भ्रष्टाचार में सबके हाथ काले?
यह तो हुई निर्माण में ‘स्तरहीनता’ की बात। महाकाल लोक पर जो राजनीति हुई वह भी देव दुर्लभ है। पहले तो इसके निर्माण का श्रेय खुद लेने में भाजपा और कांग्रेस ने कोई कसर नहीं छोड़ी और इस हादसे के बाद वो एक दूसरे पर भ्रष्टाचार पर आरोप लगा रहे हैं।
मसलन जब अक्टूबर में महाकाल लोक का शुभारंभ हुआ तो कांग्रेस ने इसका श्रेय लेने का दावा यह कहकर किया कि उसके कार्यकाल में ही 300 करोड़ रु. के टेंडर जारी हुए थे। तब गृहमंत्री नरोत्तम मिश्रा ने कहा था कि कांग्रेस की कमलनाथ सरकार ने तो महाकाल लोक परियोजना को ठंडे बस्ते में डाल दिया था। हमने सत्ता में लौटकर इसे पूरा किया है।
लेकिन मूर्ति हादसे के बाद नगरीय प्रशासन मंत्री भूपेन्द्रसिंह ने आंकड़ों के हवाले से खुलासा किया कि महाकाल लोक का वर्क ऑर्डर तो कमलनाथ सरकार के कार्यकाल में जारी हुआ। फिर उन्होंने कहा कि महाकाल लोक निर्माण के 60 फीसदी ठेके कांग्रेस के और बाकी 40 फीसदी ठेके भाजपा के शासन काल में जारी हुए।
यानी एक तो कांग्रेस कार्यकाल में यह परियोजना ठंडे बस्ते में नहीं डाली गई थी। दूसरा, यह कि अगर इसमें भ्रष्टाचार हुआ है तो दोनों के कार्यकाल में हुआ है। विवाद उसके अनुपात को लेकर है। लड़ाई अब निर्माण का श्रेय लेने के बजाय यह साबित करने की है कि किसके कार्यकाल में महाकाल लोक में ज्यादा भ्रष्टाचार हुआ।
हालांकि मंत्री भूपेन्द्र सिंह ने कांग्रेस को यह कहकर चुनौती दी कि अगर उसके पास भ्रष्टाचार के कोई ठोस सबूत हैं तो दें, हम जांच करा लेंगे। लेकिन उन्होंने पूर्व में लोकायुक्त में हुई शिकायत और उसकी जांच रुकने का कोई जिक्र नहीं किया।
हादसा या भ्रष्टाचार का प्रमाण
दिलचस्प बात यह है कि सरकार इस समूचे प्रकरण को महज ‘हादसा’ मान कर चल रही है। मूर्ति निर्माता कंपनी ने भरोसा दिया है कि टूटी मूर्तियां फिर बिठा दी जाएंगी। जबकि विपक्षी कांग्रेस का कहना है कि समूची परियोजना में ही गड़बड़ी हुई हैं।
रही बात भ्रष्टाचार की तो सब को पता है कि ‘भ्रष्टाचार’ एक ऐसा असुर है, जो कभी नहीं मरता। पुरानी संस्कृत में असुर शब्द का एक अर्थ ‘शक्तिशाली’ और ‘अमर’ होना भी है। और भगवान शिव तो भोले भंडारी हैं। असुरों को भी वरदान देने में कोताही नहीं करते। वो सृष्टि के सर्जक भी हैं और संहारक भी।
भगवतकृपा रही कि आंधी 30 किमी प्रति घंटे की रफ्तार से ही चली। अगर वो 60 किमी प्रति घंटे की गति से होती तो शायद पूरा लोक ही परलोक में तब्दील हो जाता। महाकाल लोक जीवन की नश्वरता और ‘नित्य नूतनता’ का संदेश देता है। गिरी हुई मूर्तियां तीन दिन में फिर लग जाएंगी। फिर गिरी तो फिर लग जाएंगी।
अगर कोई इसमें कोई भ्रष्टाचार देखना चाहता है तो देखे। भ्रष्टाचार से ही नवनिर्माण और नवनिर्माण से ही भ्रष्टाचार की राह खुलती है। आचार का क्या है, भावना पवित्र होनी चाहिए। भ्रष्टाचार भी तभी है, जब उसे ‘भ्रष्टाचार’ माना जाए।
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