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आत्महत्या रोकथाम दिवस: 'आंसू छिपाना' मर्दानगी नहीं, भावनाओं को व्यक्त करना सीखे हर पुरुष

सार

हम लड़कों को बचपन से ही बताते हैं कि 'लड़के रोया नहीं करते'। बहुत कम उम्र से ही लड़कों के लिए भावनाओं को व्यक्त न करने जैसा माहौल दिया जाता है, क्योंकि भावनाओं को व्यक्त करना हमारे समाज में तथाकथित 'कमजोर' होने की निशानी है।
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आत्महत्या रोकथाम दिवस 2022 - फोटो : Amarujala
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विस्तार
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इस दौर की कुछ चीजें मुझे आंतरिक रूप से बहुत परेशान करती हैं, जैसे पैसे देकर पानी खरीदना, ऑक्सीजन के कारण मौत के मामले सुनना या खबरों में इसका जिक्र करना, तलाक के मामलों का बढ़ना और आत्महत्या रोकथाम की जागरूकता के लिए एक खास दिन बनाने की जरूरत। ये सब सहज इंसानी/पर्यावरणीय प्रकृति के खिलाफ की चीजें हैं, इसका मतलब यह है कि विधाता ने जीवन के उपहार के साथ हमें जो सुविधाएं या अधिकार दिए उनमें हमने जरूर कोई गंभीर उथल-पुथल मचाई है।

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10 नवंबर को हर साल वैश्विक स्तर पर बढ़ रहे आत्महत्या के मामलों की रोकथाम के लिए विश्व आत्महत्या रोकथाम दिवस मनाया जाता है। हाल ही में नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो यानी एनसीआरबी ने एक रिपोर्ट जारी कर बताया कि साल 2021 में देश में अब तक सबसे अधिक आत्महत्या के मामले दर्ज किए गए। इस साल 1.64 लाख लोगों ने आत्महत्या की थी, यह डेटा पिछले साल 2020 की तुलना में 7.2 फीसदी अधिक था। इस डेटा में एक बिंदु ने मेरा ध्यान खासा आकर्षित किया-
 

आंकड़े बताते हैं, कि साल दर साल पुरुषों में आत्महत्या की टेंडेंसी बढ़ती जा रही है। साल 2019 में 97613 पुरुषों जबकि 41493 महिलाओं ने आत्महत्या की। पुरुषों में बढ़ते आत्महत्या के मामले सिर्फ भारत तक ही सीमित नहीं हैं, वैश्विक स्तर पर आंकड़े देखें तो वहां से भी समझ आता है कि पुरुष अधिक आत्महत्या कर रहे हैं। 

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आखिर क्यों? यह सवाल मुझे लगातार परेशान करता रहा। ऐसी क्या परिस्थियां होती हैं जो बाहर से एकदम 'सख्त और निडर' दिखने वाले पुरुष को अंदर से इतना तोड़ देती हैं, ऐसा कि उसके लिए जीवन को खत्म करना ही एक विकल्प बचता है। मैं बार-बार यही लाइन लिखता-सोचता रहा, आखिर इसका एक कारण मुझे इसी लाइन में मिल गया वह था-  सख्त और निडर रूप का मुखौटा

असल में हमारे समाज ने पुरुषों को लेकर एक रूढ़िवादी सोच बना ली है कि पुरुष हमेशा निर्भीक, शक्तिशाली, हष्ट-पुष्ट, निडर और अडिग ही होना चाहिए। जो किसी कारणवश इस पैरामीटर में फिट नहीं बैठता उसे कई तरह की बातें सुनने को मिलती हैं। उदाहरण के लिए हमारे समाज की एक सोच रही है- भले ही कितनी कठिन परिस्थियां आ जाएं, पुरुष को रोना नहीं चाहिए। किसी के आंसू निकल जाएं तो उसका मजाक बनाया जाता है,  देखो कैसे लड़कियों की तरह रो रहा है, अरे मर्द बन मर्द। फिल्मों ने भी इस रूढ़िवादिता को खूब ग्लोरीफाई किया- लिहाजा, आलम यह है कि हम पुरुष रोना भी चाहें तो भी नहीं रो सकते, क्योंकि उस समय हमें 'कमजोर' मान लिया जाएगा। 

मेडिकल साइंस और आध्यात्म दोनों मानते हैं कि पुरुषों में ये न रोने वाली प्रवृत्ति या चाहकर भी न रो पाने वाली आदत गंभीर मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं को जन्म देती है, कुछ स्थितियों में यह इतना गंभीर रूप तक ले लेती है कि व्यक्ति के पास जीवन को समाप्त करने के अलावा कोई और विकल्प नजर ही नहीं आता है। क्यों रोना जैसी छोटी से छोटी अभिव्यक्ति आवश्यक है, इसे मेडिकल साइंस और आध्यात्म दोनों के नजरिए से समझना होगा।

मेरे आध्यात्मिक गुरु पंडित राजन जी महाराज हमेशा कहते हैं-
 

प्राकृतिक रूप से जो कुछ भी हो रहा है उसमें किसी भी तरह की छेड़छाड़ नहीं करनी चाहिए, चाहे वह पर्यावरण के साथ हो या शरीर के साथ, इसमें उत्पन्न की जाने वाली व्याधा हमेशा हमारा ही नुकसान करती है। जिस तरह से मल-मूत्र त्याग की आवश्यकता महसूस होने पर हम तुंरत इसे करते हैं, हमारी भावनाओं को भी उसी तरह से प्रेषित करना आवश्यक है। मेडिकल साइंस कहता है मूत्र को अगर आप लंबे समय तक रोककर रखेंगे तो यह किडनी के रोगों का कारण बन सकती है, उसी प्रकार क्रोध, रोना, हंसना, प्रेम जैसी भावनाओं को दबाकर रखना, इन्हें किन्हीं कारणवश व्यक्त न कर पाना भी मानसिक स्वास्थ्य को बिगाड़ने के लिए काफी है।


पर अफसोस पुरुषों को सामाजिक बंधनों ने ऐसे जकड़ लिया है जिसके कारण हम अपनी भावनाओं को हमेशा दबाए रखने में ही सहज महसूस करने लगे हैं, पर यह सहजता अंदर ही अंदर भंयकर भूचाल का कारण बनती जाती है, जिसका अंत आत्महत्या जैसे विचारों के साथ होता है। मेरे ख्याल से अगर हम विपरीत परिस्थितियों में रो लें तो आधा दर्द स्वत: ही कम हो जाएगा।

दूसरा हमें खुद को सर्वशक्तिमान मानना छोड़ना होगा, इंसानी स्वभाव के विपरीत जाकर किया गया कोई भी काम सिर्फ मुश्किलें ही बढ़ाता है।

इसी तरह दिल्ली में आईएएस की तैयारी कर रहे छात्रों को कोचिंग देने वाले डॉ. विकास दिव्यकीर्ति भी कहते हैं, शादी के लिए अपने साथी का चयन करते समय एक सवाल आपस में जरूर पूछा जाना चाहिए कि- आखिरी बार रोए कब थे? इसका उद्देश्य यह है कि इससे समझा जा सकता है कि सामने वाला व्यक्ति भावनाओं को कितनी सहजता से संप्रषित कर रहा हैय़ सहजता से रोने या विचारों की अभिव्यक्ति करना वाला व्यक्ति निश्चित ही आपकी भावनाओं के प्रति भी संवेदनशील होगा। 

जिम्मेदारियों का निर्वहन न कर पाने के कारण अधिकतर पुरुष करते हैं आत्महत्या - फोटो : Pixabay
पितृसत्तात्मक समाज का एक आयाम यह भी

मैं भी मानता हूं कि पितृसत्तात्मक समाज की मानसिकता में बदलाव की आवश्यकता है, पर इसका एक दूसरा पहलू काफी कुछ सोचने को मजबूर भी करता है। मनोचिकित्सकों से बातचीत के दौरान एक बात स्पष्ट समझ आती है कि पुरुषों की आत्महत्या के पीछे सबसे प्रमुख कारणों में से एक घर के खर्चे न उठा पाना, दूसरों की तुलना में भौतिक आवश्यकताओं की पूर्ति न कर पाना या इस प्रयास में कर्ज का बड़ा बोझ होना है।

फिर मन में सवाल यह आता है कि जब एक तरफ नारीवाद का झंडा सोशल मीडिया पर जमकर बुलंद किया जाता रहा है, फिर जिम्मेदारियों के बंटवारे में पारिवारिक पालन-पोषण का सारा भार पुरुषों पर ही क्यों? शादी के लिए लड़के को सेलेक्ट करने के पैरामीटर में लड़की का यह सवाल पूछना क्या नारीवादी सोच के लिए अपवाद नहीं है कि- क्या तुम मेरे खर्चे उठा पाओगे? 

हो सकता है, आप मेरी कुछ बातों से इत्तेफाक न रखते हों पर आत्महत्या के आंकड़े तो यही कहते हैं कि पारिवारिक और भौतिक सुख-सुविधाओं की जिम्मेदारी तो पुरुषों के कंधों पर ही है। जो इनपर खरे नहीं उतर पाते हैं, वो अंत में जीवन को समाप्त करने का विकल्प चुनते हैं। एनसीआरबी के आंकड़े इस बात की पुष्ट गवाही देते हैं।

पुरुषों में बढ़ती आत्महत्या की सोच के कारणों के बारे में जानिए - फोटो : Pixabay
भारत ही नहीं, पुरुषों की आत्महत्या के मामले दुनियाभर में अधिक

पुरुषों की आत्महत्या के आंकड़े वैश्विक स्तर पर चिंता का बड़ा कारण रहे हैं। साल 2016 के विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) की डेटा के मुताबिक इस साल दुनियाभर में अनुमानित 793,000 आत्महत्याएं हुई थीं, इसमें से अधिकांश पुरुष थे। यूके में 45 वर्ष से कम आयु के पुरुषों में आत्महत्या भी मौत के प्रमुख कारणों में से एक है। 
 
यही हाल कई अन्य देशों का भी है। महिलाओं की तुलना में, ऑस्ट्रेलिया में पुरुषों की आत्महत्या दर तीन गुना अधिक, अमेरिका में 3.5 गुना अधिक और रूस-अर्जेंटीना में चार गुना अधिक  है। डब्ल्यूएचओ के आंकड़े बताते हैं कि लगभग 40% देशों में प्रति एक लाख पुरुषों पर 15 से अधिक आत्महत्याएं होती हैं, महिलाओं के लिए यह आंकड़ा 1.5% के करीब है। 

आत्महत्या के कारण मौत के मामलों का विश्लेषण करने पर एक रोचक बात और भी सामने आती है। वह यह कि वैसे तो पुरुषों की तुलना में महिलाओं में आत्महत्या के प्रयास करने की आशंका अधिक होती है, पर इससे उनके बचने की संभावना भी अधिक देखी गई है। पुरुष आत्महत्या के तरीके अक्सर अधिक हिंसक होते हैं, जिससे कारण आत्महत्या के प्रयास के बाद उनके जीवित रह जाने की संभावना कम होती है।

इस बारे में मनोवैज्ञानिकों का मानना है कि ज्यादातर आत्महत्या के मामलों में देखा गया है कि पुरुष इसके लिए लीथल प्रक्रियाओं का चयन करते हैं, क्योंकि वे आत्महत्या के प्रयास के बाद बचने के इच्छुक कम होते हैं। यह दर्शाता है कि आत्महत्या के दौरान पुरुषों की मनोस्थिति काफी गंभीर और जटिल हो सकती है, इसके कई कारण हो सकते हैं।  
 
भावनाओं की अभिव्यक्ति न कर पाना गंभीर

मनोरोग विशेषज्ञों से इसके कारणों को लेकर बातचीत के आधार पर जो प्रमुख बातें सामने आती हैं, वह हैं अपनी भावनाओं को व्यक्त कर पाने में कमी। पुरुषों की तुलना में महिलाएं अपनी समस्याओं को आसानी से साझा कर पाती हैं, जबकि पुरुष उन्हें बोतलबंद कर देते हैं। यह भी सच है कि पीढ़ियों से हमारे समाज ने पुरुषों को "मजबूत" होने के लिए प्रोत्साहित किया है, इस स्वीकार्यता ने जाने-अनजानें पुरुषों की भावनाओं के संप्रेषण का गला घोंट दिया है। यह अक्सर बचपन में ही शुरू हो जाता है।
 
हम लड़कों को बताते हैं कि 'लड़के रोते नहीं हैं', बहुत कम उम्र से ही लड़कों के लिए भावनाओं को व्यक्त न करने जैसा माहौल दिया जाता है, क्योंकि भावनाओं को व्यक्त करना तथाकथित 'कमजोर' होने की निशानी है।

इस बारे में एक लेख में  कनाडा स्थित सेंटर फॉर सुसाइड प्रिवेंशन के कार्यकारी निदेशक मारा ग्रुनाऊ कहते हैं-

यह वैश्विक चलन रहा है कि माताएं, बेटों की तुलना में अपनी बेटियों से ज्यादा बात करती हैं, वे आपस में अपनी भावनाओं को साझा करती हैं और दोनों एक दूसरे को समझ पाते हैं। पर चूंकि पिता को पहले से ही 'भावनात्मक तौर पर मजूबत' के रूप में दर्शाया जाता है, ऐसे में लड़कों के लिए अपनी बातों को पिता से साझा कर पाना कठिन होता है और मां से वह खुलकर बात कर नहीं पाते। मोटी-मोटी हमारे समाज ने सिर्फ महिलाओं से भावनात्मक होने की उम्मीद बना ली है, पुरुषों से नहीं। भावनाओं के संप्रेषण में व्यवधान की यह पहली कड़ी है जो धीरे-धीरे बढ़ती जाती है, यह कुछ स्थितियों में मनोरोग विकारों का कारण भी बनती है। 

जब बात मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं के उपचार की आती है तो यहां भी इलाज के लिए पहल करने में महिलाओं की तुलना में पुरुषों की आंकड़ा काफी कम है। ब्रिटिश मेडिकल जर्नल के एक अध्ययन में पाया गया कि मानसिक स्वास्थ्य की स्थितियां जो आगे चलकर आत्महत्या का कारण बनती हैं, उनके लिए सामान्य प्राथमिक देखभाल परामर्श दर महिलाओं की तुलना में पुरुषों में 32% कम है।

अध्ययनकर्ताओं का कहना है कि ऐसा नहीं है कि पुरुष इलाज के लिए नहीं आना चाहते हैं, पर मुख्य समस्या यह है कि अक्सर ज्यादातर पुरुषों को इस बात का पता ही नहीं होता है कि यह तनाव या मानसिक स्वास्थ्य स्थितियां हैं, या फिर उनकी सामान्य जिम्मेदारियों के कारण उन्हें दबाव महसूस हो रहा है, क्योंकि पुरुषों को तो बचपन से ही भावनाओं को व्यक्त करने से अप्रत्यक्ष तौर पर रोक दिया जाता है।
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कभी-कभी रो लेना बुरा नहीं - फोटो : Pixabay
पुरुषों में बढ़ती आत्महत्या वाली सोच के कारण और इसकी कैसे रोकथाम की जाए, इस बारे में मैंने जितना मनोरोग विशेषज्ञों से समझा वह यह है कि अपनी बातों को खुद तक छिपाकर रखना, उसे कमजोर साबित होने के डर से व्यक्त न करना ही इसका प्रमुख कारण है।

शराब तनाव दूर नहीं करता, बल्कि समस्याएं और बढ़ा देता है

जो पुरुष, अपने साथियों से परेशानी के बारे में शेयर भी करते हैं उन्हें उनके साथी इन समस्याओं से निकलने के लिए शराब जैसी आदतें लगवा देते हैं, लोगों को ऐसा मानना है कि शराब सभी परेशानियों की अनुभूति को कम कर देता है। पर इस बारे में विशेषज्ञों का कहना है कि यह पुरुषों द्वारा की जाने वाली सबसे बड़ी गलती है।
 
तनाव-अवसाद में शराब पीने से आपको कुछ पल के लिए तो सबकुछ भूला सा लगने लगता है, पर यह आदत आपके असल समस्या के चिकित्सकीय निदान को देर करती जाती है। ऐसे में जब आप अंत में मनोचिकित्सक के पास पहुंचते हैं तब तक शराब के कारण लेट हुआ डायग्नोसिस, गंभीर रूप ले चुका होता है। मतलब शराब, आपकी परेशानियों का हल कतई नहीं हो सकता है, बल्कि यह समस्या को बढ़ा जरूर देता है।

यदि आप तनाव-अवसाद से ग्रसित हैं या आत्महत्या के विचार आ रहे हैं तो इस बारे में साथियों, घर के लोगों से जरूर बताएं। आत्महत्या रोकथाम के लिए आवश्यक है कि हम बच्चों के साथ सहज हों जिससे वह अपनी बातें खुल कर माता-पिता के साथ साझा कर सकें। आपको रोने का दिल है तो खुल के रोइए बिना परवाह किए कि कौन देख रहा है, यह आपकी कमजोर का संकेत नहीं है। कमजोरी का संकेत यह है कि आप अपनी परेशानियों से हार कर ईश्वर के सबसे खूबसूरत उपहार-आपके जीवन को स्वयं ही समाप्त करने का प्रयास कर रहे हैं। 

छोटे-छोटे प्रयास आत्महत्या रोकथाम की दिशा में बड़ा कदम हो सकते हैं। लोगों से अपनी बातें शेयर करिए, उनकी सुनिए, ऐसा माहौल बनाइए जिसमें भावनात्मक संचार के अभाव में किसी को अपनी जान न देनी पड़े। यही मौजूदा इस समय की सबसे बड़ी जरूरत है।



डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। लेखक को ट्विटर (@mediabhii) पर फॉलो कर सकते हैं। यह लेख स्वास्थ्य विशेषज्ञों के सुझाव और साझा की गई जानकारियों के साथ मेडिकल रिपोर्ट्स/अध्ययनों के आधार पर तैयार किया गया है। संबंधित अध्ययनों की कॉपी और विशेषज्ञों का परिचय साथ में संलग्न है। लेख का उद्देश्य आत्महत्या रोकथाम को लेकर जागरूकता बढ़ाना है।
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