वरिष्ठ फिल्म पत्रकार और स्तंभकार जयप्रकाश चौकसे नहीं रहे। एक ऐसे दौर में जब फिल्मों को ही गंभीरता से नहीं लिया जाता था और उसका प्रभाव पत्रकारिता में सिनेमा और मनोरंजन पत्रकारिता पर भी नकारात्मक ही था और जिसके चलते फिल्म पत्रकारिता मुख्यधारा में केवल चटपटी मसालेदार खबरों की भरपाई मात्र थी, वहां जयप्रकाश चौकसे जैसे प्रखर फिल्म पत्रकार/स्तंभकार ने 5 दशक तक सिनेमाई दुनिया के संसार की ऐसी छवि गढ़ी जिसने फिल्म पत्रकारिता को एक स्तर दिया और अपनी गरिमा और प्रतिष्ठा के साथ स्थापित कर दिया।
सांसों की डोर सृजन से बंधी होती है। रचनात्मकता यश को नहीं उम्र को भी बढ़ाती है और कलाएं जीवन में केवल बाह्य उपक्रम मात्र नहीं होती बल्कि उसका एक संसार आत्मा और देह के बीच भी रचता-बसता है जहां जीवन की तमाम उठापटक और तन-मन की आधियों-व्याधियों के बीच आयु के सेतु की सतत् मरम्मत होती रहती है। संगीत की साधना हो अथवा कैनवास में रंग भरती किसी चित्रकार की कूची अथवा शब्दों से संसार में रचते-पगते किसी लेखक, स्तंभकार की कलम, जिस दिन सृजन की यह यात्रा थमती है उससे बंधी सांसें भी उखड़ने लगती हैं और देह और आत्मा के बीच बंधा आयु का सेतु दरकने लगता है।
जाहिर है, आयु का सेतु कहीं दरकने लगा था और अलविदा की गूंज उन्हें सुनाई देने लगी थी।
और आज वही हुआ जिसकी आशंका मुझे 25 फरवरी के दैनिक भास्कर के प्रथम पृष्ठ पर उनके स्तंभ के थमने और फिर दोबारा शुरू होने की सूचना के बीच थी। उनकी अलविदा की गूंज आज पत्रकारिता जगत और उनके लाखों पाठकों के संसार के बीच निधन की सूचना बन गई।
जनाब जावेद अख्तर साहब ने मुझसे एक बार कहा था कि अगर मैंने अंग्रेजी भाषा में लेखन किया होता तो देश-विदेश से मुझे भाषण देने के लिए निमंत्रित किया जाता, परंतु मेरा विश्वास रहा है कि मनुष्य को उस भाषा में लिखना चाहिए जिसे झाडू की तरह इस्तेमाल करके वह अवचेतन में जमा कचरे को बाहर कर सके।
सागर और इंदौर विश्वविद्यालय में पढ़ाई करने के बाद उन्होंने गुजराती कॉलेज में 13 साल अध्यापन किया। श्री चौकसे के अध्ययन, पठन और सूचनाओं के विराट संसार की गलियां दूर-दूर तक फैली हुईं थीं। 12 साल की उम्र में वे राजकपूर की आवारा से प्रभावित हुए थे और यही वह फिल्म थी जिसने उनके सामने बंबई के आकाश का चित्र खींचा। राजकपूर से प्रभावित जयप्रकाश जी बाद में कपूर परिवार के निकट भी आए और उनके स्तंभ में कपूर परिवार के जीवन की घटनाएं और फिल्मी जुड़ाव के ब्यौरे सामने आते रहे जिसकी वजह से वे आलोचना के भी शिकार हुए।
बहरहाल, तमात विरोधाभासों, विषमताओं के बीच अपनी पत्रकारिता, लेखन और दीर्घ रचनात्मक यात्रा को लेकर जयप्रकाश चौकसे मानते थे कि साहित्य से सिनेमा तक का उनका यह सफल सफर उनके जीवन में घटे उन संयोगों का हिस्सा ही है जहां वे सही समय पर सही लोगों से मिल पाए।
और देखिए कैसा ही यह संयोग है कि जैसे ही उन्होंने अपने कॉलम को थामने की घोषणा की, उसके कुछ दिन बाद ही उनके सांसों की वह डोर भी थम गई जो सृजन से बंधी थी- ठीक महान लेखक प्रूस्त की तरह जो अपने महान उपन्यास "रिमेम्बरेंस ऑफ थिंग्स पास्ट" का आखिरी पन्ना लिखने के कुछ घंटे बाद ही इस संसार को अलविदा कह गए थे, जैसे वे केवल इसे ही लिखने आए थे।
बहरहाल, 83 की उम्र में दुनिया को अलविदा कहने वाले श्री चौकसे की कलम थमने के बाद भी अपने पीछे शब्दों और सूचनाओं की ऐसी विरासत छोड़ गई है जहां से हिंदी फिल्म पत्रकारिता के लिए विराट संपदा है। एक ऐसा वैभव जिस तक पहुंचकर बहुत-बहुत समृद्ध हुआ जा सकता है।