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विश्व साहित्य का आकाश: होसे सारामागो एवं ब्लाइंडनेस

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साहित्य की दुनिया - फोटो : Freepik.com
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नोबेल पुरस्कृत साहित्यकारों के विषय में पढ़ते हुए एक बात पर ध्यान गया। अधिकांश ने अपने बचपन में अपने परिवार के किसी-न-किसी सदस्य से कहानियां सुनी थीं। आगे चल कर ये कहानियां उनके लेखन का खाद-पानी बनीं। इससे कहानियों के महत्व का भान होता है। ये कहानियां अक्सर वाचिक परम्परा का अंग होती थीं। अधिकतर बच्चों को उनकी नानी या दादी कहानियां सुनाती हैं। मैंने बचपन में अपनी एक बुआ और अपनी माताजी से कहानियां सुनी थीं। 

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मैथिलीशरण गुप्त की एक कविता है, ‘मां कह एक कहानी’। यहां भी बालक को मां कहानी सुना रही है। 1982 के नोबेल पुरस्कृत साहित्यकार गैब्रियल गार्षा मार्केस ने अपने नाना-नानी से सुनी हुई कहानियों से अपना साहित्य रचा है। इसी तरह 1998 के साहित्य के नोबेल विजेता होसे सारामागो ने भी बचपन में अपने नाना से कहानियां सुनी थीं। आगे चल कर नाना की कहानियां, नाना का जीवन, नाना के आसपास का परिवेश उनके लेखन में खूब फला-फूला। उनके अनुसार उन्होंने अपने जीवन में जिस सबसे ज्यादा बुद्धिमान आदमी को जाना-समझा वह पढ़ा-लिखा नहीं था।

स्वयं को शागिर्द कहने वाले होसे सारामागो का जन्म एक भूमिहीन परिवार में पुर्तगाल के एल्मोंडा नदी से करीब सौ किलोमीटर दूर रिबाटेजो नामक क्षेत्र के अजिन्हागा नामक गांव में 1922 को हुआ। उनके पिता का नाम होसे डि सूजा तथा मां का नाम मारिया ड पिएडाडे था। इस तरह उनका नाम होसे डि सूजा होना चाहिए था। मगर रजिस्टार ने अपनी मर्जी से उनके नाम में सारामागो शब्द जोड़ दिया और अंतत: वे होसे सारामागो ही कहलाए।
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असल में गरीबों के साथ ऐसे किस्से जुड़ जाते हैं। सारामागो उनके पिता के इलाके में पाया जाने वाला एक जंगली पौधा है, जिसे गरीब पेट भरने केलिए प्रयोग करते हैं। ये लोग गरीब थे तो इनके पिता के परिवार को सारामागो नाम से ही जाना जाता था और जब बच्चे के नाम लिखने का अवसर आया तो रजिस्टार ने उनके नाम के सामने होसे डि सूजा के साथ खुद ही सारामागो जोड़ दिया।

सात साल की उम्र में जब पहली बार स्कूल जाने के सिलसिले में उनके दस्तावेज स्कूल में दिए गए तब होसे को पता चला कि उनका पूरा नाम होसे डि सूजा सारामागो है। ऐसे ही उनकी जन्मतिथि को लेकर भी गड़बड़ है। उनका जन्म 16 नवम्बर को हुआ था मगर रिकॉर्ड में यह दो दिन बाद यानि 18 नवम्बर लिखा है। बच्चा होसे पढ़ने में बहुत तेज था, वर्तनी उसकी खूब पक्की थी, वर्तनी की भूल कभी नहीं करता था। इसी कारण कक्षा तीन में बालक को डबल प्रमोशन मिला। उसने क्लास तीन एवं चार की पढ़ाई एक साल में पूरी की। 

आज किसी बच्चे को यह सुविधा और विशिष्टता प्राप्त करने की हम सोच भी नहीं सकते हैं। पर हाय रे गरीबी! गरीबी के कारण बालक की शिक्षा बाधित हुई, वह इसके आगे न पढ़ पाया। उनके पिता भी अधिक पढ़े-लिखे न थे। मात्र लिखना-पढ़ना और थोड़ा-सा गणित भर जानते थे। मगर स्वाध्याय से इस बालक ने खूब उन्नति की, जम कर लिखा और नोबेल के मंच पर खड़ा हुआ। विश्व साहित्य जगत को इस रचनाकार ने अनमोल कृतियां दीं।

‘द लैंड ऑफ सिन’

उनकी पहली किताब ‘द विडो’ बाद में ‘द लैंड ऑफ सिन’ नाम से प्रकाशित हुई। राजनैतिक कारणों से उन्हें 1975 में सहायक संपादक का काम छोड़ना पड़ा। फिर उन्होंने एकाध काम प्रारंभ किए मगर बीच में ही छोड़ दिए। 1966 में ‘पोसिबल पोयम्स’ के साथ साहित्य जगत में उनकी वापसी हुई। उन्होंने एक बार फिर से लिखना प्रारंभ किया तो लिखते चले गए, एक-के-बाद-एक काम आते चले गए।

‘प्रोबबली जॉय’, ‘फ्रॉम दिस वर्ल्ड एंड दि अदर’, ‘द ट्रेवल्स बैगेज’ के साथ अखबारों केलिए लेखों के दो संग्रह ‘मैनुअल ऑफ पेंटिंग एंड कैलिग्राफी’ नाम से आए। ‘रीजन फॉर्म द ग्राउंड’, ‘बाल्टाजार एंड बिलामुंडा’, ‘इयर ऑफ द डेथ ऑफ रिकार्डो राइस’ ने उन्हें विश्वख्याति दी। ‘हिस्ट्री ऑफ द सीज ऑफ लिस्बन’, ‘द स्टोन राफ्ट’ का खूब स्वागत हुआ।

मगर ‘द गॉस्पल अकॉर्डिंग टू जीसेस क्राइस्ट’ आते ही साहित्य एवं धार्मिक जगत में तूफान आ गया। इसी कारण उन्हें पुरस्कार मिलने पर भी धर्म के ठेकेदारों को सर्वाधिक परेशान हुई।


होसे सारामागो की ‘ब्लाइंडनेस’

‘इन नोमिने डेई’ लिखते हुए उन्हें ध्यान आया हम अंधे हैं। वे तत्काल ‘ब्लाइंडनेस’ लिखने बैठ गए। इसमें होसे सारामागो अंधत्व की मात्र शारीरिक परेशानियों को ही नहीं उठाते हैं बल्कि मनोवैज्ञानिक समस्याओं को भी बड़ी गहनता, शिद्दत एवं खूबसूरती के साथ प्रस्तुत करते हैं। यहां एक अनजान शहर में सारे व्यक्ति एक-एक कर अंधेपन का शिकार हो जाते हैं, केवल एक पात्र को छोड़ कर। यही पात्र उन सबके संरक्षक, अगुआई एवं कथावाचक का काम करता है।

अंधत्व के कारण समस्त कार्यव्यापार, पूरा सिस्टम ठप्प पड़ जाता है। पूरी व्यवस्था भंग हो जाती है। सबको खाने के लाले पड़ जाते हैं। खूब अराजकता फैल गई। उन्होंने यह लिखा ताकि पढ़ने वाले यह याद कर सकें कि हम जिंदगी का अपमान करते हैं। इसे विकृत करते हैं और इसका परिणाम भी भुगतना पड़ता है। दुनिया के बलशाली लोग प्रतिदिन मनुष्य-जीवन का अपमान करते हैं, फल सबको भोगना पड़ता है।

होसे सारामागो के ‘रेज़्ड फ्रॉम द ग्राउंड’, ‘कैन’, ‘द स्टोन राफ्ट’, ‘सीइंग’, ‘डैथ ऐट इंटरवल्ज़’, ‘हिस्ट्री ऑफ द सीज़ ऑफ लिस्बन’, ‘ब्लाइंडनेस’ इत्यादि विश्व क्लासिक उपन्यास की श्रेणी में आते हैं। बेचैन करने वाली कृति ‘ब्लाइंडनेस’ जैसा कोई उपन्यास समस्त विश्व साहित्य में विरले मिलेगा। अंधत्व लोगों को सीमित करता है। होसे देखने एवं अवलोकन और निरीक्षण के अंतर की ओर हमारा ध्यानाकर्षण करते हैं।

यह एक एलिगरी है, जो सामाजिक एवं राजनैतिक संकट की ओर इंगित करती है। मान लीजिए कभी भविष्य में किसी कारण से हमारी सारी बुनियादी प्रणाली ठप्प हो जाए, तो आज की सुविधाभोगी आबादी कैसे जी सकेगी? तब शायद हमें प्रकृति का महत्व ज्ञात होगा। वैसे शक नहीं, हम इस दिशा में आगे बढ़ रहे हैं। हम सब सच में अंधे हैं।



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डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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