यदि अमित शाह ने कहा कि हिंदी को देशव्यापी संपर्क भाषा के रूप में अंग्रेजी का विकल्प बनना चाहिए तो इसमे गलत कुछ भी नहीं है, क्योंकि सरकार न चाहे तो भी वैश्वीकरण और बाजार की व्यापकता ने हिंदी को नए पंख दे दिए हैं। धुर दक्षिण के राज्यों को छोड़ दें तो आज 28 में से 25 राज्यों की युवा पीढ़ी हिंदी से वाकिफ है, उसका अपने ढंग से प्रयोग करती है।
बढ़ा है हिंदी का दायरा
यूं देश में घोषित रूप से हिंदी भाषी राज्य 10 ही हैं, लेकिन अन्य 15 राज्यों में उसकी उपस्थिति महत्वपूर्ण और दूसरी प्रमुख भाषा के रूप में है। पूर्वोत्तर के राज्यों में जिस तरह बिहारी और नेपाली लोगों ने हिंदी का प्रसार किया है, वह चौंकाता है। मिजोरम और नागालैंड के कुछ हिस्सों को छोड़ दें तो हिंदी वहां हर जगह समझी और अपने अंदाज में बोली भी जाती है।
तकरीबन यही स्थिति देश के उत्तर पश्चिमी राज्यों में है। मातृ भाषा के तौर हिंदी बोलने वालों की संख्या सबसे ज्यादा बढ़ी है।
आज देश के 52.8 करोड़ लोग यानी देश की 43.6 फीसदी आबादी की मातृभाषा है। करीब 13.9 करोड़ लोगों के लिए हिंदी दूसरी भाषा है। कुल मिलाकर यह आंकड़ा देश की कुल आबादी का 55 फीसदी से अधिक होता है। हिंदी बोलने समझने वालों की संख्या पिछले 40 सालो में 161 फीसदी बढ़ी है।
अन्य भारतीय भाषाओं का दायरा मुख्य रूप से सम्बन्धित राज्यों तक ही सिमटा है। हिंदी की स्वीकार्यता बढ़ने के पीछे सबसे बड़ा कारण है, उसका अपेक्षाकृत सरल और सर्वग्राही होना। यही कारण है कि मानक हिंदी के साथ-साथ उसके स्थानिक रूप भी मान्य हैं। वह संचारक्षम है और आपकी बात को देश में ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचाती है।
इसका सबसे बढि़या उदाहरण हिंदी टीवी चैनल हैं, जिन पर आजकल वो लोग भी हिंदी में बात करते दिखते हैं, जो पहले हिंदी के नाम पर नाक भौं सिकोड़ते थे। पिछले दिनों हिंदी की बोलियों को हिंदी से अलग करने की कोशिशें हुईं, लेकिन नाकाम रहीं।
हिंदी को राष्ट्रभाषा के रूप में स्वीकारने में समस्या क्या है?
यहां सबसे बड़ा और अहम सवाल यह है कि भारत एक विदेशी भाषा को आखिर कब तक ढोता रहेगा? क्या यह स्थिति अनंतकाल तक चलने दी जा सकती है? हम अपनी ही भाषा को राष्ट्रभाषा के रूप में स्वीकार क्यों नहीं कर सकते? वोट के लिए भाषा की राजनीति जरूरी हो सकती है, लेकिन भाषा केवल वोटों की पगडंडी के सहारे नहीं बढ़ती, न बढ़ सकती है।
आत्म सम्मान, भाषा के चलने वाला गौरव, ज्ञान-विज्ञान, राष्ट्र प्रेम और सांस्कृतिक अभिमान किसी भी भाषा को लोकप्रिय और व्यापक बनाता है। जिस देश में दर्जनों भाषाएं बोली और लिखी जाती हों, जिनके साथ क्षेत्रीय अस्मिता और इतिहास भी जुड़ा हो, उनका राष्ट्रीय विकल्प केवल हिंदी ही हो सकती है। क्योंकि हिंदी का स्वभाव उस गंगा की तरह है, जो दूसरी नदियों को अपने साथ समाहित करती हुई स्वयं महानदी बनकर आगे बढ़ती है। शाह स्वयं अहिंदी भाषी हैं, लेकिन उन्होंने जो कहा है, जो भविष्य की आहट है, इसमें दो राय नहीं।
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