फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

प्रकृति से एकात्मता के लोकपर्व: जुड़ शीतल और सतुआन

सार

वहीं, घर के बड़े बुजुर्ग इस जल को परिवार जनों पर छिड़क उनके मंगलमय भविष्य की कामना करते है। इस दौरान वे लोकबोली मे प्रफुल्लित प्रसन्नचित और परिपूर्ण रहने की प्रार्थना भी करते है। जुड़ शीतल का अर्थ ही है शांत संतुष्ट और संपूर्ण। इस दौरान कलश जल का छिड़काव आस-पड़ोस के मार्ग और गोशाल मे भी करते है।
विज्ञापन
इस वर्ष यह पर्व 14 अप्रैल को मनाया जा रहा है - फोटो : https://www.facebook.com/nishu.gunjan
विज्ञापन

विस्तार
वॉट्सऐप चैनल फॉलो करें

यूं तो हर भारतीय पर्व प्रकृति से जुड़ा संस्कृति उत्सव आयोजन है। यहां सर्वत्र प्रकृति संस्कृति संग अनुष्ठानों की महत्ता होती है। किंतु लोकपर्व अपवाद है। वास्तव में ये लोकचेतना के वो पर्व है जहां परम्पराओं की महत्ता अनुष्ठान से अधिक है। यहां परम्पराओं संग पूजा का महत्व होता है। ये प्रकृति और परमात्मा से जुड़ाव का देशज तौर तरीका है। यहां आप सौभाग्य और कामना पूर्ति के लिए सहज भाव से पूजा आराधना करते है। ऐसा ही एक लोकपर्व जुड़ शीतल और सतुआन है। इस वर्ष यह पर्व 14 अप्रैल को मनाया जा रहा है। पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार संग नेपाल के तराई क्षेत्र में इस उत्सव की बेहद धूम होती है। बिहार और नेपाल के मैथिली भाषी क्षेत्र मे यह जुड़ शीतल तो शेष जगह सतुआन नाम से प्रचलित है।

विज्ञापन


भोजन प्रसाद सामग्री और नाम के अलावा इसमें कोई अंतर नहीं है। मिथिला भाषी क्षेत्रों मे चावल तो अन्य स्थानों पर सत्तू की प्रधानता है। यह पर्व वैशाख संक्रांति को प्रतिवर्ष आता है। तब सूर्य मीन से मेष राशि में प्रवेश करते है। बात हिंदू मान्यताओं की करे तो यह एक पुण्यकाल है। तब सूर्य और चंद्र रश्मियों में अमृत तुल्य आरोग्यवर्धक तत्व होते है। इसलिए रात्रि को मिट्टी के घड़ों में जल भर कर रखा जाता है। वहीं आम पल्लवों से इनके मुख को ढका जाता है। रात्रि को चावल भात बना उसे पानी मे भींगो दिया जाता है। जबकि कुछ स्थानों पर कढ़ी बड़े इत्यादि बनाने का भी चलन है। अगले दिन कलश जल का छिड़काव आम्र पल्लव द्वारा घर के हर कोने में किया जाता है।

वहीं, घर के बड़े बुजुर्ग इस जल को परिवार जनों पर छिड़क उनके मंगलमय भविष्य की कामना करते है। इस दौरान वे लोकबोली मे प्रफुल्लित प्रसन्नचित और परिपूर्ण रहने की प्रार्थना भी करते है। जुड़ शीतल का अर्थ ही है शांत संतुष्ट और संपूर्ण। इस दौरान कलश जल का छिड़काव आस-पड़ोस के मार्ग और गोशाल मे भी करते है। जबकि शेष जल का उपयोग घर के आसपास लगे पौधों की सिंचाई मे करते है। यह उपक्रम समस्त प्रकृति के मंगल कल्याण हेतु किया जाता है। उत्सव के दिन रसोई घर को धोया लीपा जाता है। इस दिन कुछ घरों में रसोई बनता है अन्यथा पूर्व संध्या बने भोजन और चढ़ाए प्रसाद से काम चलाया जाता है।
विज्ञापन

  
 

विज्ञापन

satuani new - फोटो : https://www.facebook.com/sadhana.shrivastava.140
यह नवीन फसल का भी पर्व है अतः नये आये अन्न फल का उपयोग पूजा में किया जाता है। परंपरानुसार इस पर्व के बाद से ही इनका उपयोग शुरू होता है। इस दिन नए अन्न फल देवताओं को अर्पण, पितरों को तर्पण कर कुटुंबीजनों के साथ ग्रहण का विधान है। लोग स्नान के साथ पितरों को जलांजलि, तिलांजलि देते है। वही इस अवसर पर अपने और पितरों के कल्याणार्थ दान की भी परंपरा है। कई लोग अन्न फल, पंखा और घड़ा, जलपात्र का दान करते है। इस पर्व के विधानों का सीधा संबंध ऋतु और प्रकृति से है। बात भोजन की हो तो रात्रि का भींगा भात जहां जॉन्डिस तो सहजन की सब्जी चिकन पॉक्स का

रामबाण तोड़ है। वही दही की कढ़ी पेट को शीतल रखती है। जबकि जौ सत्तू एक पौष्टिक शीतल आहार है। कच्चे आम और पुदीना की चटनी लू के थपेड़ों का देशज इलाज है। इसलिए प्रसाद रूप में देवताओं को जौ सत्तू और कच्चे आम चढ़ाते हैं। ये सभी आरोग्य कारक एवं वर्धक है। जल का छिड़काव और पौधों में पानी मौसम अनुकूल कार्य है। जबकि मिट्टी घड़ों का उपयोग इसके लाभकारी गुणों के नाते किया जाता है। यह मिट्टी एवं धूल मे सनने खेलने का भी दिन है। लोग जलाशयो मे उतर गीली मिट्टी लगाते और दूसरों पर फेकते है। शरीर पर लगे ये धूल मिट्टी प्राकृतिक चिकित्सा का एक अंग है।

वही इस स्नान खेल के बहाने सामूहिक प्रयासों से नदी तालाबों की सफाई भी हो जाती है। जुड़ शीतल और सतुआन पर्व बिन गीतों के अधूरे है। इस अवसर के लिए कई मैथिली गीत है। जबकि यूपी बिहार और नेपाल के दूसरे क्षेत्र में भक्ति और ऋतु गीतों की प्रधानता है। यहां गंगा स्नान को जाते श्रद्धालु मां गंगा के भक्ति गीत गुनगुनाते है। वहीं उत्सव के आगमन प्रतीक्षा में चैता,चैती और चैतावर जैसे ऋतु गीत गाए जाते है। कही-कही मेलों का भी चलन है। ऐसा ही एक मेला बिहार के मधुबनी मे लगता है। लौकही के इस झहुरी मेले में नेपाल के सुदूर स्थानों से भी लोग आते है। बदलते दौर में आवश्यकता है की इन लोक उत्सवों को प्रचारित किया जाए। ये प्रकृति संस्कृति संरक्षण संदेश के साथ ही सांस्कृतिक पर्यटन के भी अवसर हो सकते है।

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।  
और पढ़ें...
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें