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गोवा चुनाव: छोटे दलों की राष्ट्रीय महत्वाकांक्षा की सियासी प्रयोगशाला

सार

कांग्रेस राज्य में और कमजोर हो गई है, उसके एक विधायक लुईसिनो फेलेरियो टीएमसी में शामिल हो गए हैं तो भाजपा के पास कोई दमदार चेहरा नहीं है। मुख्यमंत्री प्रमोद सावंत का आभामंडल दिवंगत पूर्व मुख्यमंत्री मनोहर पर्रिकर के मुकाबले कुछ भी नहीं है।
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गोवा विधानसभा चुनाव - फोटो : amar Ujala
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विस्तार
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देश के सबसे छोटे राज्य गोवा में आगामी विधानसभा चुनाव क्षेत्रीय दलों की राष्ट्रीय महत्वाकांक्षा टेस्टिंग लैब साबित होंगे। यूं तो इस राज्य में क्षेत्रीय और स्थानीय राजनीतिक दलों की बहुलता रही है, लेकिन इस बार चुनाव मैदान में अखिल भारतीय तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) और आम आदमी पार्टी (आप) के भी आ जाने से चुनावी माहौल में नया रंग आ गया है। ये दोनों ही पार्टियां गोवा की जमीन से अपनी राष्ट्रीय दुंदुभि बजाना चाहती हैं। टीएमसी ने तो अभी से आक्रामक प्रचार के साथ ममता बनर्जी को ‘गोवा का नया सवेरा’ कहना शुरू कर दिया है तो आप सुप्रीमो अरविंद केजरीवाल ने चुनाव जीते तो पिछड़े भंडारी समुदाय से सीएम बनेगा, का वादाकर ओबीसी कार्ड चल दिया है। उधर बरसों सत्ता में रही कांग्रेस अपने ‘गौरवशाली अतीत’ के भरोसे है तो सत्तारूढ़ भाजपा की सत्ता में वापसी की संभावनाएं धार्मिक ध्रुवीकरण और साम-दाम-दंड-भेद पर टिकी है। बाकी स्थानीय पार्टियों की सत्ताकांक्षा खंडित जनादेश की आशा और खुद के वजूद को बचाने के प्रयासों पर टिकी हैं। 

गोवा महज 15 लाख की आबादी और 40 विधानसभा सीटों वाला राज्य है। राजनीतिक अस्थिरता यहां का पुराना रोग है। बावजूद इसके पर्यटन, खनन, निर्माण और मछलीमारी यहां की अर्थव्यवस्था के मुख्य आधार हैं।

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आर्थिक संकट से जूझती सत्ता
कभी बहुत समृद्ध राज्य माने जाने वाले गोवा की सरकार इन दिनों आर्थिक संकट से भी जूझ रही है। इसका मुख्य कारण कोरोना के कारण पर्यटन उद्योग में आई भारी गिरावट और खनन उद्योग का मंदा चलना है। वर्तमान में भाजपानीत एनडीए की प्रमोद सावंत सरकार कर्ज लेकर काम चला रही है। पूर्ण राज्य बनने के बाद गोवा ( जिसे स्थानीय कोंकणी भाषा में ‘गोंय’ कहा जाता है) में करीब 18 साल तक राज्य में राजनीतिक अस्थिरता रही। मुख्य मुकाबला राष्ट्रीय दल कांग्रेस और क्षेत्रीय दलों के बीच ही होता रहा। लेकिन 2012 से राज्य में भाजपा के सत्ता में आने के बाद कुछ राजनीतिक स्थिरता आई है। 

चुनावी संग्राम - फोटो : Twitter
पार्टियों का गणित समझिए
यूं राजनीतिक दृष्टि से गोवा क्षेत्रीय स्थानीय पार्टियों का स्वर्ग रहा है। राज्य में क्षेत्रीय पार्टियों का बनना-बिगड़ना आम बात है। अभी भी इस राज्य में 2 राष्ट्रीय पार्टियों भाजपा और कांग्रेस के अलावा 4 छोटी राष्ट्रीय पार्टियां, 8 क्षेत्रीय पार्टियां चुनाव मैदान में उतरेंगी। 14 पार्टियां ऐसी हैं, जो अब भंग भी हो चुकी है। वैसे गोवा में किसी भी पार्टी को स्पष्ट बहुमत कम ही मिला है। 2017 के विधानसभा चुनाव में भी किसी भी पार्टी को बहुमत नहीं मिला था। कांग्रेस 17 सीटें जीतकर सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरी थी। जबकि भाजपा ने 13 सीटें जीतकर क्षेत्रीय दलों के साथ मिलकर सरकार बना ली और कांग्रेस देखती ही रह गई।  हालांकि तब से स्थिति काफी बदली है।

कांग्रेस राज्य में और कमजोर हो गई है, उसके एक विधायक लुईसिनो फेलेरियो टीएमसी में शामिल हो गए हैं तो भाजपा के पास कोई दमदार चेहरा नहीं है। मुख्यमंत्री प्रमोद सावंत का आभामंडल दिवंगत पूर्व मुख्यमंत्री मनोहर पर्रिकर के मुकाबले कुछ भी नहीं है। सावंत सरकार को एंटी इनकम्बेंसी का सामना भी करना पड़ रहा है। ऐसे में टीएमसी और आप को उम्मीद है कि वो भाजपा और कांग्रेस का विकल्प बन सकती हैं। टीएमसी की आक्रामक रणनीति के पीछे प्रशांत कुमार हैं। इसी के चलते गोवा में विधानसभा चुनाव के मद्देनजर टीएमसी ने भ्रष्टाचार का एक पुराना फिर से उछाला है।

ये है कि 35 हजार करोड़ का खनन घोटाला। टीएमसी ने गोवा के एक पुराने ईसाई एनजीओ गोवा फाउंडेशन से करार किया है। इस एनजीओ ने पुराने दस्तावेज झाड़पोंछ कर खनन राजस्व की 35 हजार करोड़ की वसूली और  हर गोवावासी के खाते में 3 लाख रुपये जमा करने का लुभावना  वादा किया है। यह वादा कुछ वैसा ही है कि जैसा प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने 2014 के लोकसभा चुनाव प्रचार के दौरान देश में  काला धन वसूल कर हर भारतीय के खाते में 15 लाख रुपये जमा करने का कहकर किया था।

घोटाले का मुद्दा
गोवा में लौह अयस्क तथा कुछ और खनिज बड़ी मात्रा में पाए जाते हैं। यह खनन घोटाला 2012 के पहले का है। घोटाला सामने आने के बाद गोवा फाउंडेशन के आग्रह पर इसकी जांच सुप्रीम कोर्ट ने पूर्व न्यायाधीश एम.बी.शाह ने की थी। उन्होंने अपनी रिपोर्ट में कहा था कि अवैध खनन से राज्य सरकार को 35 हजार करोड़ रुपये का घाटा हुआ है। 2012 के चुनाव में भाजपा ने इसे मुद्दा बनाया और राज्य में सत्ता में आने के बाद तत्कालीन मनोहर पर्रिकर सरकार ने भी इसकी जांच कराई। पता चला कि वास्तविक राजस्व हानि 3 हजार करोड़ की थी, न कि 35 हजार करोड़ की। लेकिन सत्तारूढ़ भाजपा सरकार इसकी भी वसूली नहीं कर पाई।

इस मुद्दे का आर्थिक पहलू यह है कि पर्यटन और खनन गोवा की अर्थव्यवस्था के मुख्य घटक हैं। कोरोना के कारण दोनों सेक्टर बुरी तरह प्रभावित हुए हैं, जिससे बड़ी संख्या में लोग बेरोजगार हुए हैं। राज्य की खदाने सु्प्रीम कोर्ट के आदेश के बाद तीन साल से बंद पड़ी हैं। ऐसे में तृणमूल को लगता है कि वह खनन घोटाले का मुद्दा उठाकर राज्य में अपनी जमीन बना सकती है। 
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जातीय समीकरण पर पार्टियों की नजर
तृणमूल कांग्रेस के अलावा राज्य में अपना सियासी भविष्य तलाश रही आम आदमी पार्टी ने गोवा में ओबीसी दांव खेला है। ‘आप’ के संयोजक अरविंद केजरीवाल ने ऐलान कर दिया है कि अगर चुनाव में आप जीती तो राज्य में मुख्यमंत्री भंडारी समुदाय से होगा। भंडारी जाति गोवा में पिछड़े वर्ग में आती है। इस जाति के लोग मुख्यत: काश्तकार हैं या फिर सेना में सेवाएं देते रहे हैं। जब से गोवा पूर्ण राज्य बना है, तब से राज्य का मुख्यमंत्री अगड़ी जाति से या फिर कोई ईसाई ही बना है। केजरीवाल का दांव इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि गोवा में कुल हिंदू आबादी का करीब 30 फीसदी भंडारी समुदाय है। अगर ‘आप’ इसमे सेंध लगा पाई तो भाजपा के लिए मुश्किल होगी, क्योंकि राज्य में बीजेपी ने धार्मिक ध्रुवीकरण करते हुए हिंदुओं को गोलबंद किया है। उसे थोड़ा बहुत ईसाइयों का समर्थन भी है। राज्य में हिंदुओं की आबादी 66 फीसदी और ईसाई 25 फीसदी हैं। तीसरा बड़ा समुदाय मुसलमानों का है, जो करीब 9 फीसदी है। ये प्राय: गैर भाजपा दलों को ही समर्थन देता है। 

चूंकि गोवा का मतदाता क्षेत्रीय पार्टियों को भी जिताता रहा है, इसीलिए तृणमूल कांग्रेस और आप गोवा में राष्ट्रीय स्तर पर अपना भविष्य देख रहे हैं। दोनों की तमन्ना अखिल भारतीय पार्टी बनने की है। गोवा इस राष्ट्रीय महत्वाकांक्षा की प्रयोगस्थली है। इस बार महाराष्ट्र सत्तारूढ़ शिवसेना भी 22 सीटों पर लड़ने जा रही है। वह भाजपा को ही नुकसान पहुंचाएगी। ऐसे में गोवा का विधानसभा चुनाव वाकई दिलचस्प होने वाला है। वरिष्ठ कांग्रेस नेता गोवा के प्रभारी व पूर्व केन्द्रीय मंत्री पी. चिदम्बरम ने हाल में कहा कि गोवा में विधानसभा चुनाव में जो जीतेगा, वही अगले लोकसभा चुनाव में जीतेगा। क्या वास्तव में ऐसा होगा?

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।
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