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हवा, पानी, पैसे और पेट्रोल से भी अधिक आवश्यक हैं सपने

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मैं हमेशा एक बेहतर दुनिया के सपने देखता हूं! - फोटो : Social Media
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कुछ लोग यह मानते हैं कि मनुष्य हवा के बिना नहीं जी सकता तो कुछ लोग यह कहते हैं कि बिना पानी के नहीं जिया जा सकता, बिना भोजन के नहीं जिया जा सकता। ऐसे लोगों की भी कमी नहीं है जो यह मानते हैं कि पैसे और पेट्रोल भी उन्हीं चीजों में शामिल है जिनके बिना मनुष्य का जीना संभव नहीं है, कम से कम आज के दौर में। किंतु मैं यह मानता हूं कि इन सब के बराबर ही एक चीज और है और शायद इन सब से ज्यादा महत्वपूर्ण भी, और वह है- सपने। इंसान बिना सपनों के भी नहीं जी सकता और मैं हमेशा एक बेहतर दुनिया के सपने देखता हूं।

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एक ऐसी दुनिया जिसमें धर्म के नाम पर खून खराबा ना हो। साम्यवाद की तरह समानता का सिद्धांत तो हो किंतु उसके लिए संघर्ष ना हो। स्वतंत्रता तो हो किंतु उस स्वतंत्रता का इस्तेमाल दूसरे की स्वतंत्रता छीनने के लिए ना हो।

प्रेम हो तो निस्वार्थ हो, परिवार ऐसा हो जिसमें लेन-देन का हिसाब किताब ना हो। व्यवसाय हो परंतु उसमें बेईमानी ना हो। बड़प्पन हो, दौलत हो, ताक़त हो, किंतु उसका अहंकार ना हो। एक ऐसी दुनिया जिसमें अपने आप को दूसरे से बेहतर साबित करने की बजाय एक दूसरे की सहायता करने की होड़ लगी हो।
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एक ऐसा संसार जिसमें करुणा हो किंतु क्रूरता नहीं, जिसमें इंसान की काबिलियत उसके चमड़ी के रंग या जाति के आधार पर नहीं आंकी जाती हो।

और क्या लगता है ऐसा संसार बनाने में? त्याग, सेवा, करुणा, समर्पण, सहयोग, प्रेम और ऐसे ही कुछ और शब्द जो कि बचपन से हर स्कूल में, हर बच्चे को रट्टा मार मार कर पढ़ाए जाते हैं, किंतु वह सीख कुछ नहीं पाता। सीखता है तो ठीक इसका उल्टा।
 

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मनुष्य मनुष्य क्यों नहीं बन पाया?

आज सबसे अधिक जरूरत आध्यात्मिक जागरण की है - फोटो : सोशल मीडिया
जो चीजें सैद्धांतिक रूप से पढ़ाई जाती हैं या बताई जाती हैं, हम उन्हें व्यवहारिक रूप में नहीं ला पाते। जबकि हकीकत यह है कि इन रास्तों पर चलना ज्यादा आसान है ना कि इनके के विपरीत रास्तों पर। यकीन मानिए शैतान बनने से ज्यादा आसान है इंसान बनना, लेकिन समस्या यही है कि हमारे सामने ऐसे आदर्श नहीं हैं।

आज शैतान हमारे हीरो बने बैठे हैं। 'कन्वर्सेशन विथ गॉड' के प्रख्यात लेखक नोएला डोनाल्ड वॉल्स अपनी एक पुस्तक में लिखते हैं कि दुनिया की कोई भी समस्या आर्थिक, सामाजिक या राजनीतिक समस्या नहीं है।

हर समस्या केवल और केवल अध्यात्मिक समस्या है। हम जानते नहीं कि ईश्वर और हमारा क्या रिश्ता है, हम नहीं जानते कि प्रकृति से हमारा क्या रिश्ता है और हम यह तो बिल्कुल ही नहीं जानते कि दूसरे मनुष्यों से हमारा क्या रिश्ता है।

आज सबसे अधिक जरूरत आध्यात्मिक जागरण की और उसके माध्यम से मनुष्य को मनुष्यता सीखने की है। प्रसिद्ध लेखक अल्बेयर कामू ने लिखा था- 'यदि हमें मानव सभ्यता का इतिहास जानना है तो हमें इसकी असफलताओं को भी जानना होगा और हमारी सबसे बड़ी असफलता तो यह है कि हम मनुष्य नहीं हो सके।'

दुनिया के सारे धर्म- संप्रदाय, रीति-रिवाज, व्यवस्थाएं, पढ़ाई-लिखाई, सामाजिक व्यवस्थाएं सब मनुष्य को मनुष्य बनाने के लिए की गई किंतु आज भी मनुष्य मनुष्य नहीं बन पाया।

मनुष्य मनुष्य क्यों नहीं बन पाया और उसे सचमुच का इंसान बनने के लिए क्या करना चाहिए इसकी चर्चा हम अगले लेख में करेंगे। पर यदि आपने यह स्वीकार कर लिया है कि हम मनुष्य नहीं बन पाए तो यकीन मानिए यह आपके जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि है।
 
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क्या सचमुच ऐसी दुनिया होना असंभव है?

कल्पना कीजिए एक ऐसे समाज की जहां प्रेम, करुणा, ईमानदारी और परमार्थ हो! - फोटो : फाइल फोटो
अब जरा कल्पना कीजिए एक ऐसे मनुष्य की जो स्वार्थ, भ्रष्टाचार, ईर्ष्या और घृणा से ऊपर उठकर हर काम संसार मात्र के प्रति करुणा और परमार्थ के लिए करता है। कल्पना कीजिए एक ऐसे परिवार की जिसमें पति और पत्नी एक दूसरे के परिवार को नीचा दिखाने की बजाय अपना ही समझते हैं।

ऐसे भाइयों की जिनमें जीवन के अंत तक भी उतना ही स्नेह और समर्पण बना रहता है जितना बचपन में हुआ करता था। कल्पना कीजिए ऐसे संस्थानों की जिसमें बॉस अपने स्टाफ का शोषण नहीं करता और स्टाफ अपने मालिक के साथ बेईमानी नहीं करता।

कल्पना कीजिए एक ऐसे समाज की जहां कोई किसी को लूटता नहीं, कोई किसी के साथ बेईमानी नहीं करता, छल कपट नहीं करता। कोई किसी से सिर्फ इसलिए घृणा नहीं करता कि वह किसी और धर्म या जाति का है या किसी और रंग का है।

दुकानदार मिलावट नहीं करता, पुलिस भ्रष्टाचार नहीं करती, डॉक्टर मरीजों की गरीबी और अज्ञानता का गलत फायदा नहीं उठाता और वकील और न्यायालय का एक ही उद्देश्य है, आम जनता को सच्चा न्याय दिलवाना।

कल्पना कीजिए ऐसे राष्ट्रों की जो एक दूसरे के भूभाग और उसके संसाधनों पर कब्जा जमा लेने की बजाय एक दूसरे के यहां से गरीबी, अशिक्षा, कुपोषण जैसी मनुष्यता की दुश्मन स्थितियों से निपटने के लिए सहयोग करते हों।

जिनके बीच बड़े से बड़ा और खतरनाक से खतरनाक हथियार बनाकर एक दूसरे को परास्त करने की बजाय एक दूसरे का उत्थान करने की होड़ लगी हो। एक ऐसी दुनिया जहां मनुष्य प्रकृति के विनाश की कीमत पर अपना विकास नहीं करता हो।

एक ऐसा संसार जहां प्रेम हो, करुणा हो, ईमानदारी हो, परमार्थ हो और इनके विपरीत शब्दों का कोई नाम भी ना जानता हो, उनका कोई अर्थ ही ना हो।

क्या सचमुच ऐसी दुनिया होना असंभव है??? मैंने तो पहले ही कहा था कि मेरे लिए हवा, पानी, पैसे और पेट्रोल से भी अधिक आवश्यक  हैं.....सपने।
 

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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