जिम्मेदारियों का निर्वहन न कर पाने के कारण अधिकतर पुरुष करते हैं आत्महत्या
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पितृसत्तात्मक समाज का एक आयाम यह भी
मैं भी मानता हूं कि पितृसत्तात्मक समाज की मानसिकता में बदलाव की आवश्यकता है, पर इसका एक दूसरा पहलू काफी कुछ सोचने को मजबूर भी करता है। मनोचिकित्सकों से बातचीत के दौरान एक बात स्पष्ट समझ आती है कि पुरुषों की आत्महत्या के पीछे सबसे प्रमुख कारणों में से एक घर के खर्चे न उठा पाना, दूसरों की तुलना में भौतिक आवश्यकताओं की पूर्ति न कर पाना या इस प्रयास में कर्ज का बड़ा बोझ होना है।
फिर मन में सवाल यह आता है कि जब एक तरफ नारीवाद का झंडा सोशल मीडिया पर जमकर बुलंद किया जाता रहा है, फिर जिम्मेदारियों के बंटवारे में पारिवारिक पालन-पोषण का सारा भार पुरुषों पर ही क्यों? शादी के लिए लड़के को सेलेक्ट करने के पैरामीटर में लड़की का यह सवाल पूछना क्या नारीवादी सोच के लिए अपवाद नहीं है कि- क्या तुम मेरे खर्चे उठा पाओगे?
हो सकता है, आप मेरी कुछ बातों से इत्तेफाक न रखते हों पर आत्महत्या के आंकड़े तो यही कहते हैं कि पारिवारिक और भौतिक सुख-सुविधाओं की जिम्मेदारी तो पुरुषों के कंधों पर ही है। जो इनपर खरे नहीं उतर पाते हैं, वो अंत में जीवन को समाप्त करने का विकल्प चुनते हैं। एनसीआरबी के आंकड़े इस बात की पुष्ट गवाही देते हैं।
पुरुषों में बढ़ती आत्महत्या की सोच के कारणों के बारे में जानिए
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भारत ही नहीं, पुरुषों की आत्महत्या के मामले दुनियाभर में अधिक
पुरुषों की आत्महत्या के आंकड़े वैश्विक स्तर पर चिंता का बड़ा कारण रहे हैं। साल 2016 के विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) की डेटा के मुताबिक इस साल दुनियाभर में अनुमानित 793,000 आत्महत्याएं हुई थीं, इसमें से अधिकांश पुरुष थे। यूके में 45 वर्ष से कम आयु के पुरुषों में आत्महत्या भी मौत के प्रमुख कारणों में से एक है।
यही हाल कई अन्य देशों का भी है। महिलाओं की तुलना में, ऑस्ट्रेलिया में पुरुषों की आत्महत्या दर तीन गुना अधिक, अमेरिका में 3.5 गुना अधिक और रूस-अर्जेंटीना में चार गुना अधिक है। डब्ल्यूएचओ के आंकड़े बताते हैं कि लगभग 40% देशों में प्रति एक लाख पुरुषों पर 15 से अधिक आत्महत्याएं होती हैं, महिलाओं के लिए यह आंकड़ा 1.5% के करीब है।
आत्महत्या के कारण मौत के मामलों का विश्लेषण करने पर एक रोचक बात और भी सामने आती है। वह यह कि वैसे तो पुरुषों की तुलना में महिलाओं में आत्महत्या के प्रयास करने की आशंका अधिक होती है, पर इससे उनके बचने की संभावना भी अधिक देखी गई है। पुरुष आत्महत्या के तरीके अक्सर अधिक हिंसक होते हैं, जिससे कारण आत्महत्या के प्रयास के बाद उनके जीवित रह जाने की संभावना कम होती है।
इस बारे में मनोवैज्ञानिकों का मानना है कि ज्यादातर आत्महत्या के मामलों में देखा गया है कि पुरुष इसके लिए लीथल प्रक्रियाओं का चयन करते हैं, क्योंकि वे आत्महत्या के प्रयास के बाद बचने के इच्छुक कम होते हैं। यह दर्शाता है कि आत्महत्या के दौरान पुरुषों की मनोस्थिति काफी गंभीर और जटिल हो सकती है, इसके कई कारण हो सकते हैं।
भावनाओं की अभिव्यक्ति न कर पाना गंभीर
मनोरोग विशेषज्ञों से इसके कारणों को लेकर बातचीत के आधार पर जो प्रमुख बातें सामने आती हैं, वह हैं अपनी भावनाओं को व्यक्त कर पाने में कमी। पुरुषों की तुलना में महिलाएं अपनी समस्याओं को आसानी से साझा कर पाती हैं, जबकि पुरुष उन्हें बोतलबंद कर देते हैं। यह भी सच है कि पीढ़ियों से हमारे समाज ने पुरुषों को "मजबूत" होने के लिए प्रोत्साहित किया है, इस स्वीकार्यता ने जाने-अनजानें पुरुषों की भावनाओं के संप्रेषण का गला घोंट दिया है। यह अक्सर बचपन में ही शुरू हो जाता है।
हम लड़कों को बताते हैं कि 'लड़के रोते नहीं हैं', बहुत कम उम्र से ही लड़कों के लिए भावनाओं को व्यक्त न करने जैसा माहौल दिया जाता है, क्योंकि भावनाओं को व्यक्त करना तथाकथित 'कमजोर' होने की निशानी है।
इस बारे में एक लेख में कनाडा स्थित सेंटर फॉर सुसाइड प्रिवेंशन के कार्यकारी निदेशक मारा ग्रुनाऊ कहते हैं-
यह वैश्विक चलन रहा है कि माताएं, बेटों की तुलना में अपनी बेटियों से ज्यादा बात करती हैं, वे आपस में अपनी भावनाओं को साझा करती हैं और दोनों एक दूसरे को समझ पाते हैं। पर चूंकि पिता को पहले से ही 'भावनात्मक तौर पर मजूबत' के रूप में दर्शाया जाता है, ऐसे में लड़कों के लिए अपनी बातों को पिता से साझा कर पाना कठिन होता है और मां से वह खुलकर बात कर नहीं पाते। मोटी-मोटी हमारे समाज ने सिर्फ महिलाओं से भावनात्मक होने की उम्मीद बना ली है, पुरुषों से नहीं। भावनाओं के संप्रेषण में व्यवधान की यह पहली कड़ी है जो धीरे-धीरे बढ़ती जाती है, यह कुछ स्थितियों में मनोरोग विकारों का कारण भी बनती है।
जब बात मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं के उपचार की आती है तो यहां भी इलाज के लिए पहल करने में महिलाओं की तुलना में पुरुषों की आंकड़ा काफी कम है। ब्रिटिश मेडिकल जर्नल के एक अध्ययन में पाया गया कि मानसिक स्वास्थ्य की स्थितियां जो आगे चलकर आत्महत्या का कारण बनती हैं, उनके लिए सामान्य प्राथमिक देखभाल परामर्श दर महिलाओं की तुलना में पुरुषों में 32% कम है।
अध्ययनकर्ताओं का कहना है कि ऐसा नहीं है कि पुरुष इलाज के लिए नहीं आना चाहते हैं, पर मुख्य समस्या यह है कि अक्सर ज्यादातर पुरुषों को इस बात का पता ही नहीं होता है कि यह तनाव या मानसिक स्वास्थ्य स्थितियां हैं, या फिर उनकी सामान्य जिम्मेदारियों के कारण उन्हें दबाव महसूस हो रहा है, क्योंकि पुरुषों को तो बचपन से ही भावनाओं को व्यक्त करने से अप्रत्यक्ष तौर पर रोक दिया जाता है।
कभी-कभी रो लेना बुरा नहीं
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पुरुषों में बढ़ती आत्महत्या वाली सोच के कारण और इसकी कैसे रोकथाम की जाए, इस बारे में मैंने जितना मनोरोग विशेषज्ञों से समझा वह यह है कि अपनी बातों को खुद तक छिपाकर रखना, उसे कमजोर साबित होने के डर से व्यक्त न करना ही इसका प्रमुख कारण है।
शराब तनाव दूर नहीं करता, बल्कि समस्याएं और बढ़ा देता है
जो पुरुष, अपने साथियों से परेशानी के बारे में शेयर भी करते हैं उन्हें उनके साथी इन समस्याओं से निकलने के लिए शराब जैसी आदतें लगवा देते हैं, लोगों को ऐसा मानना है कि शराब सभी परेशानियों की अनुभूति को कम कर देता है। पर इस बारे में विशेषज्ञों का कहना है कि यह पुरुषों द्वारा की जाने वाली सबसे बड़ी गलती है।
तनाव-अवसाद में शराब पीने से आपको कुछ पल के लिए तो सबकुछ भूला सा लगने लगता है, पर यह आदत आपके असल समस्या के चिकित्सकीय निदान को देर करती जाती है। ऐसे में जब आप अंत में मनोचिकित्सक के पास पहुंचते हैं तब तक शराब के कारण लेट हुआ डायग्नोसिस, गंभीर रूप ले चुका होता है। मतलब शराब, आपकी परेशानियों का हल कतई नहीं हो सकता है, बल्कि यह समस्या को बढ़ा जरूर देता है।
यदि आप तनाव-अवसाद से ग्रसित हैं या आत्महत्या के विचार आ रहे हैं तो इस बारे में साथियों, घर के लोगों से जरूर बताएं। आत्महत्या रोकथाम के लिए आवश्यक है कि हम बच्चों के साथ सहज हों जिससे वह अपनी बातें खुल कर माता-पिता के साथ साझा कर सकें। आपको रोने का दिल है तो खुल के रोइए बिना परवाह किए कि कौन देख रहा है, यह आपकी कमजोर का संकेत नहीं है। कमजोरी का संकेत यह है कि आप अपनी परेशानियों से हार कर ईश्वर के सबसे खूबसूरत उपहार-आपके जीवन को स्वयं ही समाप्त करने का प्रयास कर रहे हैं।
छोटे-छोटे प्रयास आत्महत्या रोकथाम की दिशा में बड़ा कदम हो सकते हैं। लोगों से अपनी बातें शेयर करिए, उनकी सुनिए, ऐसा माहौल बनाइए जिसमें भावनात्मक संचार के अभाव में किसी को अपनी जान न देनी पड़े। यही मौजूदा इस समय की सबसे बड़ी जरूरत है।
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। लेखक को ट्विटर (@
mediabhii) पर फॉलो कर सकते हैं। यह लेख स्वास्थ्य विशेषज्ञों के सुझाव और साझा की गई जानकारियों के साथ मेडिकल रिपोर्ट्स/अध्ययनों के आधार पर तैयार किया गया है। संबंधित अध्ययनों की कॉपी और विशेषज्ञों का परिचय साथ में संलग्न है। लेख का उद्देश्य आत्महत्या रोकथाम को लेकर जागरूकता बढ़ाना है।