बादलों का फटना सबसे चिन्ता का विषय
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बादलों का फटना सबसे चिंता का विषय
हिमालय पर बादल फटने की घटनाएं सबसे बड़ा चिन्ता का विषय बनी हुई हैं। बादल फटने से न केवल त्वरित बाढ़ बल्कि भूस्खलन के मामले भी बढ़ गए हैं। उत्तराखण्ड के आपदा प्रबंधन एवं न्यूनीकरण केन्द्र के निदेशक डा. पियूष रौतेला के अनुसार इस साल राज्य में मानसूनी आपदा में कुल 44 लोग मरे, 8 लापता और 40 घायल हो चुके हैं।
इनमें 18 मृतक और 8 लापता केवल बादल फटने और त्वरित बाढ़ की आपदाओं के हैं। राज्य में 568 मकान भी आपदा की चपेट में आए जिनमें से 38 पूरी तरह जमींदोज हुए है। पशु और खेती की हानि अलग है। केदारनाथ आपदा में तो हजारों लोग मरे थे जिनमें से लगभग 5 हजार की ही पुष्टि हो पाई।
कैसे फटते हैं बादल
भारतीय मौसम विभाग (आईएमडी) के अनुसार, जब किसी विशेष क्षेत्र में वर्षा की मात्रा 100 मिलीमीटर प्रति घंटे से अधिक हो जाती है, तो यह बादल फटने की स्थिति होती है। आईएमडी के अनुसार, न्यूनतम सीमा काफी अधिक है, यही वजह है कि 1970 और 2016 के बीच केवल 30 ऐसी घटनाएं दर्ज की गई हैं।
कुछ वैज्ञानिक दो घंटे के भीतर 50 से 100 मिमी बारिश को ‘‘मिनी क्लाउडबर्स्ट’’ कहते हैं। भारतीय उष्णदेशीय मौसम विज्ञान संस्थान पुणे (आइआइटीएम) की श्रीमती (डा0) एन. आर. देशपाण्डे के अनुसार दो घंटे के भीतर 50 मिमी या उससे अधिक की बारिश को मिनी क्लाउडबर्स्ट कहा जा सकता है।
महासागरों के गरमाने का असर भी हिमालय पर
श्रीमती (डा0) एन. आर. देशपाण्डे के शोध के अनुसार, जून 2021 में पश्चिमी तट पर और जुलाई और अगस्त 2021 में मध्य भारत और हिमालय की घाटियों में बादल फटने की कई घटनाएं घटीं। उनके शोध में यह भी दावा किया गया है कि 1926-2015 के बीच मानसून सीजन में, मिनी बादल फटने की घटनाओं में वृद्धि हुई है।
श्रीमती देशपाण्डे ने भागीरथी और धौलीगंगा बेसिन के मौसम पर अध्ययन के साथ ही हिमालय की अतिवृष्टि पर उनके शोधपत्र ( मानसून एक्स्ट्रा ट्रॉपिकल सर्कुलेशन इंटरेक्शन इन हिमालयन एक्सट्रीम रेनफॉल, क्लाइमेट डाइनामिक्स) में भी हिमालय पर बादल फटने की घटनाओं में वृद्धि के कारण गिनाए गए हैं।
भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान श्रीनगर के डा0 मुनीर अहमद के अनुसार महासागर तेजी से गर्म हो रहे हैं, जिसके परिणामस्वरूप नमी युक्त हवा हिमालय क्षेत्र में पहुंचती है, इससे बादल फटने लगते हैं। हिंद महासागर से नमी में वृद्धि के साथ इसके और अधिक होने की संभावना है। मुनीर का मानना है कि हिंद महासागर का बढ़ता तापमान हालांकि जलवायु परिवर्तन का स्पष्ट संकेत है।
लोकल वार्मिंग का हिमालय पर दुष्प्रभाव
चिपको आन्दोलन के प्रणेता पद्मभूषण चण्डी प्रसाद भट्ट का कहना है-
ग्लोबल वार्मिंग की बात तो सभी करते हैं लेकिन लोकल वार्मिंग की चर्चा नहीं होती। श्री भट्ट हिमालई ग्लेशियरों के अध्ययन हेतु भारत सरकार द्वारा गठित पटवर्धन कमेटी के सदस्य भी थे। ग्लेशियरों के सिकुड़ने के लिए अगर केवल ग्लोबल वार्मिंग जिम्मेदार होती तो सारे के सारे ग्लेशियर पीछे खिसकते। जबकि कुछ ग्लेशियर आगे भी बढ़ रहे हैं। बढ़ते मानव दबाव के कारण हिमालय पर लोकल वार्मिंग का असर ज्यादा है।
बात भी सही है इस साल अब तक के यात्रा सीजन में बदरीनाथ समेत उत्तराखण्ड के चारों हिमालई धामों में मई से लेकर अगस्त तक के 3 महीनों में ही 33.44 लाख यात्री पहुंच गए। यही नहीं इन यात्रियों के 3,53,766 वाहन सीधे गंगोत्री और सतोपन्थ जैसे ग्लेशियरों के निकट पहुंच गए। जब रेल कर्णप्रयाग तक पहुंचेगी तो फिर असीमित और अनियंत्रित मानव समूहों की कल्पना की जा सकती है।
वनों का विनाश भी हिमालय के संकट का कारण
ग्लोबल फॉरेस्ट वॉच की रिपोर्ट के अनुसार भारत ने सन् 2002 से लेकर 2021 तक कुल भारत का 19 प्रतिशत वृक्षावरण घटा। रिपोर्ट कहती है कि वर्ष 2010 में भारत का वृक्षावरण 31.3 मिलियन है था जो कि कुल भौगोलिक क्षेत्र का 11 प्रतिशत था। सन् 2021 में हमने 127 हजार है0 प्राकृतिक वन खो दिए जोकि 54.6 मी0 टन कार्बन स्टॉक की क्षति के बराबर है। पूर्वी हिमालय जैव विविधता की दृष्टि से विश्व के सम्पन्नतम् हॉट स्पॉट्स में शामिल है, वहां हर साल वनावरण घट रहा है।
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