एक स्वस्थ और सजग लोकतंत्र के लिए सबसे जरूरी है देश के निर्वाचन आयोग की निष्पक्षता, विश्वसनीयता और सर्वग्राह्यता। आयोग राजनीतिक दलों की तरह एक पक्ष नहीं, बल्कि सभी पक्षों से ऊपर होता है। लेकिन राहुल गांधी के वोट चोरी के आरोपों के बाद ऐसा माहौल बन गया है कि इस विवाद में दो पक्ष बन गए हैं, जिनमें एक पक्ष निर्वाचन आयोग और सत्ताधारी प्रतिष्ठान तो दूसरा पक्ष समूचा विपक्ष नजर आ रहा है।
हालांकि, आयोग की निष्पक्षता पर सवाल पहले भी उठते रहे हैं और आयोग के फैसलों को अदालत में चुनौतियां दी जाती रही हैं, लेकिन दो संघर्षरत पक्षों में एक जगह निर्वाचन आयोग भी नजर आ रहा है। इतिहास में अब तक ऐसी दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति पहले कभी नहीं आई। भारतीय लोकतंत्र की नींव में चुनाव आयोग (ईसीआई) एक महत्वपूर्ण स्तंभ है, जो अनुच्छेद 324 के तहत संवैधानिक रूप से स्वतंत्र संस्था के रूप में स्थापित है।
इसका प्रमुख दायित्व निष्पक्ष, स्वतंत्र और पारदर्शी चुनाव सुनिश्चित करना है, जो विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र की वैधता को बनाए रखता है। हाल के वर्षों में, विशेष रूप से 2024 लोकसभा चुनावों के बाद, ईसीआई की निष्पक्षता और विश्वसनीयता पर गंभीर सवाल उठे हैं।
विपक्षी नेताओं, खासकर राहुल गांधी, के आरोपों जिनमें मतदाता सूचियों में हेरफेर और सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के साथ मिलीभगत शामिल है ने ईसीआई की छवि को धूमिल किया है। यह लेख इन तथ्यों के आलोक में ईसीआई की स्थिति का निष्पक्ष विश्लेषण प्रस्तुत करता है, जहां एक ओर आरोपों की गंभीरता है, वहीं ईसीआई की प्रतिक्रिया और संस्थागत मजबूती भी।
साथ ही, हम यह भी जांचेंगे कि क्या विश्वास का यह संकट लोकतंत्र के लिए खतरा है और चुनाव सुधारों की आवश्यकता ईसीआई की स्वतंत्रता से कैसे जुड़ी है।
ईसीआई की भूमिका और ऐतिहासिक छवि
निर्वाचन आयोग की स्थापना 25 जनवरी, 1950 को हुई थी, और यह भारत में राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, लोकसभा, राज्यसभा, विधानसभा और स्थानीय निकायों के चुनावों का संचालन करता है। संवैधानिक रूप से यह एक स्वायत्त निकाय है, जिसमें मुख्य चुनाव आयुक्त (सीईसी) और दो अन्य चुनाव आयुक्त शामिल हैं।
इनकी नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा की जाती है, लेकिन हाल ही में लागू चीफ इलेक्शन कमिश्नर एंड अदर इलेक्शन कमिश्नर्स एक्ट, 2023 के तहत एक चयन समिति—जिसमें प्रधानमंत्री, लोकसभा में विपक्ष के नेता और एक केंद्रीय मंत्री शामिल हैं—इसकी सिफारिश करती है।
ऐतिहासिक रूप से,निर्वाचन आयोग की छवि लगभग मजबूत और निष्पक्ष रही है। अस्सी के दशक में बहुचर्चित गढ़वाल चुनाव में तत्कालीन निर्वाचन आयुक्त एस एल सकधर ने एक सहसाहसिक निर्णय लेते हुए इंदिरा गांधी सरकार की परवाह न करते हुए हेमवती नंदन बहुगुणा की शिकायत पर चुनाव रद्द कर दिया था।
1990 के दशक में टी.एन. शेषन जैसे मुख्य चुनाव आयुक्तों ने आयोग को सशक्त और स्वतंत्र बनाया। शेषन ने मॉडल कोड ऑफ कंडक्ट को कड़ाई से लागू किया, राजनीतिक दलों पर अंकुश लगाया और मतदाता सूची की शुद्धता के लिए कदम उठाए।
हालांकि, हाल के दशकों में ईसीआई की निष्पक्षता पर सवाल बढ़े हैं। खासकर, 2019 और 2024 के लोकसभा चुनावों में विपक्ष ने आयोग पर पक्षपात और सरकारी दबाव में काम करने के आरोप लगाए। आलोचकों का कहना है कि नियुक्ति प्रक्रिया का सरकार-प्रधान होना और पारदर्शिता की कमी ईसीआई की स्वतंत्रता को कमजोर करती है। फिर भी, ईसीआई ने बार-बार दावा किया है कि वह किसी भी राजनीतिक प्रभाव से मुक्त है और केवल संवैधानिक दायित्वों का पालन करती है।
हालिया विवाद और विश्वास का संकट
2024 के लोकसभा चुनावों के बाद, राहुल गांधी ने "वोट चोरी" के आरोपों के साथ एक अभियान शुरू किया, जिसमें उन्होंने महाराष्ट्र, हरियाणा और अन्य राज्यों में मतदाता सूचियों में कथित तौर पर करोड़ों फर्जी मतदाताओं के होने का दावा किया। गांधी ने ईसीआई को "भाजपा का सहयोगी" करार दिया और कहा कि 2024 के चुनावों में मतदाता सूचियों में बड़े पैमाने पर हेरफेर हुआ।
उनके द्वारा जारी एक वीडियो में डेटा एनालिटिक्स के आधार पर दावा किया गया कि लाखों मतदाता या तो सूचियों से हटाए गए या अनधिकृत रूप से जोड़े गए। इन आरोपों ने जनता और राजनीतिक हलकों में तीखी प्रतिक्रिया उत्पन्न की।
आयोग ने इन आरोपों को "बकवास" और "अबसर्ड एनालिसिस" कहकर खारिज किया। आयोग ने गांधी से या तो सबूत पेश करने या माफी मांगने की मांग की। साथ ही, आयोग ने मतदाता सूचियों की शुद्धता के लिए अपनी प्रक्रियाओं का हवाला दिया, जिसमें मतदाता सूची संशोधन और ऑनलाइन सत्यापन शामिल हैं। द हिंदू और इंडियन एक्सप्रेस जैसे समाचार पत्रों ने इस विवाद को "विश्वास का संकट" करार दिया, जिसमें कहा गया कि भले ही ईसीआई की तकनीकी प्रक्रियाएं मजबूत हों, जनता का भरोसा डगमगा रहा है।
यह संकट इसलिए गंभीर है, क्योंकि लोकतंत्र में चुनावी संस्था की विश्वसनीयता ही उसकी वैधता का आधार है। अगर जनता चुनावों को निष्पक्ष नहीं मानती, तो मतदान दर में कमी, राजनीतिक अस्थिरता और सामाजिक असंतोष बढ़ सकता है। भाजपा ने इन आरोपों को "विपक्ष का हताशा भरा कदम" करार दिया और कहा कि बिना ठोस सबूतों के ये दावे केवल राजनीतिक नौटंकी हैं।
दूसरी ओर, विपक्ष ने एकजुट होकर ईसीआई से स्वतंत्र जांच की मांग की है। निष्पक्ष दृष्टिकोण से देखें, तो मतदाता सूचियों में त्रुटियां संभव हैं—जैसे डुप्लिकेट नाम या पुरानी प्रविष्टियां—लेकिन इरादतन हेरफेर का कोई ठोस सबूत अभी तक सामने नहीं आया है। फिर भी, बार-बार के आरोप और जनता की बढ़ती शंकाएं ईसीआई की छवि को धूमिल कर रही हैं, जो लोकतंत्र के लिए चिंताजनक है।
ईसीआई की स्वतंत्रता: मिथक या वास्तविकता?
यह दावा कि निर्वाचन आयोग "सरकार का विभाग" है, पूरी तरह सही नहीं है। संवैधानिक रूप से, यह कार्यकारी से स्वतंत्र है, और आयुक्तों का कार्यकाल सुरक्षित है (6 वर्ष या 65 वर्ष की आयु तक)। उन्हें केवल संसद द्वारा महाभियोग के जरिए हटाया जा सकता है, जो एक मजबूत सुरक्षा है। हालांकि, नियुक्ति प्रक्रिया पर सवाल वैध हैं।
2023 के नए कानून ने चयन समिति को सरकार-प्रधान बनाए रखा, जिसे विपक्ष और नागरिक समाज ने पक्षपात का आधार माना। सुप्रीम कोर्ट ने 2023 में सुझाव दिया था कि चयन समिति में मुख्य न्यायाधीश शामिल हों, ताकि निष्पक्षता बढ़े, लेकिन सरकार ने इसे खारिज कर दिया। इससे यह धारणा बनी कि नियुक्तियां "सरकारी वफादारों" को लाभ पहुंचा सकती हैं।
दूसरी ओर, आयोग ने कई बार अपनी स्वतंत्रता साबित भी की है। उदाहरण के लिए, मॉडल कोड ऑफ कंडक्ट के उल्लंघन पर सत्ताधारी और विपक्षी नेताओं दोनों को नोटिस जारी किए गए हैं। 2019 में, आयोग ने तत्कालीन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अन्य नेताओं के भाषणों पर कार्रवाई की थी, हालांकि आलोचकों ने इसे अपर्याप्त बताया।
फिर भी, जब तक नियुक्ति प्रक्रिया पूरी तरह पारदर्शी नहीं होती—जैसे संसदीय समिति या न्यायिक भागीदारी के जरिए—निष्पक्षता पर सवाल बने रहेंगे। यह सरकार से पूर्ण स्वतंत्रता की मांग को मजबूत करता है, लेकिन वर्तमान ढांचा इसे पूरी तरह "नाममात्र" नहीं बनाता; यह एक जटिल संतुलन है।
चुनाव सुधार पर विभिन्न समितियों
भारत में चुनाव सुधारों को लागू करने के लिए समय-समय पर विभिन्न समितियों और आयोगों का गठन किया गया है। स्वतंत्रता के बाद, चुनावी प्रक्रिया को पारदर्शी और निष्पक्ष बनाने के लिए कई महत्वपूर्ण कदम उठाए गए। 1960 में गठित दिनेश गोस्वामी समिति ने राजनीतिक दलों के वित्तपोषण और चुनावी प्रचार में सुधार के लिए सुझाव दिए।
1993 में वोहरा समिति ने आपराधिक तत्वों के राजनीति में प्रवेश को रोकने के उपाय सुझाए। इंद्रजीत गुप्ता समिति (1998) ने राजनीतिक दलों के लिए सार्वजनिक वित्तपोषण की वकालत की।
इसके अलावा, लॉ कमीशन ऑफ इंडिया की 170वीं और 255वीं रिपोर्ट में मतदाता पंजीकरण, मतदान प्रक्रिया और आपराधिक उम्मीदवारों पर अंकुश लगाने के लिए महत्वपूर्ण सिफारिशें की गईं। चुनाव आयोग ने भी इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (ईवीएम) और वोटर वेरिफाइड पेपर ऑडिट ट्रेल (वीवीपैट) जैसी तकनीकों को लागू कर विश्वसनीयता बढ़ाई।
हाल ही में, रमेश्वर उरांव समिति ने एक देश, एक वोट की संभावनाओं पर विचार किया। इन प्रयासों से चुनाव प्रणाली में काफी अंतर जरूर आया लेकिन अभीष्ट की प्राप्ति तभी संभव होगी जब फुरवाचन आयोग की विश्वसनीयता, निष्पक्षता और गरिमा बानी रहेगी इसके लियस निर्वाचन आयोग में सुधर की आवश्यकता है.
निर्वाचन आयोग की विश्वसनीयता के लिए
चुनाव सुधारों के साथ ही निर्वाचन आयोग में सुधारों की महती आवश्यकता है। इसके लिए जरुरी है कि सुप्रीम कोर्ट की सिफारिश के अनुरूप, मुख्य निर्वाचन आयुक्त और आयुक्तों की चयन समिति में मुख्य न्यायाधीश या संसदीय समिति को शामिल किया जाए।
मतदाता सूचियों की डिजिटल ऑडिट, इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों (ईवीएम) की स्वतंत्र जांच और सूचना का अधिकार (आरटीआई) के तहत अधिक खुलापन भी जरुरी है । ब्लॉकचेन जैसी तकनीकों का उपयोग मतदाता डेटा की सुरक्षा और हेरफेर रोकने के लिए, लेकिन प्राइवेसी का ध्यान रखते हुए किया जाना भी अभीष्ट होगा।
आयोग के बजट और स्टाफिंग को सरकार से पूरी तरह अलग रखा जाय ताकि प्रशासनिक स्वतंत्रता सुनिश्चित हो। ये सुधार न केवल आयोग की विश्वसनीयता को बहाल करेंगे, बल्कि जनता का भरोसा भी बढ़ाएंगे। हालांकि, इनके लिए राजनीतिक इच्छाशक्ति की जरूरत है। बिना सुधारों के, विश्वास का संकट गहरा सकता है, जो लोकतंत्र की नींव को कमजोर करेगा।
लोकतंत्र की रक्षा के लिए जरूरी कदम
निर्वाचन आयोग पर विश्वास का संकट निश्चित रूप से लोकतंत्र का संकट है, क्योंकि बिना निष्पक्ष और पारदर्शी चुनावों के जनादेश की वैधता संदिग्ध हो जाती है। आयोग को "केवल नाममात्र का स्वतंत्र" कहना अतिशयोक्ति हो सकता है, क्योंकि इसकी संवैधानिक और कानूनी मजबूती निर्विवाद है। फिर भी, व्यावहारिक चुनौतियां, विशेष रूप से नियुक्ति प्रक्रिया और पारदर्शिता की कमी वास्तविक हैं।
आवश्यक है कि आयोग सक्रिय कदम उठाए, जैसे आरोपों की स्वतंत्र जांच, तकनीकी प्रक्रियाओं में सुधार और जनता के साथ संवाद बढ़ाना। नियुक्ति प्रक्रिया में सुधार और पारदर्शिता बढ़ाने से न केवल आयोग की विश्वसनीयता बहाल होगी, बल्कि सभी राजनीतिक दलों के साथ समान व्यवहार सुनिश्चित होगा।
यह न केवल ईसीआई की छवि, बल्कि भारतीय लोकतंत्र की मजबूती के लिए अनिवार्य है। जनता का भरोसा लोकतंत्र का प्राण है, और इसे बनाए रखने के लिए निर्वाचन आयोग को अपनी जिम्मेदारी निभानी होगी।
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