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God Particle Explained: गॉड पार्टिकल का रहस्य और हमारे अस्तित्व की कहानी

सार

आखिर इस सृष्टि का निर्माण कैसे हुआ? इस यूनिवर्स की अद्भुत इंजीनियरिंग के पीछे किसका हाथ है? क्या इस जगत का कोई निर्माता है? या ये ब्रह्मांड रेंडमली कुछ नहीं से सब कुछ बना? ये सवाल आज भी रहस्य हैं।
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हमारे इस खूबसूरत ब्रह्मांड के पीछे हिग्स फील्ड की इंजीनियरिंग ही काम कर रही है। - फोटो : Amar Ujala
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विस्तार
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आखिर इस सृष्टि का निर्माण कैसे हुआ? इस यूनिवर्स की अद्भुत इंजीनियरिंग के पीछे किसका हाथ है? क्या इस जगत का कोई निर्माता है? या ये ब्रह्मांड रेंडमली कुछ नहीं से सब कुछ बना? ये सवाल आज भी रहस्य हैं। वहीं ज्यों-ज्यों इंसान की समझ बढ़ती जा रही है। वह कुदरत की इस अद्भुत बनावट के पीछे के रहस्य को खंगालता जा रहा है।

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बिग-बैंग थ्योरी के अनुसार 13.8 अरब साल पहले हमारा यह ब्रह्मांड एक छोटे से एटम जितने बिंदू में कैद था। अचानक हुए एक महाविस्फोट के बाद ये जगत अस्तित्वमान हुआ। बिग-बैंग के बाद पूरे यूनिवर्स में केवल ऊर्जा थी शुद्ध ऊर्जा। समय के साथ-साथ अचानक ये ऊर्जा पदार्थ में बदलने लगी। इसी के चलते स्टार, प्लेनेट, नेबूला, गैलेक्सीज का निर्माण होने लगा।

ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर अचानक बिग-बैंग के बाद की शुद्ध ऊर्जा कैसे अपने आप को पदार्थ (Matter) के रूप में बदलने लगी? इसके पीछे का कारण क्या था? यहीं पर जन्म होता है हिग्स बोसोन (God Particle) और हिग्स फील्ड का। हमारे इस खूबसूरत ब्रह्मांड के पीछे हिग्स फील्ड की इंजीनियरिंग ही काम कर रही है। हिग्स फील्ड के कारण ही बिग-बैंग के बाद जन्मी शुद्ध ऊर्जा पदार्थ (Matter) बन पाई। आज हमारे अस्तित्व के पीछे की वजह हिग्स फील्ड ही है।    

क्या है गॉड पार्टिकल

बिग बैंग के बाद जब ब्रह्मांड धीरे-धीरे ठंडा होने लगा। उस दौरान अचानक हिग्स फील्ड अस्तित्व में आ गई। मानो कुदरत ने किसी बड़े मैकेनिज्म के एक लीवर को खींच दिया हो, जिसके चलते हिग्स फील्ड हमारे यूनिवर्स में काम करने लगी। हिग्स फील्ड आने के बाद भार रहित (Mass Less) यानी प्रकाश की गति से चलने वाले कुछ कण इस फील्ड से इंटरैक्ट करने लगे। इस इंटरेक्शन के कारण उनमें भार (Mass) आने लगा। वहीं फोटोन जैसे कुछ कण अभी भी हिग्स फील्ड के साथ इंटरैक्ट नहीं कर रहे थे। वे अभी भी ऊर्जा के बंडल ही थे।

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हिग्स फील्ड के साथ इंटरेक्शन से बड़े पैमाने पर ब्रह्मांड में पदार्थ (Matter) बनने लगे। बाद में आगे चलकर इन्हीं पदार्थों से ग्रहों, तारों, निहारिकाएं आदि का निर्माण हुआ। अगर उस समय हिग्स फील्ड अस्तित्व में न आई होती, तो इस जगत में किसी कण (Particles) में भार (Mass) नहीं होता। भार न होने के कारण वे सभी लाइट की स्पीड पर गति कर रहे होते। ऐसे में न पदार्थ का निर्माण होता और न ही तारे या आकाशगंगाएं होतीं। ऐसा कहें कि आज हमारे होनेे के पीछ हिग्स फील्ड का बहुत बड़ा हाथ है।

कैसे पड़ा हिग्स बोसोन का नाम द गॉड पार्टिकल - फोटो : Facebook/Imperial_College_London
जेनेवा के सर्न में वैज्ञानिक गॉड पार्टिकल की खोज में ठीक उन्हीं परिस्थितियों को पैदा कर रहे हैं, जिस समय ब्रह्मांड बिग-बैंग के बाद ठंडा हुआ था और ऊर्जा के कुछ पार्टिकल्स में हिग्स फील्ड के साथ इंटरैक्ट करने के बाद भार आ रहा था। इसी गुत्थी को सुलझाने के लिए वैज्ञानिकों ने एक खास मशीन बनाई जिसका नाम द लार्ज हेड्रोन कोलाइडर है। वैज्ञानिकों का मानना था कि अगर प्रोटोन जैसे चार्ज्ड पार्टिकल्स को भारी ऊर्जा के साथ टकराया जाए, तो इनके टाकराने से हिग्स फिल्ड में हलचल पैदा होगी। इस हलचल में जन्म लेगा हिग्स बोसोन(God Particle)। 

साल 2012 में जेनेवा के CERN में 27 किलोमीटर लंबी मशीन द लार्ज हेड्रोन कोलाइडर में प्रोटोन के पार्टिकल्स को प्रकाश की 99.99 प्रतिशत गति के साथ टकराया गया। इस टक्कर में जबरदस्त मात्रा में ऊर्जा निकली। इसी दौरान वैज्ञानिकों को पहली बार हिग्स बोसोन के बारे में पता चला। इस एक्सपेरिमेंट ने हिग्स फील्ड के सिद्धांत को प्रमाणित कर दिया। हिग्स फील्ड के सिद्धांत को साल 1964 में पीटर हिग्स ने दिया था। इस थ्योरी के सच साबित होने के बाद साल 2013 में पीटर हिग्स को भौतिकीशास्त्र के नोबेल पुरुस्कार से सम्मानित किया गया।

हिग्स बोसोन और हिग्स फील्ड में अंतर

हमारे इस ब्रह्मांड में चार फंडामेंटल फोर्स हैं। इनमें इलेक्ट्रोमैग्नेटिज्म, स्ट्रॉन्ग न्यूक्लिअर, वीक न्यूक्लिअर और ग्रैविटी शामिल हैं। इन सभी फोर्सेस के कैरियर होते हैं, जैसे इलेक्ट्रोमैग्नेटिज्म का फोटोन, वीक न्यूक्लिअर का W और Z बोसोन्स, स्ट्रॉन्ग न्यूक्लिअर का ग्लूओन, ग्रैविटी का ग्रैविटोन। ठीक उसी तरह हिग्स फील्ड का कैरियर हिग्स बोसोन होता है। 

 

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हिग्स बोसोन और सत्येंद्र नाथ बोस - फोटो : Social Media

हिग्स बोसोन और सत्येंद्र नाथ बोस

विज्ञान के क्षेत्र में हुई इस क्रांतिकारी खोज का एक बड़ा नाता भारत से जुड़ा है। हिग्स बोसोन पार्टिकल का नाम दो बड़े वैज्ञानिकों के नाम से मिलकर बना है। इसमें पहला नाम पीटर हिग्स का शामिल है। वहीं दूसरा नाम भारत के महान वैज्ञानिक सत्येंद्र नाथ बोस का है।

सत्येंद्र नाथ बोस बचपन से ही काफी होनहार छात्र थे। उन्होंने अपनी युवावस्था के दौरान गर्म गैसों के बर्ताव के उपलब्ध आंकड़ों में कई तरह की त्रुटियां पाईं और इसको लेकर बोस ने कई नए तर्क दिए। हालांकि, शुरुआत में वैज्ञानिक समूह ने उनके इस तर्क को स्वीकार नहीं किया। वहीं सत्येंद्र नाथ बोस ने जब अपने शोध को अल्बर्ट आइंस्टीन के पास भेजा, तो उन्होंने इसे जर्मन में अनुवाद करके इस पर अपनी स्वीकृती दे दी। 

आइंस्टीन द्वारा मुहर लगने के बाद इस शोध को दुनिया भर में बोस आइंस्टीन स्टैटिक्स के नाम से जाना जाने लगा। वहीं शोध में जिन कणों का उल्लेख था। उसे बोसोन का नाम दिया गया। हिग्स फील्ड में वैज्ञानिकों ने जिस हिग्स बोसोन की खोज की है। वह भी बोसोन श्रृंखला का ही कण है।  

कैसे पड़ा हिग्स बोसोन का नाम द गॉड पार्टिकल

हिग्स बोसोन का नाम गॉड पार्टिकल पड़ने के पीछे एक बेहद ही दिलचस्प कहानी छिपी है। बात 90 के दशक की शुरुआत की है। फिजिसिस्ट लियोन लैडरमैन ने हिग्स बोसोन और हिग्स फील्ड से जुड़े विषय पर अपनी एक किताब लिखने वाले थे। लियोन अपनी इस किताब का नाम द गॉड डैम्न पार्टिकल The God Damn Particle रखना चाहते थे।

हालांकि, उनके पब्लिशर को पुस्तक का ये अजीबोगरीब नाम पसंद नहीं आ रहा था। ऐसे में प्रकाशक ने पुस्तक के नाम से Damn शब्द को हटाकर The God Particle रख दिया। हालांकि, इस नाम के पीछे कोई तर्क नहीं छिपा था बस ये पढ़ने में अच्छा लग रहा है। वहीं किताब पब्लिश होने के बाद मीडिया ने इस नाम को काफी लोकप्रिय कर दिया। ऐसे में हिग्स बोसोन की जगह लोग उसे गॉड पार्टिकल के नाम से जानने लगे। 

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।
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