गंगा के प्रवाह रूपी शरीर की ये सारी बाधाएं जाहिर है मानव निर्मित है।
- फोटो : iStock
गंगा का प्रवाह और जलधारा
गंगा के इस अविरल प्रवाह में पहली रुकावट पैदा हुई-अंग्रेजों के जमाने बनी 'अपर गंगा नहर' के बनने के बाद। भीमगोंडा-नरोरा नहर के बन जाने के बाद गंगा के लगभग नब्बे-पंचानबे फीसद जल को गंगा के शरीर से वैसे ही खींच लिया जाता है, जैसे मनुष्य की धमनियों में बहने वाला खून निचोड़ा जाता है। यह अंग्रेजी हुकूमत की करामात थी- जिनके लिए नदी महज एक बहती जलधारा है।
पूज्य मदन मोहन मालवीय जी अंग्रेजों की इस छल को समझे और इसके विरुद्ध आंदोलन भी किया। यह सुनिश्चित करने के लिए की गंगा की अविरलता किसी भी सूरत में प्रभावित न हो। गंगा महासभा के मुखिया मालवीय जी और अंग्रेजों के बीच हुआ लिखित समझौता आज भी मौजूद है।
आज यह समझौता कितना लागू है- यह जांच और शोध का विषय है। अपनी सरकारों का रुख भी अंग्रेजी हुकूमत से कोई अलग नहीं रहा। रही-सही कसर टिहरी बांध बनने के बाद पूरी हो गई। आज गंगा दो बड़े बांधों एक ओर से टिहरी दूसरी ओर से फरक्का बांध के बीच फंसी कराह रही है।
वैज्ञानिक अध्ययन से यह तथ्य सामने आया है कि टिहरी बांध के बनने के बाद गंगा नदी का पूरा क्षेत्र -यहां तक दिल्ली का राजधानी क्षेत्र भी भूकंप के लिहाज अति संवेदनशील हो चुका है। एक खास इलाके में जल जमाव की वजह से भूस्खलन की समस्या भी हिमालय क्षेत्र में बढ़ी है।
उधर फरक्का बांध बनने से नदी के सतह पर गाद जमा हो रही है- जिस कारण हर साल बाढ़ की वजह से बिहार जैसे राज्य में धन जन का व्यापक नुकसान होता है।
गंगा के प्रवाह रूपी शरीर की ये सारी बाधाएं जाहिर है मानव निर्मित है। गंगा की स्वाभाविक गति को कई जगह-तोड़ने-बांधने से गंगा की वेगवती धारा की तीब्रता में कमी आई, इस कारण गंगाजल में ऑक्सीजन की मात्रा की मात्रा घट गई।
नतीजतन गंगाजल की पवित्रता में भी कमी आई। अब लंबे अरसे तक गंगा जल को किसी पात्र में संग्रह कर कीटाणु मुक्त नहीं रखा जा सकता है। ऐसी तमाम वजहें हैं कि गंगा हमारे लिए अब वैसी मोक्षदायिनी-जीवनदायिनी नहीं रही।
बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के डॉक्टरों की एक हालिया रिपोर्ट में भी यह जानकारी प्राप्त हुई है कि गंगाजल में भारी धातुओं-निकल-आर्सेनिक की मौजूदगी से गॉलब्लेडर कैंसर के अधिकतर मरीज गंगा किनारे बसे शहरों में पाए गए हैं।
गंगा में जल प्रवाह की गति कम होने का एक बुरा असर- बाढ़ के मौसम को छोड़ दे तो- बाकी समय नदी के बीचोबीच उभरते रेत के टीले के रूप में सामने आ रहा है। रेत की इन टीलों की वजह से हजारों करोड़ रुपये खर्च करने बाद भारत सरकार की हल्दिया से बनारस-इलाहाबाद तक जल परिवहन के जरिये माल ढुलाई की महत्वाकांक्षी योजना परवान नहीं चढ़ पा रही है।
यहीं नहीं बनारस जैसे दुनिया के सबसे प्रचीन शहर के कई घाटों का अस्तित्व खतरे में पड़ गया है। बालू के ये बड़े-बड़े टीले गंगा नदी की धारा को बनारस के घाटों की ओर मोड़ रहा है, इस कारण बनारस के कई घाट अंदर से खोखले हो गये हैं और उनके धसकने की सम्भवना पैदा हो गई है।
गंगा किनारे बसे औघोगिक अपशिष्ट, कूड़े कचरे- बिना शोधित जल-मल का गंगा में बहाव से गंगा की सेहत आज बेहद प्रदूषित हो चुका है।
सवाल है कि जिन पौराणिक मान्यताओं में यह बताया जाता है कि-राजा भगीरथ ने घोर तपस्या कर अपने पुरखों को तारने और पुण्य कमाने के लिए गंगा नदी को स्वर्गलोक से पृथ्वी लोक पर अवतरण कराया,वही गंगा आज हमारे जनों को उबारने में सक्षम क्यों नहीं है?
जो अंग्रेज गंगा के शरीर को बांधों की बेड़ियों जकड़ने की तरकीब सीखा गये, वे अपनी टेम्स नदी की साफ-सफाई का पूरा इंतजाम करने में सफल रहे।और हम आजादी के पचहत्तर साल बाद भी पवित्र गंगा नदी को प्रदूषण मुक्त करने की जदोजहद में लगे हैं।
ये वही अंग्रेज हैं-जो एक जमाने में गंगा के मुहाने से हमारी बहुमूल्य थाती खींचते थे और टेम्स नदी के मुहाने पर निचोड़ लेते थे। क्या हम इतिहास की इस भूल से कोई सबक सीख पाये हैं? अपनी सभ्यता- संस्कृति की रक्षा और सनातन धर्म के निरंतर प्रवाह को बनाये रखने के लिए भी आज गंगा का अविरल प्रवाह सुनिश्चित करना समय की मांग है। इस काम को सामुदायिक व्यवहार से हम जितना जल्दी करें, उतना ही बेहतर।
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।