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हिंदी दिवस 2019ः हिंदी को अब भी नहीं मिला है सही सम्मान

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हिंदी दिवस - फोटो : अमर उजाला
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वर्ष 1918 में गांधी जी ने हिंदी साहित्य सम्मेलन में हिंदी भाषा को राष्टभाषा बनाने को कहा था। इसे गांधी जी ने जनमानस की भाषा भी कहा था। स्वतंत्र भारत की राजभाषा के प्रश्न पर 14 सितम्बर 1949 को काफी विचार-विमर्श के बाद यह निर्णय लिया गया, जो भारतीय संविधान के भाग 17 के अध्याय की धारा 343(1) में इस प्रकार वर्णित है कि- संघ की राजभाषा हिंदी और लिपि देवनागरी होगी। संघ के राजकीय प्रयोजनों के लिए प्रयोग होने वाले अंकों का रूप अंतर्राष्ट्रीय रूप होगा। यह निर्णय 14 सितम्बर को लिया गया, इस कारण हिंदी दिवस के लिए इस दिन को श्रेष्ठ माना गया।

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हालांकि जब राजभाषा के रूप में इसे चुना गया और लागू किया गया तो गैर-हिंदी भाषी राज्य के लोग इसका विरोध करने लगे और अंग्रेजी को भी राजभाषा का दर्जा देना पड़ा। इस कारण हिंदी में भी अंग्रेजी भाषा का प्रभाव पड़ने लगा।

हिंदी दिवस के दौरान कई कार्यक्रम होते हैं। इस दिन छात्र-छात्राओं को हिंदी के प्रति सम्मान और दैनिक व्यवहार में हिंदी के उपयोग करने आदि की शिक्षा दी जाती है। जिसमें हिंदी निबंध लेखन, वाद-विवाद हिंदी टंकण प्रतियोगिता आदि होता है। हिंदी दिवस पर हिंदी के प्रति लोगों को प्रेरित करने हेतु भाषा सम्मान की शुरुआत की गई है।
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यह सम्मान प्रतिवर्ष देश के ऐसे व्यक्तित्व को दिया जाता है जिसने जन-जन में हिंदी भाषा के प्रयोग एवं उत्थान के लिए विशेष योगदान दिया है। इसके लिए सम्मान स्वरूप एक लाख एक हजार रुपये दिए जाते हैं। हिंदी में निबंध लेखन प्रतियोगिता के द्वारा कई जगह पर हिंदी भाषा के विकास और विस्तार हेतु कई सुझाव भी प्राप्त किए जाते हैं। लेकिन अगले दिन सभी हिंदी भाषा को भूल जाते हैं।

बोलने वालों की संख्या के अनुसार अंग्रेजी और चीनी भाषा के बाद पूरे दुनिया में हिंदी तीसरी सबसे बड़ी भाषा है लेकिन उसे अच्छी तरह से समझने, पढ़ने और लिखने वालों में यह संख्या बहुत ही कम है। यह और भी कम होती जा रही है। अंग्रेजी के प्रभाव और क्षेत्रीय भाषाओं के आक्रमण ने हिंदी को कमजोर किया है।

 

हिंदी भाषा पर अंग्रेजी के शब्दों का बहुत अधिक प्रभाव हुआ है और कई शब्द प्रचलन से हट गए हैं। - फोटो : फाइल फोटो
हिंदी भाषा पर अंग्रेजी के शब्दों का बहुत अधिक प्रभाव हुआ है और कई शब्द प्रचलन से हट गए हैं। अंग्रेजी के शब्द ने उसकी जगह ले ली है। जिससे भविष्य में हिंदी के विलुप्त होने का खतरा बढ़ गया है। इस कारण ऐसे लोग जो हिंदी का ज्ञान रखते हैं या हिंदी भाषा जानते हैं, उन्हें हिंदी के प्रति अपने कर्तव्य का बोध करवाने के लिए इस दिन को हिंदी दिवस के रूप में मनाने की योजना बनाई गई थी, लेकिन हो उसका उल्टा रहा है।

हिंदी भाषा को भविष्य में विलुप्त होने से बचाने के लिए हिंदी दिवस कारगर साबित हो सकता है, लेकिन हिंदी अनुरागियों की ओर से जो काम होना चाहिए था वह नहीं हो पा रहा है।

दरअसल, सच पूछिए तो हिंदी अपने घर में ही दासी के रूप में रहती है। हिंदी को आज तक संयुक्त राष्ट्र संघ की भाषा नहीं बनाया जा सका है। इसे विडंबना ही कहेंगे कि योग को 177 देशों का समर्थन मिला, लेकिन हिंदी के लिए 129 देशों का समर्थन क्यों नहीं जुटाया जा सका? इसके ऐसे हालात आ गए हैं कि हिंदी दिवस के दिन भी कई लोगों को ट्विटर पर हिंदी में बोलो जैसे शब्दों का उपयोग करना पड़ रहा है।
 
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बोलने वालों की संख्या के अनुसार अंग्रेजी और चीनी भाषा के बाद पूरे दुनिया में हिंदी तीसरी सबसे बड़ी भाषा है - फोटो : फाइल फोटो
हिंदी दिवस पर पुरस्कार की यात्रा 
हिंदी दिवस पर हिंदी के प्रति लोगों को उत्साहित करने हेतु पुरस्कार समारोह भी आयोजित किया जाता है। जिसमें कार्य के दौरान अच्छी हिंदी का उपयोग करने वाले को यह पुरस्कार दिया जाता है। यह पहले राजनेताओं के नाम पर था, जिसे बाद में बदलकर राजभाषा कीर्ति पुरस्कार और राजभाषा गौरव पुरस्कार कर दिया गया।

राजभाषा गौरव पुरस्कार ऐसे लोगों को दिया जाता है जिन्होंने भाषा को सम्मान दिलाया हो, जबकि राजभाषा कीर्ति पुरस्कार किसी विभाग, समिति आदि को दिया जाता है। गौरव पुरस्कार व्यक्तिगत होता है और कीर्ति पुरस्कार समूह को दिया जाता है।

गौरव पुरस्कार तकनीकी या विज्ञान के विषय पर लिखने वाले किसी भी भारतीय नागरिक को दिया जाता है। इसमें दस हजार से लेकर दो लाख रुपये के 13 पुरस्कार होते हैं। इसमें प्रथम पुरस्कार प्राप्त करने वाले को दो लाख रूपए, द्वितीय पुरस्कार प्राप्त करने वाले को डेढ़ लाख रुपए और तृतीय पुरस्कार प्राप्त करने वाले को पचहत्तर हजार रुपये मिलता है, साथ ही दस लोगों को प्रोत्साहन पुरस्कार के रूप में दस-दस हजार रूपए प्रदान किए जाते हैं।

पुरस्कार प्राप्त सभी लोगों को स्मृति चिह्न भी दिया जाता है। इसका मूल उद्देश्य तकनीकी और विज्ञान के क्षेत्र में हिंदी भाषा को आगे बढ़ाना है। राजभाषा कीर्ति पुरस्कार योजना के तहत कुल 39 पुरस्कार दिए जाते हैं। यह पुरस्कार किसी समिति, विभाग, मण्डल आदि को उसके द्वारा हिंदी में किए गए श्रेष्ठ कार्यों के लिए दिया जाता है। इसका मूल उद्देश्य सरकारी कार्यों में हिंदी भाषा का उपयोग करने से है।

कई हिंदी लेखकों और हिंदी भाषा जानने वालों का कहना है कि हिंदी दिवस केवल सरकारी कार्य की तरह है, जिसे केवल एक दिन के लिए मना दिया जाता है। इससे हिंदी भाषा का कोई विकास नहीं होता है, बल्कि इससे हिंदी भाषा को हानि होती है। कई लोग हिंदी दिवस समारोह में भी अंग्रेजी भाषा में लिख कर लोगों का स्वागत करते हैं।

सरकार इसे केवल यह दिखाना चाहती है कि वह हिंदी भाषा के विकास हेतु कार्य कर रही है। आज भी अधिकतर सरकारी कार्यालयों का कार्य अंग्रेजी में हो रहा है। यह केवल केन्द्र सरकार में नहीं जिस राज्य की मातृभाषा हिंदी है वहां भी यही हाल है।

अब भी नहीं मिली है हिंदी को यहां जगह 
भारत में न्यायालय की भाषा तो अंग्रेजी ही है। खासकर उच्च एवं सर्वोच्च न्यायालयों में हिंदी का तो कोई स्थान ही नहीं है। अभी हाल ही माननीय पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय ने एक याचिकाकर्ता के निवेदन पर हिंदी में लिखित फैसला देने की व्यवस्था की है। वो भी मांगने पर दिया जाएगा जबकि हरियाणा विशुद्ध रूप से हिंदी भाषी राज्य है।

सच पूछिए तो हिंदी दुर्दशा के लिए हिंदी भाषा भाषी भी कम जिम्मेदार नहीं हैं। बिहार, उत्तर प्रदेश, दिल्ली, राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, झारखंड, हरियाणा जैसे हिंदी भाषी राज्यों में किसी प्रकार की सूचना, पोस्टर, बैनर, साइन बोर्ड आदि हिंदी में होता ही नहीं है। इन प्रदेशों के लोग अंग्रेजी बोलने पर गर्व महसूस करते हैं।

सामान्य लोगों का मानना है कि अंग्रेजी में संप्रेषणीयता अधिक है, इसलिए अंग्रेजी से व्यक्तित्व निखरता है। सामान्य से सामान्य आदमी भी अंग्रेजी बोलने वालों के प्रति अच्छी धारणा बना लेता है जबकि ऐसी कोई बात नहीं है। यही नहीं अमूमन यह देखने को मिलता है कि जब कोई हिंदी भाषी ज्ञान में कमजोर पड़ने लगता है तो वह अंग्रेजी में बोलने लगता है।

यही नहीं जब किसी से किसी की लड़ाई होती है तो वह अंग्रेजी में बोलकर अपना प्रभाव जमाने की कोशिश करता है। विडंबना देखिए कि उसका प्रभाव जम भी जाता है। इसलिए यदि हिंदी भाषी चाह लें तो हिंदी इस देश की ही नहीं दुनिया की भाषा हो सकती है। हिंदी में ताकत बहुत है।

यही नहीं हिंदी की पाचन शक्ति भी ज्यादा है। वैसे कुछ लोगों की सोच यह भी है कि विविध कारण बताकर हिंदी दिवस मनाने का विरोध करने और मजाक उड़ाने वाले यह चाहते हैं कि हिंदी के प्रति रही-सही अपनत्व की भावना भी समाप्त की जाए। लोगों को यह अन्य कार्यक्रमों की तरह ही लगता है। इन कार्याक्रमों से कम से कम लोगों में जागृति तो आ रही है।


डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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