अब जरा कल्पना कीजिए एक ऐसे मनुष्य की जो स्वार्थ, भ्रष्टाचार, ईर्ष्या और घृणा से ऊपर उठकर हर काम संसार मात्र के प्रति करुणा और परमार्थ के लिए करता है। कल्पना कीजिए एक ऐसे परिवार की जिसमें पति और पत्नी एक दूसरे के परिवार को नीचा दिखाने की बजाय अपना ही समझते हैं।
ऐसे भाइयों की जिनमें जीवन के अंत तक भी उतना ही स्नेह और समर्पण बना रहता है जितना बचपन में हुआ करता था। कल्पना कीजिए ऐसे संस्थानों की जिसमें बॉस अपने स्टाफ का शोषण नहीं करता और स्टाफ अपने मालिक के साथ बेईमानी नहीं करता।
कल्पना कीजिए एक ऐसे समाज की जहां कोई किसी को लूटता नहीं, कोई किसी के साथ बेईमानी नहीं करता, छल कपट नहीं करता। कोई किसी से सिर्फ इसलिए घृणा नहीं करता कि वह किसी और धर्म या जाति का है या किसी और रंग का है।
दुकानदार मिलावट नहीं करता, पुलिस भ्रष्टाचार नहीं करती, डॉक्टर मरीजों की गरीबी और अज्ञानता का गलत फायदा नहीं उठाता और वकील और न्यायालय का एक ही उद्देश्य है, आम जनता को सच्चा न्याय दिलवाना।
कल्पना कीजिए ऐसे राष्ट्रों की जो एक दूसरे के भूभाग और उसके संसाधनों पर कब्जा जमा लेने की बजाय एक दूसरे के यहां से गरीबी, अशिक्षा, कुपोषण जैसी मनुष्यता की दुश्मन स्थितियों से निपटने के लिए सहयोग करते हों।
जिनके बीच बड़े से बड़ा और खतरनाक से खतरनाक हथियार बनाकर एक दूसरे को परास्त करने की बजाय एक दूसरे का उत्थान करने की होड़ लगी हो। एक ऐसी दुनिया जहां मनुष्य प्रकृति के विनाश की कीमत पर अपना विकास नहीं करता हो।
एक ऐसा संसार जहां प्रेम हो, करुणा हो, ईमानदारी हो, परमार्थ हो और इनके विपरीत शब्दों का कोई नाम भी ना जानता हो, उनका कोई अर्थ ही ना हो।
क्या सचमुच ऐसी दुनिया होना असंभव है??? मैंने तो पहले ही कहा था कि मेरे लिए हवा, पानी, पैसे और पेट्रोल से भी अधिक आवश्यक हैं.....सपने।
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