भारत में अवैज्ञानिक तरीकों से भण्डारण का प्रचलन खुद सरकारें कराती हैं। खुले आसमान के नीचे कभी बोरों में या कभी यूं ही ढ़ेरों में पड़ा अनाज प्रायः सभी ने देखा है।
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भारतीय अर्थव्यवस्था और कृषि
भारत कृषि प्रधान देश है जो हमारी अर्थव्यवस्था की रीढ़ है। 47 प्रतिशत भू-भाग में खेती होती है और 70 प्रतिशत आबादी इसी पर निर्भर है। हर किसान अच्छी फसल की उम्मीद करता है मेहनत कर सफल भी होता है। लेकिन उसकी मेहनत को सहेजने के लिए फरमानों के दौड़ते कागजी घोडों के बदलते ठिकानों और मुकाम पर पहुंचने से पहले बेमौसम, एकाएक और विक्षोभ की बारिश का शिकार होती उपज का कसूर किसे दिया जाए?
बेहद अफसोस होता है कि ऐसे कागजी घोड़े न रुकते न थकते हैं। हां, उन रुक्कों में मजमून बदल जाता है। पहले भण्डारित फसलों की सुरक्षा की नाकाम कोशिशें थी जो लाखों खर्च के बावजूद नीली, पीली पॉलिथीन की मोटी तिरपाल भी नहीं बचा पाईं। कहीं तिरपाल उड़ गई, कहीं फट गई और किसान का खून-पसीने से उगाया अनाज किसी की भी भूख भी नहीं मिटा पाया न इंसानों की और न जानवरों की ही। अब सरकारी तंत्र की नई और बेचारगी से भरी कवायद शुरू होनी है जो नए और बेजा खर्च का बही-खाता लिखेगी।
बेमौसम या अचानक हुई बारिश से हुए नुकसान का हिसाब-किताब का नया रुक्का नए सिरे से दौड़ने लग जाता है। लालफीताशाही में जकड़े कागजी घोड़े न कभी रुकते हैं न थकते हैं। बस नुकसान का लेखा, बचाने में खर्चों की इजाजत, नुकसान के अनुमान से भरे कागज अंततः बैलेन्स शीट में जगह पाने और अगले साल की जुगत में दोबारा एक टेबिल से दूसरी टेबिल में दौड़ना शुरू कर देते हैं।
विचारणनीय यह है कि भारत में अवैज्ञानिक तरीकों से भण्डारण का प्रचलन खुद सरकारें कराती हैं। खुले आसमान के नीचे कभी बोरों में या कभी यूं ही ढ़ेरों में पड़ा अनाज प्रायः सभी ने देखा है।
आंकड़े बताते हैं कि भारत में वार्षिक भण्डारण हानि लगभग 7000 करोड़ रुपए की होती है जिसमें 14 मिलियन टन खाद्यान्न बर्बाद होता है। अकेले हर वर्ष भारत के कुल गेहूं उत्पादन में से करीब 2 करोड़ टन गेहूं किसी न किसी तरह नष्ट हो जाता है। एक अध्ययन के अनुसार देश में करीब 93 हजार करोड़ रुपयों के अनाज की बर्बादी होती है।
तमाम योजनाओं और कागजी खानापूर्ति के बीच देश में वेयर हाउस या साइलो क्यों नहीं बन पा रहे हैं?
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सरकारी योजनाएं और संस्थाएं
देश में भारतीय खाद्य निगम है जो 1964 में बना और 1965 में स्थापित हुआ। भीषण अन्न संकट विशेष रूप से गेहूँ की कमीं के चलते इसकी जरूरत महसूस हुई। किसानों के लिए लाभकारी मूल्य की सिफारिश के साथ 1965 में ही कृषि लागत एवं मूल्य आयोग यानी सीएसीपी का भी गठन किया गया।
मकसद खाद्यान्न और दूसरे खाद्य पदार्थों की खरीदी, भण्डारण, परिवहन, वितरण और बिक्री हो सके। लेकिन खाद्य गोदाम को बनाने में तेजी नहीं आई। जो बनने थे तभी बने बाद में रफ्तार सुस्त पड़ गई। उधर अनाज का बम्पर उत्पादन होने लगा।
विडंबना देखिए तमाम सरकारी संकल्पों के बावजूद भण्डारण में न रुचि ली गई और न काम में गति आई जो अलग विचारणनीय है। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने 2020-21 का बजट पेश करते समय किसानों के लिए 16 सूत्रीय फॉर्मूले की घोषणा की थी।
इसमें वेयर हाउस और कोल्ड स्टोरेज की भी चर्चा हुई। कहा गया कि राष्ट्रीय कृषि और ग्रामीण विकास बैंक नए नये वेयर हाउस बनायेगा और इसकी संख्या बढ़ाने के लिए पीपीपी मॉडल को अपनाएगा। यहां तक कि ब्लॉक स्तर पर भंडार गृह बनाये जाना प्रस्तावित हुआ।
लेकिन जमीन पर कुछ दिखा नहीं। फरवरी, 2021 में एक संसदीय प्रश्न के उत्तर में खाद्य एवं सार्वजनिक वितरण विभाग ने बताया कि भारतीय खाद्य निगम ने 25 लाख मीट्रिक टन साइलो क्षमता प्रदान की है। अदानी लॉजिस्टिक्स की क्षमता 4 लाख मीट्रिक टन (कुल का 16 फीसदी) जबकि राष्ट्रीय संपार्श्विक प्रबंधन सेवाओं यानी एनसीएमएसएल (नेशनल कोलेटरल मैनेजमेंट सर्विसेज लिमिटेड) की क्षमता 7 लाख मीट्रिक टन (कुल का 28 फीसदी) है। जाहिर है पैदावार के मुकाबले बेहद कम है और देश में दो ही प्लेयर हैं। ऐसे में खुले में गेहूं का सड़ना नीयति नहीं तो और क्या है?
तमाम योजनाओं और कागजी खानापूर्ति के बीच देश में वेयर हाउस या साइलो क्यों नहीं बन पा रहे हैं? देश में 249 स्थानों पर साइलो बनाने की योजना थी ताकि 12000 करोड़ रुपए के गेहूं का संग्रहण किया जा सके। लेकिन गति सुस्त है। इसके पीछे योजनाओं में दस्तावेजों के पुलिन्दों के साथ कठिन खानापूर्ति है जो साधारण लोगों के बस की बात नहीं। उधर हर साल और हर मौसम में अनाज का भी खुले में सड़ना नहीं रुक रहा है।
शायद यही कारण है कि मौजूदा ज्यादातर वेयर हाउस या साइलो किनके हैं, देखते ही माजरा समझ आने लगता है। यदि खास भण्डारण गृहों में आम किसान की पूछ परख होती तो क्या यही स्थिति होती? सवाल में ही जवाब छुपा है। ले देकर लुटा-पिटा भोला किसान उसके लिए आसान सरकारी संग्रहण या खरीदी केन्द्रों पर ही टूटता है।
स्वाभाविक है कि भण्डारण क्षमता से ज्यादा स्टॉक होगा ही ताकि जगह की कमीं बताकर खुले में रखे जाने का भ्रष्ट खेल खूब फले, फूले और बाद में एकाएक आई बारिश से सड़े अनाज की व्यथा-कथा और रहस्यों के बीच सरकारी धन के नाश और खुद के विकास का खेल हो सके।
यदि अत्याधिक उत्पादन वाले इलाके चिन्हित कर सरकारी भण्डारण गृहों के बनाने पर तेजी से काम होता जो सिर्फ एक बार के ही निवेश से 100 साल से भी ज्यादा काम आते और आपदा में राहत का पिटारा बनते। यदि हिसाब लगाया जाए तो इनकी लागत खाद्यान्न भीगने, सड़ने या कीट, पक्षियों से होनी वाली एक साल की क्षति से भी कम बैठती। ऐसे में क्या मुनासिब नहीं है कि बरबाद हो रही फसल की कीमत में थोड़ी कम-ज्यादा रकम लगाकर जरूरत के मुताबिक बड़े-बड़े व अत्याधुनिक संसाधनों से लैस गोदाम बनाए जाते?
लेकिन सवाल फिर वही कि बेहद साधारण सी इस पहल के लिए गंभीर प्रयास करेगा कौन? बड़े-बड़े भण्डारण और शीतगृह के मालिक या भरपूर सरकारी छूट, मनमाफिक किराया और तमाम नामी-बेनामी सुविधाएं लेने वाले रसूखदार? लगता नहीं कि अनाज उगाता किसान और अनाज सड़ाती अफसरशाही की व्यवस्था ही हमारा सच है? काश असल दोषी उजागर हो पाते!
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