फिल्मों में बापू का किरदार
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कई भाषाओं में गांधी पर फिल्में
महात्मा गांधी की हत्या के तुरंत बाद उन पर कोई फ़ीचर फ़िल्म नहीं बनी। कुछ दशकों के बाद उन पर फ़ीचर फ़िल्मों की लाइन लग गई। इंग्लिश-हिन्दी के अलावा अन्य भारतीय भाषाओं में भी गांधी पर फ़िल्में बनी हैं। 2008 में एनआरएन गौडा ने ‘नानु गाँधी’ कन्नड भाषा में बनाई। इसमें बच्चों का एक समूह अपने आसपास के लोगों को गांधी के सिद्धांतों एवं विचारों की प्रेरणा देता है।
2009 में अमित राय ने हिन्दी में ‘रोड टू संगम’, 2016 में सरोज मिश्र ने भी हिन्दी में ‘गांधीगीरी’, 2018 में नईम सिद्दिकी ने ‘हमने गांधी को मार दिया’ बनाई। 2019 में गुजराती में एक बिल्कुल अलग ढ़ंग की फ़िल्म गांधी पर आई। इस अनोखी फ़िल्म का नाम है, ‘रीबूटिंग महात्मा’, जैसा इसके नाम से पता चलता है यह फ़िल्म महात्मा गांधी के ‘मानव मशीन’ या यूं कहें रोबोट संस्करण की बात करती है। इसमें गांधी को 21वीं सदी में लाकर उनसे आज की बातें करवाई गई हैं।
यहां गांधीजी आज की दुनिया के विषयों जैसे राजनीतिक पद्धति, सोशल मीडिया, युवा, यहां तक कि फ़िल्म यानी बॉलीवुड पर विचार-विमर्श करते नजर आते हैं। वे इन सबका आज की दुनिया पर पड़ रहे प्रभाव की बात करते हैं।
फिल्मों में गांधी जी का किरदार निभाने वाले कलाकार
इसी सिलसिले में एक मजेदार बात बताऊँ, केरल का एक आदमी एक बार अपनी कम्पनी के एक समारोह में फैंसीड्रेस के लिए गाँधीजी का रूप धरता है और लोग इतनी प्रशंसा करते हैं कि वह अपने लंबे-घुंघराले बालों को सदा के लिए तिलांजलि दे देता है और शाकाहारी बन जाता है। फ़िल्म में काम करता है, नाटकों में हिस्सा लेता है और-तो-और केरल में खड़ी गांधीजी की कई मूर्तियों के लिए मॉडल बनता है। उसके एक दोस्त के पिता जिन्होंने स्वतंत्रता आंदोलन में भाग लिया था, ने उसे पॉकेट घड़ी दी।
स्थानीय मोची ने चमड़े की चप्पलें बना दीं। चश्मे वाले ने गांधीजी के गोल रिंग वाला चश्मा बना दिया। पिछले तीस साल से यह व्यक्ति गांधी जी न केवल भूमिका कर रहा वरन उनकी तरह जीवन व्यतीत करने की चेष्टा भी कर रहा है। एरणाकुलम के इस आदमी का नाम है जॉर्ज पॉल। खादी का शॉल कंधे पर डाले धोती से गोल्डचेन वाली पॉकेट घड़ी लटकाए हाथ में लाठी लिए इस व्यक्ति को देख कोई भी धोखा का जाए। स्कूल-कॉलेज, मंच, फ़िल्म में तकरीबन 4,000 से अधिक बार गांधी की भूमिका करने वाले जॉर्ज पॉल ने अपने घर का नाम ‘साबरमति’ रखा है।
फ़िल्मों में गांधीजी के नजर आने की बात ऐसी है कि स्वतंत्रता आंदोलन पर बनी फ़िल्म हो, नेहरू, आंबेडकर पर कोई भी फ़िल्म हो उसमें गाँधीजी की उपस्थिति होगी ही, जैसे गुरिन्दर चड्ढ़ा की फ़िल्म ‘हाउस ऑफ़ वॉयसराय’ (यह ‘पार्टिशन’ नाम से भी उपलब्ध है) में गांधी हैं।
‘9 आवर्स’ फ़िल्म बात गोडसे की करती है पर फ़िल्म में गांधी हैं। कमल हासन ने ‘हे राम’ बनाई उसमें नसीरुद्दीन शाह गांधी की भूमिका में हैं। केतन मेहता ने 1993 में गांधी तथा सरदार वल्लभ भाई पटेल के रिश्तों पर फ़िल्म ‘सरदार’ बनाई। इसमें पटेल की भूमिका में परेश रावल हैं और अन्नु कपूर ने गांधीजी की भूमिका की है।
ये तो कुछ उन फ़िल्मों की बात हुई जहाँ गांधीजी परदे पर हैं पर पूरी फ़िल्म उन पर केंद्रित नहीं है। आगे हम उन फ़िल्मों की बात करेंगे जहां गांधीजी मुख्य किरदार हैं। और उससे भी पहले हम गांधीजी को डॉक्यूमेंट्री में भी देखने वाले हैं।
पढ़िए गांधी और सिनेमा श्रृंखला का तीसरा भाग- महात्मा गांधी डॉक्यूमेंट्री में
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