नहीं है। अभी हाल ही माननीय पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय ने एक याचिकाकर्ता के निवेदन पर हिंदी में लिखित फैसला देने की व्यवस्था की है। वो भी मांगने पर दिया जाएगा जबकि हरियाणा विशुद्ध रूप से हिंदी भाषी राज्य है।
सच पूछिए तो हिंदी दुर्दशा के लिए हिंदी भाषा भाषी भी कम जिम्मेदार नहीं हैं। बिहार, उत्तर प्रदेश, दिल्ली, राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, झारखंड, हरियाणा जैसे हिंदी भाषी राज्यों में किसी प्रकार की सूचना, पोस्टर, बैनर, साइन बोर्ड आदि हिंदी में होता ही नहीं है। इन प्रदेशों के लोग अंग्रेजी बोलने पर गर्व महसूस करते हैं।
सामान्य लोगों का मानना है कि अंग्रेजी में संप्रेषणीयता अधिक है, इसलिए अंग्रेजी से व्यक्तित्व निखरता है। सामान्य से सामान्य आदमी भी अंग्रेजी बोलने वालों के प्रति अच्छी धारणा बना लेता है जबकि ऐसी कोई बात नहीं है। यही नहीं अमूमन यह देखने को मिलता है कि जब कोई हिंदी भाषी ज्ञान में कमजोर पड़ने लगता है तो वह अंग्रेजी में बोलने लगता है।
यही नहीं जब किसी से किसी की लड़ाई होती है तो वह अंग्रेजी में बोलकर अपना प्रभाव जमाने की कोशिश करता है। विडंबना देखिए कि उसका प्रभाव जम भी जाता है। इसलिए यदि हिंदी भाषी चाह लें तो हिंदी इस देश की ही नहीं दुनिया की भाषा हो सकती है। हिंदी में ताकत बहुत है।
यही नहीं हिंदी की पाचन शक्ति भी ज्यादा है। वैसे कुछ लोगों की सोच यह भी है कि विविध कारण बताकर हिंदी दिवस मनाने का विरोध करने और मजाक उड़ाने वाले यह चाहते हैं कि हिंदी के प्रति रही-सही अपनत्व की भावना भी समाप्त की जाए। लोगों को यह अन्य कार्यक्रमों की तरह ही लगता है। इन कार्याक्रमों से कम से कम लोगों में जागृति तो आ रही है।
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