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समुंदर के बाशिंदे और उनकी दुनिया: मुछआरा समुदाय के गीतों में बसता है पंछियों का संसार

सार

इस लेख में इस 'कोलीगीत' के माध्यम से स्थानीय पक्षियों और पौधों की प्रजातियों का विशेष उल्लेख किया गया है। जैसे-जैसे समय बदलता है, वैसे-वैसे आसपास की प्रकृति और मानव जीवन शैली भी बदलती है। 

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समुंदर के बाशिंदे और उनकी दुनिया - फोटो : Amar Ujala
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विस्तार
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मछुआरा समाज एक मानव समूह है जिसकी जीवन यात्रा समुद्र की लहरों पर सवार होकर चल रही है। महाराष्ट्र को लगभग सात सौ-बीस किलोमीटर की तटरेखा का आशीर्वाद प्राप्त है, जिसके किनारों पर मुख्य रूप से ‘कोली’ समुदाय पीढ़ियों से रह रहा है, जो मछली पकड़ने के माध्यम से अपनी आजीविका कमा रहा है।

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प्रकृति पूरक जीवन शैली और सहजता इस समाज की विशेषता है, इसीलिए समाज की परम्परागत ‘कोलीगीते’ चाहे वह विवाह हो, जन्मदिन हो, उत्सव हो, विभिन्न धार्मिक समारोह हों या सामाजिक जागरूकता की अवधारणा, उनके जीवन की अभिव्यक्ति के प्रभावी साधन हैं।

इस लेख में इस 'कोलीगीत' के माध्यम से स्थानीय पक्षियों और पौधों की प्रजातियों का विशेष उल्लेख किया गया है। जैसे-जैसे समय बदलता है, वैसे-वैसे आसपास की प्रकृति और मानव जीवन शैली भी बदलती है। यदि हम अतीत के कोलीगीत और वर्तमान के कोलीगीत का पता लगाएं तो हम निश्चित रूप से पक्षियों विविधता और बदलती प्रकृति को समझ पाएंगे। 

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भारतीय मछुआरे (सांकेतिक तस्वीर) - फोटो : Social Media

कौवा, मोर, मुर्गा और कोयल ऐसे पक्षी हैं जिनका उपयोग अक्सर कोलीगीत में प्रतीकात्मक रूप से किया जाता है। इनमें से 'कोम्बडा याने मुर्गा' इसलिए खास है क्योंकि यह इस मछुआरा समुदाय की आराध्य देवी  'एकवीरा देवी’ हैं जो लोनावाला के कार्ले गांव में एक पहाड़ी पर वह मुर्गे पर विराजमान हैं।
  

'आई माझी कोणाला पावली गो आई माझी कोणाला पावली 
आई माझी कोंबर्यावर बैसली गो आई माझी कोंबर्यावर बैसली' 

 


शाहीर साबले द्वारा गाया गया यह कोलीगीत देवी एकवीरा और उनके वाहन कोम्बडा की महिमा करता है। एक नायक की मां के रूप में 'एकवीरा' यहां भगवान परशुराम और उस मछुआरे के बीच के संबंध को बताती है जिसने समुद्र को काटकर कोंकण की भूमि बनाई थी। 

शाहिर विठ्ठल उमप द्वारा रचित यह कोलीगीत हमारे सामने कोली मछली पकड़ने वाले समुदाय की बिक्री कौशल और प्रबंधन के पारंपरिक ज्ञान के अंतर्संबंध को व्यक्त करता है। 

घेऊनशी जा रं ताजा ताजा दादा ताजा ताजा 
चिकना चिकना म्हावरा माझा 

इस्वास ठेव रं सांगतंय् नक्की 
याचे पुरती कोंबकों री फिकी 

अंगानं जोर येईल कामकाजा दादा कामकाजा 
चिकना चिकना म्हावरा माझ' 

 


बालकराम वर्लिकर द्वारा गाए गए एक प्रसिद्ध कोली गीत में गंगा-जमुना नदियों, आम, जय, जुई जैसे पौधों और प्रतीकात्मक 'मोर' पक्षी का उल्लेख है, जिसके माध्यम से कवि मछुआरा समाज और उसके 'दहेज विरोधी' प्रगतिशील विचार की व्याख्या करता है। 

'गंगा-जमुना दोघ्या बयनी गो पानी झुलझुल व्हाय 
दर्याकिनारी एक बंगला गो पानी जाय-जुई-जाय 

आंब्याच्या डांगलीवर बसलाय् मोर, नवरीचा बापुस कवटं चोर 
करवल्या खुइताना आंब्याच्या डांगल्या म्हायेरा जावालं सांजवलं 

आंब्याची डांगली हलविली नवर्याने नवरीला पलविली' 

 

पांडुरंग अगवाने की मधुर संगत वाला एक कोली गीत ‘माझा कोंबडा’ है जो बढ़ती महंगाई और भारतीय संस्कृति को भूलकर पश्चिमी तरीकों को अपनाने वाले युवाओं का वर्णन करता है। 

'माझा कोंबरा कोणी मारिला 
माझ्या कोबर्याची बांग 
आणि आजकाल सगळंच झालं महाग ' 

एक हालिया कोली गीत सुजीत पाटिल द्वारा लिखित 'कुहू कुहू कोयल दनाणली आई तुझ्या डोंगरावर' है जिसमें बदलते पर्यटन, मुंबई-पुणे राजमार्ग और पेड़ों का उल्लेख है, वहीं, शांताराम नंदगांवकर और अनंत पाटिल द्वारा रचित कोली गीत 'माझ्या दारावर मोरयो आयलो मोर मला बोलावतो' एक लड़की की अपनी मां और सुंदर प्रकृति के साथ एक सुंदर तस्वीर प्रस्तुत करता है। 

दामोदर विटेकर द्वारा रचित और मधुकर पाठक द्वारा संगीतबद्ध, 'कावळा पिपेरी वाजवतो' अपने समय से बहुत आगे थी, जिसमें दहेज प्रथा का विरोध, धन की योजना बनाना और नशे से मुक्ति का कड़ा संदेश बड़े ही मजाकिया अंदाज में पेश किया गया। 
 

'कावळा पिपेरी वाजवतो 
मामा मामीला नाचवतो 

लग्नाचा थाट तुम्ही कमी करा 
हुंड्याची चाल आता बंद करा 

कपड्याची फॅशन आवरा जरा 
सुखाचा संसार आपला करा' 

इस रूप में कई कोली गीत हैं जो पारंपरिक रूप से विवाह समारोहों के दौरान गाए जाते हैं जिनमें कबूतर, कौवे, बगुले, तितलियां, कुछ विशेष समुद्री पक्षी 'केगई' का वर्णन होता है। 

प्रदीप नामदेव चोगले वर्तमान में डब्ल्यूसीएस-इंडिया में समुद्री कछुओं, मत्स्य पालन, व्हेल, डॉल्फ़िन और समुद्री पक्षियों पर शोध  कर रहे हैं। शोध की केंद्रीय भूमिका मछली पकड़ने के दौरान समुद्री जानवरों (समुद्री कछुए और डॉल्फ़िन) को जाल में फंसने से रोकना और उनकी सुरक्षा से संबंधित है।
 

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

 

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