‘न्यू वेव सिनेमा’ की शुरुआत
द्वितीय विश्वयुद्ध ने यूरोप को तबाह कर दिया। सब उलट-पुलट गया। इसके बावजूद सृजन जारी रहा। फ़्रांस में ही ‘न्यू वेव सिनेमा’ का उद्भव हुआ। 1951 में फ़्रांस के रोबर्ट ब्रेससन ने ‘डायरी ऑफ़ ए कंट्री प्रीस्ट’ जैसी शानदार फ़िल्म बनाई। महान फ़िल्म निर्देशक फ़्राँस्वा त्रुफ़ो इसी समय सक्रिय थे।
स्वयं को ‘आंद्रे बाजाँ का दत्तक पुत्र’ कहने वाले फ़्राँस्वा त्रुफ़ो ने ‘ले मिस्तो’, ‘फ़ोर हंड्रेड ब्लोज’, ‘जूल्स एंड जिम’, ‘शूट द पियानो प्लेयर’ तथा ‘द सॉफ़्ट स्किन’ जैसी शानदार फ़िल्में बनाई। 1984 में बावन वर्ष की उम्र में ब्रेन ट्यूमर के कारण फ़्राँस्वा त्रुफ़ो की मृत्यु हो गई।
उनकी पहली फ़िल्म मात्र 26 मिनट की थी, बाद में उन्होंने अपनी इस फ़िल्म ‘ले मिस्तो’ को संपादित कर 17 मिनट की कर दिया। यह सर्वकालिक फ़िल्म 5 नटखट बच्चों के कारनामे को दिखाती है। ये लड़के एक युवती का पीछा करते हैं जो अपने प्रेमी से मिलने जा रही है। निर्देशक बाल/युवा मन का चितेरा है, वह दिखाता है कि ये लड़के प्रेमी-प्रेमिका का मिलन देख नहीं पाते हैं। ईर्ष्या से भर कर उनकी राह में कई रुकावट डालते हैं। उन्होंने यह फ़िल्म श्वेत-श्याम निगेटिव पर बिना ध्वनि के बनाई।
‘द सॉफ़्ट स्किन’ फ़्राँस्वा त्रूफ़ो की चौथी फ़िल्म है। ‘सिनेमा जीवन से अधिक आवश्यक है।’ कहने वाले त्रुफ़ो की फ़िल्म ‘द फ़ोर हंड्रेड ब्लोज’ फ़िल्म इतिहास में विशिष्ट स्थान रखती है। सिनेमा अध्ययन इस फ़िल्म के अध्ययन के बिना पूरा नहीं हो सकता है। ज्याँ-लुक गोदार्द की ‘ब्रेथलेस’ इसी काल की फ़िल्म है। ये फ़िल्म निर्देशक डेढ़ दशक तक फ़िल्मी दुनिया पर छाए रहे।
फ़िल्म निर्देशक फ़्रांस्वा त्रुफ़ो जिस आंद्रे बाजां को अपने पिता का सम्मान देते थे उसने इसी काल में फ़िल्म समीक्षाएं लिखनी प्रारंभ की थी। वे फ़िल्मों का विस्तार से वर्णन करते थे। इसी कारण मात्र तीस वर्ष की उम्र में वे उच्च कोटि के फ़िल्म समीक्षक स्वीकारे जा चुके थे। उन्होंने अपने दोस्तों के साथ मिल कर 1951 में ‘काइए न्यू सिनेमा’ (सिनेमा की डायरी) का प्रांरभ किया। फ़्राँस्वा त्रूफ़ो बाद में इस पत्रिका के संपादक बने। फ़्रांस में ही ‘निर्देशक का सिनेमा’ (auteur theory) सिद्धांत का प्रतिपादन हुआ।
‘न्यू वेव’ का दुनियाभर के सिनेमा पर असर
लुई लेमियर ने भले ही कहा था कि सिनेमा का आविष्कार बिना किसी भविष्य का है, लेकिन इसका भविष्य उज्जवल साबित हुआ और आज सवा शताब्दी बाद भी परदे पर इसका जादू कायम है। फ़्रांस के ‘न्यू वेव’ का असर भारत सहित पूरी दुनिया के सिनेमा पर पड़ा। एलैन रेसनाइस, एग्नेस वर्डा, लुई माले, एरिक रोह्मर इस समय के फ़्रांस के अन्य प्रसिद्ध फ़िल्म निर्देशक हैं।
मजे की बात है कि इस समय फ़्रांस की महान फ़िल्में केवल फ़्रांसीसी निर्देशक ही नहीं बना रहे थे। ‘द पैशन ऑफ़ जॉन ऑफ़ आर्क’ का निर्देशन डेनिश फ़िल्म निर्देशक थियोडोर ड्रेयर ने किया। फ़्रांस के सिनेमा से आकर्षित हो कर तमाम अभिनेता, निर्माता, एडीटर फ़्रांस आए और इस उद्योग से जुड़े।
पिछली सदी के अंतिम दशक में फ़िल्मों में यथार्थवाद (रियलिज्म) पुन: लौटा है, जो अब तक कायम है। फ़्रेंच निर्देशक जीन पियरे जुने ने 1991 में ‘डेलीकैटस्सेन’ तथा 2001 में ‘अमिली’ बनाई। इसी ने ‘सिटी ऑफ़ द लॉस्ट चिल्ड्रेन’, ‘एलियन रिजरेक्शन’ भी बनाई है। नि:संदेह जाक अडियार्ड आज फ़्रांस के सर्वाधिक प्रसिद्ध फ़िल्म निर्देशक हैं। उन्होंने 2005 में ‘द बीट दैट माई हार्ट स्किप्ड’ तथा 2010 में ‘ए प्रोफ़ेट’ बनाई।
फ़्रांस में ही सर्वाधिक प्रसिद्ध फ़िल्म समारोह कान फ़ेस्टिवल आयोजित होता है।
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