डॉ. अम्बेडकर ने स्वतंत्र मजदूर पार्टी, 1936 के घोषणापत्र में कराधान पर अपने विचार व्यक्त किए।
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कृषि अर्थशास्त्र में योगदान 19वीं शताब्दी के प्रारंभ में भारतीय कृषि की प्रमुख समस्या निम्न उत्पादकता थी। 1917 में एक समिति नियुक्त की गई और इसने सुझाव दिया कि भूमि जोत को समेकित किया जाना चाहिए।
अम्बेडकर ने अपने पेपर, “स्मॉल होल्डिंग्स इन इंडिया एंड देयर रेमेडीज (1918)” में तर्क दिया कि समेकित भूमि राज्य के स्वामित्व वाली होनी चाहिए और बिना किसी भेदभाव के मूल किसानों को समान रूप से वितरित की जानी चाहिए।
डॉ. अम्बेडकर ने स्वतंत्र मजदूर पार्टी, 1936 के घोषणापत्र में कराधान पर अपने विचार व्यक्त किए। वे भू-राजस्व प्रणाली, इसकी प्रणाली और अन्य करों के विरोध में थे क्योंकि उनका बोझ मुख्य रूप से समाज के गरीब वर्गों पर पड़ता था। उन्होंने कहा कि कराधान के सिद्धांत भुगतान करने वालों की क्षमता पर आधारित होने चाहिए न कि आय पर।
डॉ.अम्बेडकर ने एक महान नीतिगत पहल की है, जब वे श्रम, सिंचाई, बिजली के कैबिनेट मंत्री थे, जिसने केंद्रीय जल आयोग (केंद्र सरकार भारत सरकार के तहत एक शीर्ष निकाय) के माध्यम से वर्तमान जल-साझाकरण विवाद को सुलझाया और नेतृत्व भी किया। उन्होंने संविधान का निर्माण करते समय इस दृष्टिकोण के लिए एक कानूनी दृष्टिकोण की रूपरेखा दी। बाद में, उन्होंने नीतिगत ढांचे के अनुसार काम को लागू किया जिसके कारण दामोदर घाटी परियोजना (बिहार और पश्चिम बंगाल में) की स्थापना हुई।
आंबेडकर ने सन् 1949 में संविधान के मसविदे में कराधान के विषय पर महत्वपूर्ण टिप्पणी की। भारत के संविधान में नियंत्रक एवं महालेखापरीक्षक की नियुक्ति के संबंध में प्रावधान का औचित्य बताते हुए उन्होंने कहा-
‘‘सरकारों को जनता से संचित धन का इस्तेमाल न केवल नियमों, कानूनों और विनियमों के अनुरूप करना चाहिए, वरन् यह भी सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि सार्वजनिक प्राधिकारी, धन के व्यय में विश्वसनीयता, बुद्धिमत्ता और मितव्ययिता से काम लें।
यद्यपि डॉ अम्बेडकर ने औद्योगीकरण और शहरीकरण के पक्ष में बात की, उन्होंने पूंजीवाद की बुराइयों के बारे में भी चेतावनी दी, यह तर्क देते हुए कि निरंकुश पूंजीवाद उत्पीड़न और शोषण की ताकत में बदल सकता है।
वे उन चन्द आर्थिक सिद्धांतकारों में से एक थे, जिनका आर्थिक नीतियों और योजनाओं के प्रति दृष्टिकोण व्यावहारिक और लोकहितकारी था। इस प्रकार चाहे आंबेडकर वित्तीय विषयों पर लिख रहे हों या मौद्रिक सिद्धांतों पर, उनका मूल लक्ष्य ऐसे निष्कर्षों तक पहुंचना था जो व्यावहारिक और लोकहितकारी दोनों हों।
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