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सिद्धार्थ: सौ साल पहले प्रकाशित रचना आज भी महत्वपूर्ण

सार

रॉयल अकादमी ऑफ साइंसेस के अध्यक्ष सिगर्ड करमैन ने कहा था कि हरमन हेस साहित्य के क्षेत्र में आत्मा के रोगाणुओं के विरुद्ध अपना संग्राम लिए चलते हैं। उन्होंने कविताओं और कहानियों की अपनी विशिष्ट शैली में हमें इस दलदल से ऊपर उठने का मार्ग दिखाने का प्रयास किया है।
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विस्तार
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नोबेल पुरस्कृत हरमन हेस ने आज से सौ साल पहले एक छोटा-सा उपन्यास ‘सिद्धार्थ’ लिखा था। कलेवर में भले ही यह छोटा है मगर इसके निहितार्थ गूढ़ और बड़े हैं। यही कारण है कि एक समय एक पूरी पीढ़ी को इसने प्रभावित किया। यह आज भी राह दिखाने में सक्षम है। नोबेल पुरस्कृत हरमन हेस ने बहुत कहानियाँ (‘स्टोरीज ऑफ फाइव डिकेड्स’ ‘द फेयरी टेल्स ऑफ हरमन हेस’) और उपन्यास (‘डेमियन’, ‘सिद्धार्थ’, ‘स्टेफ़ेनवुल्फ़’, ‘नार्सिसेस एंड गोल्डमंड’, ‘द ग्लास बीड गेम’ अथवा ‘मेजिस्टर लुडी’, लिखे। ‘नार्सिसेस एंड गोल्डमंड’ उनका सर्वाधिक प्रसिद्ध उपन्यास है और इस पर एक बहुत खूबसूरत फ़िल्म भी बनी है।

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इसी नाम से 2020 में ऑस्कर प्राप्त फिल्म निर्देशक स्टेफन रुजविस्की ने 118 मिनट की फिल्म जर्मन भाषा में बनाई है, जो इंग्लिश सबटाइटिल्स के साथ उपलब्ध है। उन्होंने कविताएं (‘द सोलाक ऑफ़ नाइट’, ‘न्यू पोयम्स’) और लेख तथा यात्रा वृतांत भी लिखे। उनकी किताबों की विश्व की 60 भाषाओं में अनुवाद हुआ है और उनकी किताबों के कई-कई संस्करण निकले हैं। हरमन हेस आजीवन अस्तित्व के प्रश्न से जूझते रहे। उन्होंने द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान कई लोगों को शरण दी। जब उन्होंने युद्ध का विरोध किया तो उन्हें लोगों की आलोचना झेलनी पड़ी। इससे उनके मानसिक स्वास्थ्य पर असर पड़ा, उन्हें मनोविज्ञान की शरण में जाना पड़ा। मगर उन्होंने मनोविश्लेषण के दौरान हुए अपने अनुभवों का भी अपने लेखन में उपयोग किया।

2 जुलाई 1877 को जर्मनी के कालव ब्लैक फोरेस्ट, एक ऐसे परिवार में हरमन हेस ने जन्म लिया था जो कट्टर धार्मिक परिवार था। हरमन की मां एक ईसाई मिशनरी की बेटी थी और पिता जॉन हेस खुद कट्टर धार्मिक मिशनरी थे। नाना हरमन कई भाषाओं के विद्वान थे, भारत में रहते हुए उन्होंने मलयालम का व्याकरण और शब्दकोश तैयार किया था। इसके बावजूद उसके नाना, माँ और पिता का मानना था कि उनका और मात्र उनका धर्म सर्वोपरि है। वे दूसरे धर्मों के प्रति अच्छा विचार नहीं रखते थे। ये लोग पेयटिस्ट स्वाबियन (लुथरियनवाद) का कट्टरता से पालन करने वाले लोग थे।
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अत: चाहते थे कि बालक हरमन भी पादरी और मिशनरी बने। मगर बालक लेखक बनना चाहता था इसलिए सेमीनरी (धार्मिक मठ) से भाग निकला। बचपन में घर और सेमीनरी के कठोर अनुशासन ने उनका बहुत नुकसान किया। उनका सारा लेखन आत्मकथात्मक है। हर उपन्यास में उन्होंने अपने अनुभवों को पिरोया है।

वे खूब पढ़ाकू थे। नाना की लाइब्रेरी से उन्होंने विभिन्न भाषाओं की खूब किताबें पढ़ी थीं। 1946 में उन्हें साहित्य का नोबेल पुरस्कार प्राप्त हुआ। नोबेल समिति ने घोषणा की, ‘उनका ओजस्वी लेखन साहस तथा अंतर्दृष्टि में निरंतर विकसित होने के साथ परम्परागत मानवीय आदर्शों तथा उच्च कोटि की शैली के गुणों का दृष्टांत है।’ उनकी शैली सदैव प्रशंसनीय, विद्रोह में सटीक तथा शांत दार्शनिक चिंतन में परमानंद है।

रॉयल अकादमी ऑफ़ साइंसेस के अध्यक्ष सिगर्ड करमैन ने जो कहा वो भी गौरतलब है। उन्होंने कहा कि हरमन हेस साहित्य के क्षेत्र में आत्मा के रोगाणुओं के विरुद्ध अपना संग्राम लिए चलते हैं। उन्होंने कविताओं और कहानियों की अपनी विशिष्ट शैली में हमें इस दलदल से ऊपर उठने का मार्ग दिखाने का प्रयास किया है। वे हम सबके लिए युवा जोसेफ नेट के सिद्धांत के रूप में पुकारते हैं, ‘आगे बढ़ो, उच्चतर चढ़ो, स्वयं को विजय करो!’ आपको इस वाक्य में कठोपनिषद का संदेश, ‘उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत। क्षुरस्य धारा निशिता दुरत्यया दुर्गं पथस्तत्कवयो वदन्ति।।’ (उठो, जागो और श्रेष्ठ जनों के सानिध्य में बोध प्राप्त करो। मनीषियों का कहना है कि ज्ञान प्राप्ति का मार्ग छुरे की पैनी धार पर चलने जैसा दुर्गम है।) सुनाई देगा। इसी उस्तरे जैसी तीखी धार पर चलने का बीहड़ कार्य हरमन हेस अपने जीवन और लेखन में सारी जिंदगी करते रहे। ‘सिद्धार्थ’ में भी वे यह करके दिखाते हैं।

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1922 में उसका प्रसिद्ध उपन्यास ‘सिद्धार्थ’ प्रकाशित हुआ था। इस उपन्यास ने कई पीढ़ियों को – पाठकों, लेखकों तथा विचारकों को प्रेरित तथा प्रभावित किया। भारतीय पृष्ठभूमि में स्थित इस उपन्यास का नायक ब्राह्मण पुत्र सिद्धार्थ सुख-सुविधा छोड़ कर आध्यात्मिक खोज में जुटा हुआ है। वह अपने कुल की धार्मिक बातों का त्याग करता है, गौतम बुद्ध से मिलता है मगर उनकी शरण में नहीं जाता है। दुनियादारी में पड़ता है, व्यापार करता है, जुआ खेलता है, पुत्र उत्पन्न करता है। मगर कहीं ठहरता नहीं है। इस उपन्यास में प्रयुक्त नाम बहुत मानीखेज हैं। एक नाविक है जो सिद्धार्थ को उस पार उतारता है उसका नाम वासुदेव है। वह सिद्धार्थ को नदी को सुनने और उससे सीखने की बात कहता है। वासुदेव कृष्ण का भी नाम है। सिद्धार्थ स्वयं गौतम बुद्ध का नाम है। उसके बचपन के दोस्त का नाम गोविंद है, जो कृष्ण का ही एक नाम है। यहाँ उन्होंने पूर्व के धर्मों, युंग के आद्यरूपों, पश्चिम के व्यक्तिवाद का मिश्रण किया है। सिद्धार्थ जीवन का सत्य अर्थ खोज रहा है। उसे नदी से ज्ञान प्राप्त होता है। नदी उसे सिखाती है कि प्रवाह सतत है, आवागमन चलता रहता है, साथ ही यह शाश्वत है।

संयोग की बात है इस वर्ष 2022 में इस पतले से उपन्यास के प्रकाशन के सौ वर्ष हुए हैं। निर्देशक कोन्राड रूक्स ने 1972 में इस उपन्यास के आधार पर इसी नाम से फिल्म बनाई। ऋषिकेश और भरतपुर में इसकी शूटिंग हुई जहाँ के दृश्यों को स्वेन निकविस्ट ने अपने कैमरे में बड़ी खूबसूरती से पकड़ा है। नायक सिद्धार्थ की भूमिका शशि कपूर ने की है और सिमी गरेवाल कमला तथा रोमेश शर्मा गोविंद की भूमिका में हैं। ज़ुल वेलानी वासुदेव बने हैं। हेमंत कुमार का संगीत है तथा गीत गौरीप्रसन्ना के हैं। बांग्ला गीत ‘पथेर क्लान्ति भूले’ तथा ‘ओ नदिरे एकटि कोथा...’ का उपयोग भी हुआ है। दर्शकों ने फ़िल्म को पसंद किया। उस समय भारत में सेंसर बोर्ड को इसके कई दृश्यों पर आपत्ति थी।

ब्राह्मण पुत्र सिद्धार्थ बड़ा होनहार और तेज दिमाग लड़का था। उसे प्रकृति से लगाव था इसलिए वो अधिकतर घर से बाहर रहा करता था। उसका मन जंगलों, पहाड़ों में घूमने तथा साधु-संतों की संगत में रमता था। सिद्धार्थ को अपने पिता से ज्ञान की बातों पर चर्चा करना भी अच्छा लगता था। सिद्धार्थ का बचपन का मित्र गोविंद भी ब्राह्मण पुत्र था। दोनों साथ मिलकर ध्यान और योग का अभ्यास करते थे। सिद्धार्थ अपनी साधना और ध्यान के प्रति पूरी तरह से समर्पित था। उसके पिता को अपने प्रतिभावान पुत्र पर बहुत गर्व था। सिद्धार्थ ज्ञान पिपासू था, बहुत कुछ सीखना चाहता था। पिता चाहते थे वह उनकी तरह ज्ञानी और धार्मिक बने। मगर तेजस्वी सिद्धार्थ आम लोगो से अलग और विशिष्ट था। जाहिर-सी बात है सिद्धार्थ माँ का दुलारा था। लेकिन सबसे बढ़ कर उसका दोस्त गोविंद उसे चाहता था। गोविंद सदा उसके साथ रहा। दोनों ने भिन्न राह पकड़ी पर वे मित्र बने रहे।

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साधु-संतों की संगत से सिद्धार्थ को तृप्ति नहीं मिलती थी उसे उनकी बातों-व्यवहारों में कुछ कमी अनुभव होती। धीरे-धीरे सिद्धार्थ सबसे दूर होता चला गया। उसके मन में सदैव प्रश्न उठा करते। उसके मन में शांति नहीं थी। वह जितना सोचता उतना और परेशान होता जाता। एक दिन सिद्धार्थ और गोविंद एक वट के पेड़ के नीचे ध्यान करने बैठे, शाम को गोविंद की ध्यान साधना पूरी हुई लेकिन सिद्धार्थ अभी भी गहरे ध्यान में डूबा हुआ था। उसे लगा कि घोर कष्ट सहने से मोक्ष की प्राप्ति होती है। उसने गोविन्द को तपस्वी बनने का अपना निर्णय सुनाया।

सिद्धार्थ ने पिता को भी यह बताया उसे विश्वास था कि पिता इस बात सहर्ष राजी हो जाएंगे पर उसके पिता ने बहुत समय तक कोई उत्तर नहीं दिया। उन्हें विश्वास था कि पुत्र उनके बताये मार्ग पर चलेगा और उनका यश फैलाएगा। जब उन्होंने देखा रात भर एक स्थान पर स्थिर खड़ा सिद्धार्थ अपने निश्चय पर अटल है तो उन्होंने उसकी बात मान ली पर वे प्रसन्न न थे। माँ से मिलने के बाद सिद्धार्थ ने घर छोड़ दिया। गोविन्द भी उसके साथ चला। सिद्धार्थ और गोविंद को तपस्वियों की एक टोली मिली जिनकी संगत में रहते हुए उन्हें कठोर जीवन की आदत पड़ गई।

सिद्धार्थ लोगो को काम पर जाते देखता तो सोचता ‘एक आम जिंदगी जीने में भला क्या सुख है ? कहीं ये लोग खुश रहने का नाटक तो नहीं कर रहे?’ उसका मन अब भी शांत न था। सिद्धार्थ ने दर्द, भूख और प्यास सहना सीख लिया। सिद्धार्थ और गोविन्द बहुत सारी बातों पर चर्चा करते थे। सिद्धार्थ के मन में को तपस्वियों के साथ रहने, कय़्होअर तपस्या के बाद भी मोक्ष की आशा नहीं दीख रही थी। मगर गोविंद काफ़ी संतुष्ट लगता था। करीब तीन साल के बाद एक दिन उस इलाके में गौतम बुद्ध आए। बुद्ध संसार के हर सुख- दुःख से ऊपर उठ चुके थे। उन्होंने अनुभव से ज्ञान की प्राप्ति किया था और वे इस ज्ञान को संसार में वितरित करने के लिए अपने शिष्यों के साथ घूम रहे थे। उनके चेहरे पर अद्भुत शांति थी। उनकी शरण में आने वाला मनुष्य धन्य हो जाते थे।

गोविन्द भगवान बुद्ध के दर्शन के लिए व्याकुल हो रहा था पर सिद्धार्थ उनकी ज्ञान और दर्शन की बातों से बहुत प्रभावित न था। फ़िर भी वह गोविंद के साथ बुद्ध से मिलने जाता है। सिद्धार्थ को बुद्ध के चेहरे पर अद्भुत तेज़ दीखा, उनकी भाव-भंगिमा एकदम शांत थी। उन्हें देखकर एक पूर्णता और पवित्रता का एहसास होता था। गोविंद बुद्ध का शिष्यत्व स्वीकार करता है और सिद्धार्थ ज्ञान की खोज में दूसरी राह पकड़ता है।
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नदी किनारे पहुंच कर नाविक से उसने कहा, ‘क्या तुम मुझे नदी के उस पार ले चलोगे? मेरे पास तुम्हें देने के लिए कुछ भी नहीं है।’ नाविक उस पार उतारता है। शहर में खूबसूरत कमला उस पर जादू सा प्रभाव डालती है। कमला उसे प्रेम का पाठ पढ़ाती है। वह एक अमीर व्यापारी कामास्वामी घर में रह जीवन की हर सुख- सुविधा का आनंद लेने लगता है। वह स्वयं भी खूब धन अर्जित करता है। कमला को बहुमूल्य उपहार देता है। पर एक रात उसे अचानक सब कुछ याद आ गया कि वो कौन है और उसने किस उद्देश्य से घर छोड़ा था। उसने आत्मचिंतन करना ही छोड़ दिया था। सांसारिक जीवन से तंग आकर वो एक आम के पेड़ के नीचे बैठकर अपने जीवन के बारे में सोचने लगा। उसे गोविंद याद आया, गौतम बुद्ध याद आए।

एक बार वह फ़िर सब छोड़ कर अपनी आत्म अन्वेषण की यात्रा पर निकल पड़ता है। वह पुन: उसी नाविक वासुदेव से मिलता है। वासुदेव उसे नदी से सीखने की सलाह देता है। सिद्धार्थ नदी से बहुत कुछ सीखता है। वह वासुदेव के साथ रहते हुए नाविक का काम करता है। एक दिन गोविंद उसकी नाव से नदी पार करता है दोनों मिलते हैं बातें करते हैं और गोविंद अपनी राह चला जाता है वह बौद्ध सन्यासी बन गया है। कमला भी सिद्धार्थ के जाने के बाद दुनियादारी से कट कर बुद्ध की शरण में जाती है और एक दिन इसी नदी की राह पर सिद्धार्थ की बाहों में मृत्यु को प्राप्त होती है। वह ग्यारह साल का अपना पुत्र (सिद्धार्थ का भी तथा उसका नाम भी सिद्धार्थ है।) उसके पास छोड़ जाती है। सिद्धार्थ पुत्र मोह में पड़ता है मगर उसका पुत्र उसी की तरह जिद्दी है और किसी की नहीं सुनता है। यह पुत्र भी एक दिन चला जाता है।

एक बार सिद्धार्थ आत्महत्या का प्रयास करता है तभी उसकी अंतरात्मा से ‘ॐ’ ध्वनि आती है और उसे अपनी मूर्खता का पता चलता है। आयु वृद्धि होने पर भी उसका हृदय निर्मल था। वह अपने समस्त अनुभव वासुदेव के साथ साझा करता है। वासुदेव उसकी बात ध्यान से सुनता है तथा उसे नदी को सुनने और उससे सीखने के लिए कहता है। वासुदेव स्वयं भी यही करता है।

एक दिन अचानक सिद्धार्थ को अपने जीवन का लक्ष्य मिल जाता है उसे पता चलता है कि परमात्मा के साथ अपनी आत्मा को एकाकार करना ही उसका जीवन लक्ष्य है। जब सारा संसार उसका अपना था तो फिर दुःख कैसा? सिद्धार्थ को सब करीबी और अपने लोगों का चेहरा नदी में दिखता है। उसे अपना चेहरा भी नदी के स्वच्छ जल में दिखता है। पर तत्काल ये आकृतियाँ नदी के जल में मिल कर विलीन हो जाती हैं। इसके साथ ही नदी की आवाज़ में एक मिठास और ख़ुशी झलक रही थी। और उसके अंत:करण से एक साफ़ ध्वनि ‘ॐ’ उभरी। सिद्धार्थ ने अपने जीवन का लक्ष्य पा लिया था। उसने नदी की तरह सब कुछ अपने अंदर प्रवाहित होने दिया। नदी कभी रूकती नहीं, कठिनाइयों से संघर्ष करती हुई आगे बढ़ती रहती है।

जब गोविंद सिद्धार्थ से मिला था तो उसने सिद्धार्थ से ज्ञान प्राप्ति का उपाय पूछा था मगर सिद्धार्थ ने इस विषय में उसे कुछ नहीं बताया क्योंकि सिद्धार्थ ने समझा था कि किसी को शिक्षा दी जा सकती है पर किसी मनुष्य को ज्ञान नहीं दिया जा सकता है। ज्ञान का अन्वेषण स्वयं करना पड़ता है। उसे यह बोध भी हुआ था कि ज्ञान का द्वारा अंतर से खुलता है बाहर से उसे नहीं खोला जा सकता है। हरमन हेस का यह उपन्यास ‘सिद्धार्थ’ मनुष्य को सौ साल बाद भी मनुष्यता की राह सुझाने की क्षमता रखता है। यही इस उपन्यास की शक्ति है।
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डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।
 
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