दोस्ती में नो कन्सेशन, ओनली प्रोफेशन
'ये एक साझा समझौता है हमारे बीच। केशव अगर मेरी बाइक ले जाएगा तो पेट्रोल भी वही भरवाएगा। बर्गर या पिज्जा खाने के बाद बारी बारी से सबका बिल चुकाने का मौका आएगा।' कहते हैं एमबीए फाइनल ईयर के छात्र मितेश। केशव, मितेश और देवांश, इन तीन दोस्तों की तिकड़ी स्कूल टाइम से अब तक शायद इसलिए ही टिकी हुई है। देवांश कहते हैं- 'हम तीनों मिडिल क्लास से हैं। स्कूल टाइम से एक-दूसरे को जानते हैं। हम ही नहीं हमारे परिवारों को भी इस दोस्ती का पता है। हम तीनों ही पैसे के लेन-देन को क्लियर रखते हैं।
हमें पता है कि हमारे घरों में किस तरह से हर महीने का बजट मैनेज होता है। इसलिए हमारा हिसाब किताब एकदम साफ होता है। जरूरत पड़ती है तो हम एक दूसरे की मदद भी करते हैं, लेकिन लंबा उधार नहीं रखते। शायद इन वजह से भी हमारी दोस्ती टिकी हुई है, क्योंकि अक्सर दोस्ती में दरार की वजह पैसों का लेन-देन भी बन जाता है।'
सखी या सखा की गप्पें
पच्चीस साल पुरानी है अड़ोस-पड़ोस में रहने वाली उमा और निर्मला की दोस्ती। ठीक तबसे जब उमा ब्याह कर इस घर में आई थीं और पड़ोस में कुछ ही महीने पहले आई नई ब्याहता निर्मला ने उन्हें बहन की तरह सहेज लिया। आज दोनों घरों में रिश्तेदारों से ज्यादा अपनापन है। दोनों के पति और बच्चे भी जानते हैं कि शाम की 6 बजे से साढ़े छह तक दोनों अपनी-अपनी मुंडेर पर खड़ी गप्पें मारेंगी। इसलिए उस समय कोई व्यवधान नहीं डालता। दोनों घरों में राशन और सब्जी भाजी से लेकर त्योहारों की खरीदारी और ब्याह शादी का व्यवहार तक एक-दूसरे की राय के बिना नहीं होता। घर के बच्चों की ऐश है, क्योंकि निर्मला के बच्चों को मालूम है अगर घर मे उनकी पसंद की सब्जी नहीं बनी तो भागकर उमा आंटी के घर चले जाना है और उमा के बच्चे जानते हैं कि हर संडे छोले-पूरी या आलू पराठे का नाश्ता निर्मला आंटी के घर ही मिलेगा। इसलिए ये दोस्ती सालों से कायम है।
दोस्ती के तरीके और संबोधन भले ही बदल गए हों, पर अब भी भावना वही है। सच्ची दोस्ती में अगर मेरे साथ न हुआ तो तू मेरा भाई नहीं है।