फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

विश्व सिनेमा की जादुई दुनिया: फ्रांस से शुरू हुआ दुनिया के सिनेमा का सफर, समय के साथ आता गया सुधार

सार

1902 में आज से करीब सवा सौ साल पहले जॉर्ज मेलिस ने एक अद्भुत फ़िल्म ‘ए ट्रिप टू मून’ बनाई। इसे ही पहली साइंस-फ़िक्शन फ़िल्म का दर्जा हासिल है और इसे सिनेमैटिक स्पेशल इफ़ेक्ट का मील का पत्थर कहा जाता है। 
विज्ञापन
सांकेतिक तस्वीर
विज्ञापन

विस्तार
वॉट्सऐप चैनल फॉलो करें

फ्रांस में सिनेमा का जन्म हुआ। इस काल में वास्तव में जिसे अग्रणी मान सकते हैं वह जॉर्ज मेलिस था। उसने सच में सिनेमा को मनोरंजन की वस्तु बना कर प्रस्तुत किया। 1902 में आज से करीब सवा सौ साल पहले उसने एक अद्भुत फ़िल्म ‘ए ट्रिप टू मून’ बनाई। इसे ही पहली साइंस-फ़िक्शन फ़िल्म का दर्जा हासिल है और इसे सिनेमैटिक स्पेशल इफ़ेक्ट का मील का पत्थर कहा जाता है।

विज्ञापन


जॉर्ज मेलिस ने ही सर्वप्रथम सिनेमा को कलात्मक अभिव्यक्ति के रूप में दर्शाया। उसने सिनेमा का जादू कायम किया। असल में फ़िल्म बनाने से पहले वह मंच पर जादू दिखाने का काम किया करता था। अपने जादुई करिश्मे से लोगों का मनोरंजन करता था, बाद में उसने पेरिस में फ़िल्म स्टूडियो खोला और सृजनात्मकता तथा अन्वेषण का अनूठा नमूना ‘ए ट्रिप टू मून’ बनाया।

इसके अलावा उसने करीब 500 फ़िल्में और बनाई। वह अपनी फ़िल्मों को रंगता भी था जो उस समय एक अजूबा था। फ़िल्म निर्देशक मार्टिन स्कॉरसेसि ने ‘ह्यूगो’ फ़िल्म बना कर सिनेमा के इसी पूर्वज को अपनी श्रद्धांजलि दी है।
विज्ञापन


फ़्रेंच सिनेमा के लिए ‘नेपोलियन’ बड़ी कामयाबी

1927 में छ: घंटे की बायोपिक ‘नेपोलियन’ बना कर एबल गैन्स ने फ़्रेंच सिनेमा को बहुत ऊँचाई प्रदान कर दी। केबिन ब्राउनलॉ की कृपा से यह आज उपलब्ध है। ब्राउनलॉ ने मरम्मत कर 330 मिनट का एक संस्करण तैयार किया है। मगर इससे एबल की इस मूक फ़िल्म की मात्र एक झलक मिलती है। आज भी एबल की इस फ़िल्म को मूक युग की एक महान फ़िल्म का दर्जा हासिल है। इसी काल में फ़्रांस में ‘ले मिजराबले’ का निर्माण भी हुआ। इसे फ़ेसकोर्ट ने बनाया था। 

सिनेमा के सवाक होते ही फ़्रांस में फ़िल्मों की बाढ़ आ गई। वहां प्रतिभा की कोई कमी न थी। अब अन्य विधाओं के लोग सिनेमा की ओर मुड़ गए।
 

नाटककार मार्सेल पैग्नोल के यहां से ‘फ़र्स्ट मारियुस’, ‘फ़ैनी’, ‘सीजर’ जैसी फ़िल्में आईं। रेने क्लायर ने ‘अंडर द रूफ़्स ऑफ़ पेरिस’ नाम से 1930 में एक म्युजिकल फ़िल्म बनाई। इसी काल में ‘यथार्थवाद’ का विस्फ़ोट हुआ, जिसके प्रणेता वीगो, ज्याँ रेनुआँ, जुलीएन डुविवियर थे। वीगो ने हास्य-व्यंग्य की फ़िल्म ‘ज़ीरो ड कन्डुइट’ तथा काव्यात्मक ‘ल’एटलान्टे’ बनाई और यह उनकी अंतिम फ़िल्म साबित हुई।


इसके बाद टीबी के कारण मात्र 29 साल की उम्र में उनकी मृत्यु हो गई। फ़्रांस के ये वही ज्यां रेनुआं हैं जिनसे हमारे सत्यजित राय प्रभावित थे। जब सिनेमा मूक से वाचाल हुआ तो बहुत सारे फ़िल्म निर्देशक इस नई तकनीकि को संदेह की नजर से देख रहे थे और इसे अपनाने में हिचक रहे थे, लेकिन ज्यां रेनुआं जैसे निर्देशकों ने इस नई तकनीकि, नई चुनौती को स्वीकारा और आज हम जानते हैं कि इसका नतीजा कितना आश्चर्यजनक रहा।

ज्यां रेनुआं से सिने दर्शक/प्रेमी परिचित हैं। उन्होंने ‘ए डे इन द कंट्री’, ‘द क्राइम ऑफ़ मोस्युर लैंग’, ‘द रिवर’ तथा ‘रूल्स ऑफ़ द गेम’ बनाई और ‘ला रिगल डु जेउ’ को उनकी महान फ़िल्म कहा जाता है।

विज्ञापन

film producer
‘न्यू वेव सिनेमा’ की शुरुआत

द्वितीय विश्वयुद्ध ने यूरोप को तबाह कर दिया। सब उलट-पुलट गया। इसके बावजूद सृजन जारी रहा। फ़्रांस में ही ‘न्यू वेव सिनेमा’ का उद्भव हुआ। 1951 में फ़्रांस के रोबर्ट ब्रेससन ने ‘डायरी ऑफ़ ए कंट्री प्रीस्ट’ जैसी शानदार फ़िल्म बनाई। महान फ़िल्म निर्देशक फ़्राँस्वा त्रुफ़ो इसी समय सक्रिय थे।
 
स्वयं को ‘आंद्रे बाजाँ का दत्तक पुत्र’ कहने वाले फ़्राँस्वा त्रुफ़ो ने ‘ले मिस्तो’, ‘फ़ोर हंड्रेड ब्लोज’, ‘जूल्स एंड जिम’, ‘शूट द पियानो प्लेयर’ तथा ‘द सॉफ़्ट स्किन’ जैसी शानदार फ़िल्में बनाई। 1984 में बावन वर्ष की उम्र में ब्रेन ट्यूमर के कारण फ़्राँस्वा त्रुफ़ो की मृत्यु हो गई।

उनकी पहली फ़िल्म मात्र 26 मिनट की थी, बाद में उन्होंने अपनी इस फ़िल्म ‘ले मिस्तो’ को संपादित कर 17 मिनट की कर दिया। यह सर्वकालिक फ़िल्म 5 नटखट बच्चों के कारनामे को दिखाती है। ये लड़के एक युवती का पीछा करते हैं जो अपने प्रेमी से मिलने जा रही है। निर्देशक बाल/युवा मन का चितेरा है, वह दिखाता है कि ये लड़के प्रेमी-प्रेमिका का मिलन देख नहीं पाते हैं। ईर्ष्या से भर कर उनकी राह में कई रुकावट डालते हैं। उन्होंने यह फ़िल्म श्वेत-श्याम निगेटिव पर बिना ध्वनि के बनाई।

‘द सॉफ़्ट स्किन’ फ़्राँस्वा त्रूफ़ो की चौथी फ़िल्म है। ‘सिनेमा जीवन से अधिक आवश्यक है।’ कहने वाले त्रुफ़ो की फ़िल्म ‘द फ़ोर हंड्रेड ब्लोज’ फ़िल्म इतिहास में विशिष्ट स्थान रखती है। सिनेमा अध्ययन इस फ़िल्म के अध्ययन के बिना पूरा नहीं हो सकता है। ज्याँ-लुक गोदार्द की ‘ब्रेथलेस’ इसी काल की फ़िल्म है। ये फ़िल्म निर्देशक डेढ़ दशक तक फ़िल्मी दुनिया पर छाए रहे।

फ़िल्म निर्देशक फ़्रांस्वा त्रुफ़ो जिस आंद्रे बाजां को अपने पिता का सम्मान देते थे उसने इसी काल में फ़िल्म समीक्षाएं लिखनी प्रारंभ की थी। वे फ़िल्मों का विस्तार से वर्णन करते थे। इसी कारण मात्र तीस वर्ष की उम्र में वे उच्च कोटि के फ़िल्म समीक्षक स्वीकारे जा चुके थे। उन्होंने अपने दोस्तों के साथ मिल कर 1951 में ‘काइए न्यू सिनेमा’ (सिनेमा की डायरी) का प्रांरभ किया। फ़्राँस्वा त्रूफ़ो बाद में इस पत्रिका के संपादक बने। फ़्रांस में ही ‘निर्देशक का सिनेमा’ (auteur theory) सिद्धांत का प्रतिपादन हुआ।

‘न्यू वेव’ का दुनियाभर के सिनेमा पर असर

लुई लेमियर ने भले ही कहा था कि सिनेमा का आविष्कार बिना किसी भविष्य का है, लेकिन इसका भविष्य उज्जवल साबित हुआ और आज सवा शताब्दी बाद भी परदे पर इसका जादू कायम है। फ़्रांस के ‘न्यू वेव’ का असर भारत सहित पूरी दुनिया के सिनेमा पर पड़ा। एलैन रेसनाइस, एग्नेस वर्डा, लुई माले, एरिक रोह्मर इस समय के फ़्रांस के अन्य प्रसिद्ध फ़िल्म निर्देशक हैं।

मजे की बात है कि इस समय फ़्रांस की महान फ़िल्में केवल फ़्रांसीसी निर्देशक ही नहीं बना रहे थे। ‘द पैशन ऑफ़ जॉन ऑफ़ आर्क’ का निर्देशन डेनिश फ़िल्म निर्देशक थियोडोर ड्रेयर ने किया। फ़्रांस के सिनेमा से आकर्षित हो कर तमाम अभिनेता, निर्माता, एडीटर फ़्रांस आए और इस उद्योग से जुड़े।

पिछली सदी के अंतिम दशक में फ़िल्मों में यथार्थवाद (रियलिज्म) पुन: लौटा है, जो अब तक कायम है। फ़्रेंच निर्देशक जीन पियरे जुने ने 1991 में ‘डेलीकैटस्सेन’ तथा 2001 में ‘अमिली’ बनाई। इसी ने ‘सिटी ऑफ़ द लॉस्ट चिल्ड्रेन’, ‘एलियन रिजरेक्शन’ भी बनाई है। नि:संदेह जाक अडियार्ड आज फ़्रांस के सर्वाधिक प्रसिद्ध फ़िल्म निर्देशक हैं। उन्होंने 2005 में ‘द बीट दैट माई हार्ट स्किप्ड’ तथा 2010 में ‘ए प्रोफ़ेट’ बनाई।

फ़्रांस में ही सर्वाधिक प्रसिद्ध फ़िल्म समारोह कान फ़ेस्टिवल आयोजित होता है।


डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें