हर साल बढ़ रहे हैं डेंगू-मलेरिया के केस
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एंटोमोलॉजी क्षेत्र को देना होगा बढ़ावा
मेडिकल एंटोमोलोलॉजिस्ट की भारी कमी का मतलब है कि रोग पैदा करने वाले कीटों की निगरानी और जांच तथा इसके परिणामस्वरूप होने वाले प्रभावों को नियंत्रित करने की रणनीतियों की अनदेखी, जो पिछले कुछ दशकों में की गई है। एंटोमोलोलॉजिस्ट क्षमता निर्माण में गड़बड़ियां होने का मतलब यह भी है कि जो लोग एंटोमोलोजिकल रिसर्च में रुचि रखते हैं, वे वेक्टर जनित बीमारी के खतरे से समाज को सुरक्षा दिलाने के लिए आवश्यक उपकरण और जानकारी से लैस नहीं हैं।
कीटों से फैलने वाली बीमारियों को नियंत्रित करने में खतरों का मुकाबला करने के लिए क्षमता में बढ़ोतरी करना जरूरी है। इसके अलावा यह भी महत्वपूर्ण है कि हम एंटोमोलॉजिकल क्षमता और विशेषज्ञता हासिल करने के लिए निवेश ज्यादा करें।
एंटोमोलॉजी में ज्यादा बायोलॉजिस्ट को ट्रेनिंग देकर, रिसर्च फंड को बढ़ाकर और डिजीज मॉनिटरिंग सिस्टम (रोग निगरानी प्रणाली) और कीटनाशक प्रतिरोध का एक नेटवर्क स्थापित करके हम भारत में राष्ट्रीय और उप-राष्ट्रीय स्तर पर ट्रेनिंग तथा रिसर्च के लिए अच्छी तरह से लैस इको सिस्टम तैयार कर सकते हैं।
2014 में वर्ल्ड हेल्थ आर्गेनाइजेशन ने उस साल विश्व स्वास्थ्य दिवस की थीम वेक्टर जनित बीमारियों पर रखी थी ताकि पूरी दुनिया का ध्यान इस मुद्दे पर आकर्षित किया जा सके। तब इन बीमारियों की रोकथाम और नियंत्रण के लिए कई देशों ने प्रतिबद्धता जताई, जिसका लाभ भी दिखा। हालांकि अभी भी इस दिशा में काम करना बाकी है। इन बीमारियों के पूर्ण उन्मूलन के लिए मेडिकल एंटोमोलोलॉजिस्ट की विशेषज्ञता की जरूरत है।
एंटोमोलोलॉजिस्ट वेक्टर जनित बीमारियों को नियंत्रित करने के लिए सबूत आधारित दृष्टिकोण का इस्तेमाल कर सकते हैं और यह सुनिश्चित कर सकते हैं कि हमारे पास जो भी संसाधन उपलब्ध हैं, उन्हीं के माध्यम से इन बीमारियों के समाधान में योगदान दिया जाए। इंटीग्रेटेड वेक्टर मैनेजमेंट एक समग्र दृष्टिकोण है जिसमें वेक्टर जनित बीमारियों को खत्म करने के लिए एक ऐसा विशेष माहौल तैयार करना होता है जिसमें रोकथाम से सम्बंधित कई हस्तक्षेप शामिल होते हों।
कीटों की आबादी रोकने के लिए प्रयास जरूरी
2030 तक उपेक्षित उष्णकटिबंधीय रोगों (NTDs) को खत्म करने के WHO के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए इन बीमारियों के फैलने की रफ्तार की समझ रखना महत्वपूर्ण है। इंटीग्रेटेड वेक्टर मैनेजमेंट जैसे उपाय वेक्टर आबादी को कम कर सकते हैं, जिससे मनुष्य इन कीटों के कम संपर्क में आएं और इस प्रकार से बीमारी को फैलने से रोका जा सकता है।
इसके अलावा कीटों की आबादी बढ़ने से रोकने का एक तरीका यह सुनिश्चित करना हो सकता है कि पानी कहीं रुकने न दिया जाए और अगर कहीं पानी रुका है उसमें कीटनाशक का छिड़काव किया जाए ताकि कीटों के पनपने का जरिया ही खत्म हो जाए।
गौरतलब है कि कोविड-19 महामारी की वजह से देश के सरकारी स्वास्थ्य ढांचे पर बहुत ज्यादा बोझ पड़ गया है। पिछले कुछ सालों में कीटों से होने वाली बीमारियों में इजाफा हुआ है। खोए हुए समय की भरपाई करने और देशभर की अधिकतम आबादी की सेहत को सुरक्षित करने के लिए हमें यह सुनिश्चित करने की जरूरत है कि भारत की एंटोमोलॉजिकल क्षमता के निर्माण में ज्यादा से ज्यादा निवेश किया जाए।
शिक्षा, रिसर्च और डेवलपमेंट को प्राथमिकता देकर और निवेश करके हम विशेष चुनौतियों का समाधान करने के लिए नए समाधानों को विकसित कर सकते हैं। इससे दक्षिण पूर्व एशिया में इन बीमारियों के प्रति रोकथाम की जा सकती है और भारत इस दिशा में वेक्टर उन्मूलन नवाचार में अग्रणी देश बन सकता है।
नई पीढ़ी के एंटोमोलोलॉजिस्ट को अत्याधुनिक तकनीक, उपकरणों और विशेषज्ञता से लैस करके हम भारत को कीट-जनित बीमारियों से छुटकारा दिलाने में मदद कर सकते हैं।
भारत में घातक कीट-जनित बीमारियों को समाप्त करने के लिए सभी स्टेकहोल्डर-सरकार, समुदायों, रिसर्चर और इंडस्ट्री से निरंतर और संगठित प्रयासों की आवश्यकता है। हम अपनी एंटोमोलॉजिकल क्षमता का निर्माण करके, रिसर्च और इनोवेशन में निवेश करके और साथ मिलकर काम करके, हम सभी के लिए एक स्वस्थ भविष्य का निर्माण कर सकते हैं।
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नोट- लेखक प्रो. (डॉ) आदित्य प्रसाद दाश, सीनियर बायोलॉजी और एशियन इंस्टीट्यूट ऑफ पब्लिक हेल्थ (एआईपीएच) के वाइस चांसलर हैं।
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