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घर बैठे पक्षी निहारने का आनंद और प्रकृति का सानिध्य

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पीपल के पेड़ पर फल खाता एक हरियल - फोटो : चंद्र भूषण मौर्य
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पक्षी नाम सुनते ही जेहन में एक गजब का उत्साह और रोमांच महसूस होने लगता है, ये वो लोग बखूबी समझ सकते हैं, जिन्हें पक्षी निहारने का चस्का लग चुका है। ये एक ऐसा शौक है जो न सिर्फ मन को दुनियादारी से हटाकर सुकून प्रदान करता है, बल्कि व्यक्ति को प्रकृति के करीब लाता है और उससे जुड़ने का एक सुनहरा मौका देता है।

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मेरे लिए यह शौक ध्यान या योग से कम नहीं है। जब मैं किसी जंगल या पार्क में होता हूं तो मेरी देखने और सुनने की इंद्रियां पूरे मनोयोग से इन पक्षियों की गतिविधियों में खो जाती हैं। इनकी अलग-अलग आवाजें और क्रियाकलाप मन को प्रफुल्लित और आकर्षित करते हैं। इस दौरान अलग-अलग प्रजाति के पक्षियों को सुनते और निहारते काफी सुकूनदायक समय बीतता है। 

मैं लगभग हर सप्ताहांत, किसी जंगल या पार्क में घूमने निकल जाता हूं। इस सैर पर मैं कभी अकेला होता हूं और कभी अन्य पक्षी-प्रेमी मित्रों के साथ होता हूं। पक्षियों को देखने के लिए अलग-अलग स्थानों पर घूमना मेरे लिए हमेशा एक रोमांचक और आनंददायी अनुभव रहा है।
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यह तो हुई घर से बाहर पक्षी निहारने और उससे मिलने वाले आनंद की बात, लेकिन यह तो एक ऐसा शौक है जिसका स्थान, समय और किसी के साथ होने से कोई संबंध नहीं है। इसके लिए किसी का साथ होना, किसी विशेष स्थान पर जाना और किसी विशेष समय पर जाना आवश्यक नहीं है।

आप अकेले, किसी भी स्थान और किसी भी समय इसका आनंद ले सकते हैं। अपने घर की बालकनी या छत पर बैठे हुए भी आप पक्षी निहार सकते हैं। मेरा इस संबंध में काफी अच्छा अनुभव रहा है। 

मैं बीस वर्ष से भी अधिक समय से दिल्ली की सरकारी कॉलोनी में रह रहा हूं। सरकारी कॉलोनी का एक सबसे बड़ा फायदा यह है कि यहां घरों के आसपास अत्यधिक पेड़-पौधे हैं और बीच-बीच में पार्कों के लिए भी स्थान है। इसकी वजह से यहां पक्षियों की काफी अधिकता है।

मेरे घर के आसपास दिखने वाले पक्षियों में प्रमुख हैं गौरैया, तोता, ओरिएंटल मैगपाई रॉबिन, भारतीय रॉबिन, दर्जिन, कौवा, चील, कबूतर, फाख्ता, हरियल, कोयल, ट्री-पाई, धनेश, छोटा बसंता, बड़ा बसंता, कठफोड़वा, टिटहरी, मैना, बुलबुल, सात-भाई, मुनिया, शकरखोरा, ओरिएंटल व्हाइट-आई, अबाबील आदि। 

सुबह मेरी नींद कई बार किसी पक्षी की आवाज से खुलती है, और वह पक्षी प्राय: ओरिएंटल मैगपाई रॉबिन होता है, इसके अलावा भारतीय रॉबिन, ओरिएंटल व्हाइट-आई और शकरखोरा भी सुबह की पहली किरण निकलने से पहले ही बोलना शुरू कर देते हैं।

इसके अलावा मैं अपनी छत के एक कोने में मिट्टी के बर्तन में पक्षियों के लिए पानी रखता हूं...

फूलों से रस लेता एक शकरखोरा। - फोटो : चंद्र भूषण मौर्य
उजाला होने के साथ-साथ इस समूह-गान में दूसरे पक्षी भी जुड़ने लगते हैं। प्रात:काल इन पक्षियों का कलरव आनंद-विभोर करने वाला होता है। धूप चढ़ने के साथ बड़ी संख्या में तोते आकाश में उड़ते हुए नजर आने लगते हैं, जो भोजन की तलाश में निकलते हैं। दिन चढ़ने के साथ अन्य पक्षी भी भोजन जुटाने में लग जाते हैं। 

प्राय: सभी लोग अपने घरों में थोड़ी-बहुत बागवानी करते हैं, हमने भी छत पर कुछ पौधे लगाए हैं। इससे कई प्रकार के पक्षी आकर्षित होते हैं। सात-भाई, ओरिएंटल मैगपाई रॉबिन व भारतीय रॉबिन को गमले की मिट्टी में कीड़े तलाश करते तथा दर्जिन व ओरिएंटल व्हाइट-आई को पौधों के पत्तों से कीड़े खाते देख सकते हैं।

इसके अलावा अगर पौधों में फूल लगे हैं तो फिर क्या कहने, शकरखोरा तो छत पर पूरे दिन डेरा जमाए रहेगा और फूलों से रस पीता रहेगा। यदि घर में कुछ खुला स्थान है तो वहां गौरैया, कबूतर, फाख्ता, मैना आदि को भी धमा-चौकड़ी करते देख सकते हैं। 

इसके अलावा मैं अपनी छत के एक कोने में मिट्टी के बर्तन में पक्षियों के लिए पानी रखता हूं। यह स्थान तो पक्षियों की सबसे अधिक गहमा-गहमी वाला स्थान है। वैसे तो पानी के पास पक्षियों का पूरे दिन आना-जाना लगा रहता है, लेकिन सुबह और शाम को तो उनका तांता ही लग जाता है।

इस दौरान उनकी गतिविधियों का दूर से मजा लेते रहिए। कई पक्षी वहां पानी पीने व नहाने आते हैं और वहां ज्यादा से ज्यादा वक्त बिताना चाहते हैं, इसके लिए कई बार उन्हें झगड़ते हुए भी देखा जा सकता है।

गौरैया, मुनिया या ओरिएंटल व्हाइट-आई जैसे छोटे पक्षियों को खदेड़ते हुए कभी उस स्थान पर बुलबुल डेरा जमा लेती है, तो कभी उन्हें खदेड़ने मैना आ जाती है और कौवा तो आकार में बड़ा होने के कारण सब पर भारी पड़ता है।

फाख्ता सबसे डरा-सहमा सबके जाने के बाद पानी पीने आता है। ओरिएंटल मैगपाई रॉबिन, मैना और बुलबुल काफी देर तक उस पानी के बर्तन में नहाते रहते हैं। कभी-कभी दोपहर को एकांत मिलने पर चील भी काफी समय तक पानी के पास बैठी रहती है।
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मैंने अपने घर से कुछ दुर्लभ पक्षियों को भी देखा है...

कुछ नहाने में व्यस्त और कुछ अपनी बारी का इंतजार करते हुए। - फोटो : चंद्र भूषण मौर्य
सरकारी कॉलोनी में घर के पास बरगद और पीपल के पेड़ भी काफी संख्या में हैं। ये पेड़ छोटा बसंता, बड़ा बसंता और हरियल की आरामगाह हैं और ये पेड़ उन्हें भोजन भी प्रदान करते हैं। वैसे इन पर लगने वाले छोटे-छोटे फल कई अन्य पक्षियों का भी भोजन है। इन पेड़ों के पत्तों में छिपे बैठे ये हरे रंग के पक्षी दिखाई भले न दें लेकिन आप इनकी मधुर आवाज स्पष्ट सुन सकते हैं। 

यदि आप पूरे साल घर की बालकनी या छत से इन पक्षियों को देखते रहें और उन्हें नोट करते रहें, तो आप 50 से 60 किस्म के पक्षी घर बैठे देख सकते हैं, मेरा तो यही अनुभव है। यदि आप निरंतर नजर रखें तो आपको घर के आस-पास या आकाश में उड़ते हुए कभी-कभार दुर्लभ पक्षियों के दर्शन भी हो सकते हैं।

मैंने अपने घर से कुछ दुर्लभ पक्षियों को भी देखा है। इस शौक को आप भी पाल सकते हैं, मुझे विश्वास है आपको भी आनंद आएगा। यह हमें प्रकृति से जोड़ता है तथा रोमांचित व प्रसन्नचित्त् भी रखता है। इसके साथ ही यह हमें प्राकृतिक विविधता का भी प्रत्यक्ष अहसास कराता है।

ये पक्षी उल्लास और उमंग के साथ कर्म के प्रति सजगता का सजीव उदाहरण हैं। हमारा कर्तव्य है कि हम इन्हें अनुकूल वातावरण प्रदान करने का भरसक प्रयास करें। 
 

लेखक चंद्र भूषण मौर्य, आर.के.पुरम, नई दिल्ली के निवासी हैं और पिछले लगभग 12 वर्षों से बर्ड वाचिंग कर रहे हैं। दिल्ली के विभिन्न क्षेत्रों, विशेष रूप से दक्षिणी दिल्ली के हरित क्षेत्रों और आर के पुरम स्थित अपने घर के आसपास के क्षेत्रों में दिखने वाले पक्षियों का नियमित रूप से अवलोकन करते हैं और उन्हें व्यवस्थित तरीके से दर्ज करने का प्रयास भी करते हैं। इसके अलावा पिछले कुछ वर्षों से इस क्षेत्र में दिखने वाली तितलियों के संबंध में भी जानकारी एकत्र कर रहे हैं।

पर्यावरण और प्रकृति संरक्षण की दिशा में ''प्रकृति संरक्षण फाउंडेशन'' की अहम भूमिका है। फाउंडेशन अपने ' प्रकृति संचार' कार्यक्रम के अंतर्गत  प्रकृति संरक्षण, संवर्द्धन और हमारे पारिस्थितिक तंत्र के प्रति संवेदनशील है। इस संदर्भ में फाउंडेशन का उद्देश्य प्रकृति संरक्षण से संबंधित लेख, सुलेख और अन्य सामग्री को सभी भारतीय भाषाओं में प्रोत्साहित करना है। यदि आप प्रकृति या पक्षियों के बारे में लिखना चाहते हैं तो फाउंडेशन से संपर्क कर सकते हैं।

यह श्रृंखला 'नेचर कन्ज़र्वेशन फाउंडेशन (NCF)' द्वारा चालित 'नेचर कम्युनिकेशन्स' कार्यक्रम की एक पहल है। इस का उद्देश्य भारतीय भाषाओं में प्रकृति से सम्बंधित लेखन को प्रोत्साहित करना है। यदि आप प्रकृति या पक्षियों के बारे में लिखने में रुचि रखते हैं तो ncf-india से संपर्क करें।


डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

 
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