बिहार की स्थिति को देखकर मुज़फ़्फ़र रज़्मी का एक प्रसिद्ध शेर कौंध जाता है -
'ये जब्र भी देखा है तारीख़ की नज़रों ने/लम्हों ने ख़ता की थी सदियों ने सज़ा पाई।'
रज्मी साहब उसी यूपी के थे जिस यूपी के लोगों को आज डीएमके के सांसद और पूर्व केंद्रीय मंत्री अपमानित कर रहे हैं। बिहार के लोग अगर मजदूरी करने के लिए भी बाहर जाने को विवश हैं तो इसके लिए बिहार के अदूरदर्शी और सत्ता सुख भोगने की लालसा रखने वाले राजनेता जिम्मेवार हैं।
जरा नजर घुमा कर देखिये -बिहार के प्रथम मुख्यमंत्री श्रीकृष्ण सिंह के बाद बिहार में कितने बड़े उद्योग लगे? निराशा हाथ लगेगी। हमारी सरकारों ने, हमारे मुख्यमंत्रियों ने बिहार को रोजगार युक्त प्रदेश बनाने के लिए क्या किया? इस स्थिति के लिए हम बिहारी भी कम जिम्मेदार नहीं है। हमने वैसे ही नेताओं को अपना रहनुमा चुना। तो भुगतेगा कौन?
अच्छी पढ़ाई के लिए बिहार से बाहर जाओ
अच्छी नौकरी के लिए बाहर जाओ
अच्छे इलाज के लिए बाहर जाओ
अब मजदूरी के लिए भी बाहर जाओ।
यही है हमारा बिहार। यह गंभीर चिंतन का समय है। नहीं सुधरे तो आनेवाली पीढ़िया भी गाली सुनती रहेंगी और पिटती रहेंगी।
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