सदियों की हवाओं ने उड़ते-उड़ते इस प्राचीन नगर के ऊपर से रेत की चादर जरा सी सरका दी थी। गांव वाले बरसों से एक कच्ची पक्की ईंटों के खंडहर के नजदीक रह रहे थे।
- फोटो : दयाशंकर शुक्ल सागर
किताबों से झांकता इतिहास और धोलावीरा
राबर्ट सिवराइट, रशब्रुक और मिसेज पोस्टन तक ने कच्छ के रण पर बेहतरीन किताबें लिखीं। सब ने ये बात लिखी। जहांगीर ने तो कच्छ के लोगों का लगान इस शर्त पर माफ कर दिया था कि वे गरीब लोगों को पानी के जहाज से मुफ्त में मक्का और मदीना की यात्रा कराएंगे। 1838 में पोस्टन ने कुछ पुराने कच्छ नाविकों से बातचीत में निकाला कि वे अपने जहाज खुद बनाते थे और अपने बनाए समुद्री नक्शों पर ही यात्रियों को जहाज से इंग्लैंड, पोलैंड से लेकर अफ्रीका तक की यात्राएं कराते थे।
कच्छ के कई कुख्यात समुन्द्री डाकू भी हुए। ये कंपनी के जहाज लूट लेते। इन्होंने समुन्द्र के रास्ते से आने वाले फिरंगियों को पानी पिला दिया था। इन्हें स्थानीय राव राजाओं का संरक्षण था। इन्हीं के दम पर राव ने 1818 में कंपनी से समझौता किया कि वे इन दस्युओं से कंपनी को बचाएंगे बदले में कंपनी उनके स्वशासन में कोई हस्तक्षेप नहीं करेगी।
खैर, ये तो है इस इलाके की ऐतिहासिकता। इसी इलाके की 20वीं सदी की कहानी सुनिए। कच्छ में एक पिछड़ा उजाड़ गांव है धोलावीरा। मजे की बात ये है कि इस शहर की खोज से पहले कच्छ के लोगों ने गुजरात को भी अपना नहीं माना था। आजादी के दस साल बाद तक कच्छ गुजरात का हिस्सा न होकर एक केन्द्र शासित राज्य था।
यहां के स्थानीय लोगों की अपनी संस्कृति और अपनी सभ्यता है। ये लोग आदिम टोटम नाग, राक्षस, यदु, सिन्धी से लेकर ग्रीक देवताओं को अपना मानते रहे हैं। वे आज भी भारत को तो अपना मानते हैं लेकिन गुजरातियों को अपना नहीं समझते।
सदियों की हवाओं ने उड़ते-उड़ते इस प्राचीन नगर के ऊपर से रेत की चादर जरा सी सरका दी थी। गांव वाले बरसों से एक कच्ची पक्की ईंटों के खंडहर के नजदीक रह रहे थे। वे नहीं जानते थे कि ये खंडहर कितने पुराने हैं। उन्हें दूर दूर तक इस बात का अंदाजा नहीं था कि जहां वे रहते हैं कभी 5000 साल पहले वो मुम्बई जैसा कोई शहर रहा होगा। उनके खुद के घर, मिट्टी और रेत के थे, इसलिए उन्हें ये पक्की ईंटें देखकर हैरत होती। इसे वो स्थानीय भाषा में कोटड़ा कहते जिसका मतलब था गढ़। इन खंडहरों के पत्थर से गांव वाले अपने नए घर बना सकते थे लेकिन नहीं।
गांव के बुजुर्गों की सख्त हिदायत थी कि वे इन ईंटों को गांव में न लाएं क्योंकि इनमें दुष्ट आत्माओं का वास है। इसे वे मरे हुए लोगों का घर कहते थे जिनका सामान चुराना अशुभ है। याद करें इसी सभ्यता से जुड़े मोहनजोदाडो का स्थानीय भाषा में मतलब था- मुर्दो का टीला। वहां का सामान भी वहां के स्थानीय लोग घर नहीं लाते थे। इस खंडहर के बगल में एक बडा मैदानी इलाका था जहां खेती होती थी। ये इलाका सरकारी कागजों में भी 'बाजार' के नाम से मशहूर था। जबकि यहां कोई बाजार दूर दूर तक नहीं था। सिर्फ खेत थे लेकिन जगह का नाम बाजार था। फिर साठ के दशक में धोलावारा के पोस्टमास्टर को कोई अजीब सी चीज मिली। उन्हें लगा ये कोई प्राचीन चीज है।
उन्होंने गुजरात के पुरातत्व विभाग को खत पोस्ट कर दिया। वो नेहरू जी का जमाना था। न केवल जवाब आया बल्कि कुछ ही महीनों में पुरातत्व विभाग की एक छोटी सी टीम वहां पहुंच गई। और कुछ ही सालों में पुराविद आरएस बिष्ट के नेतृत्व में वहां खुदाई शुरू हो गई। तब वहां से निकला देश का एक प्राचीनतम शहर। अब तक हुई खोजों में पता चला है कि ये शहर उस जमाने की सिंधु सभ्यता के अन्य शहरों की तरह कच्ची पक्की ईंटों से बना था। ये ईंटे आज की ईटों की तरह चकोर होती थीं।
समन्दर के किनारे होने के कारण जल मार्ग से दूसरे देशों से कारोबार होता था, तब शहर की आबादी कोई साठ सत्तर हजार रही होगी। शहर में ज्यादातर लोग व्यापारी थे और यह महानगर व्यापार का मुख्य केन्द्र था। शहर की बसावट किसी शानदार कॉलोनी जैसी थी। ये महानगर किसी चौकोर दीवारों की एक श्रृंखला से घिरा हुआ था। इस शहर के दो हिस्से थे।
हैरत की बात है कि इस पूरे महानगर में धार्मिक स्थलों के कोई अवशेष नहीं मिले। न ही किसी देवी देवता की कोई मूर्ति मिली।
- फोटो : दयाशंकर शुक्ल सागर
धोलावीरा और एक सभ्यता की कहानी
"मध्य शहर" और "निचला शहर।" एक जैसे मकान, सड़क पक्की नालियां, गटर ये सब था उस शहर में। हैरत की बात है कि इस पूरे महानगर में धार्मिक स्थलों के कोई अवशेष नहीं मिले। न ही किसी देवी देवता की कोई मूर्ति मिली। अंतिम संस्कार की व्यवस्था ये थी कि मृत्यु के बाद लोगों को दफनाया भी जाता था। यहां शहर की चहारदीवारी के बाहर बड़े दायरे में बना एक विशाल कब्रिस्तान भी मिला है।
ये महानगर एक प्रोटो-ऐतिहासिक कांस्य युगीन शहरी बस्ती की एक असाधारण मिसाल है। इसकी अद्भुत सिटी प्लानिंग, शहर की किलेबंदी, परिष्कृत तालाब और जल निकासी व्यवस्था और निर्माण सामग्री के रूप में पत्थर का इस्तेमाल हड़प्पा सभ्यता के पूरे सरगम में धोलावीरा की अनूठेपन को दिखाती है। इस इलाके में पानी की उस वक्त भी कमी थी। तो पानी को संग्रहित करने के लिए तब के लोगों ने तालाबों के अलावा रॉक-कट कुएं बनाए थे। मनसर और मनहर, इन दो स्थानीय नदियों के बीच बसे इस प्राचीन शहर में पानी कर आपूर्ति इन नदियों के पानी से होती थी।
तब इन नदियों का स्रोत सरस्वती नदी रही होगी जिसका अब नामों-निशान नहीं है। लेकिन इन दोनों नदियों के चिन्ह आज भी सूखी बरसाती नदी के रूप में मौजूद हैं। नदी के प्रवाह को रोककर इसे शहर के तालाबों और कुओं में पानी स्टोर किया जाता था। यहां जमीन के अंदर पत्थर के स्लेटों की पानी की टंकी बनाने की अद्भुत और दुर्लभ कला थी। मौजूद पानी की हर बूंद को स्टोर करने के लिए डिज़ाइन की गई विस्तृत जल प्रबंधन प्रणाली लोगों की तीव्र भू-जलवायु परिवर्तनों के खिलाफ जीवित रहने का एक संघर्ष सरीखा था।
सोचिए जरा आज से पांच हजार साल पहले इस शहर की खुदाई में लिखी हुई चीजें तो नहीं मिलीं लेकिन एक घर के दरवाजे के ऊपर उस जमाने का साइन बोर्ड जैसा कुछ पाया गया जिस पर दस बड़े-बड़े अक्षरो में कुछ लिखा है। ये दस सुंदर अक्षर, चित्रात्मक शैली के हैं, जो पांच हजार साल के बाद आज भी सुरक्षित बच गए।
इस लिखने का मतलब क्या है यह आज भी एक रहस्य है। करीब चार हजार साल पहले धीरे-धीरे ये सभ्यता खत्म हो गई। ये इलाका समुद्र में डूब गया होगा। चार हजार साल तक रण आफ कच्छ की रेत ने इस शहर को हमेशा के लिए दफना लिया। मुस्लिम आक्रमणकारियों के आने के बाद जमीन में दफन इस शहर के आसपास फिर इंसानी बसाहट शुरू हुई। इस इलाके में पहली बार हड़प्पा संस्कृति के अवशेष साठ के दशक में मिलने शुरू हो गए थे। कोई बीस साल की खुदाई के बाद इसमें से एक नायाब शहर के अवशेष मिले। पता चला ये शहर भी हड़प्पा, मोहन जोदडो, गनेरीवाला, राखीगढ़, लोथल जैसी पुरातन संस्कृति का नगर था।
भारत के लिए एक विरासत
मोहनजोदाड़ो और बाकी शहर तो अब पाकिस्तान के हिस्से में चले गए। लेकिन धोलावीरा और लोथल भारत में ही है। धोलावीरा में दो मौसमी धाराएं हैं। एक उत्तर में मानसर और दूसरी दक्षिण में मनहर। धोलावीरा पर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण का कहना है कि इस साइट पर खुदाई से सिंधु सभ्यता के उत्थान और पतन का दस्तावेजीकरण करते हुए सात सांस्कृतिक चरणों का पता चला है। पहली संस्कृति (2650-2550 ईसा पूर्व) टेराकोटा और कांस्य युगीन थी। संस्कृति के दूसरे से पांचवें स्तर पर (2550-1850 ईसा पूर्व) के लोगों ने इस आधुनिक शहर को बसाया था।
फिर सातवें चरण में (1650-1450 ईसा पूर्व) ये शहर उजड़ गया। और जहां तहां छोटे मोटे गांव और कबीले बन गए। और उन कबिलों में नाविक भी रहे होंगे। फिर इस पतन के भी कोई एक हजार साल बाद सिकन्दर इस वीरान इलाके में आया होगा। जब यहां झीलें और छोटे-छोटे द्वीप उग आए थे। सिकन्दर के किसी इतिहासकार ने अपने वृतान्त में इस जगह की ऐतिहासिकता का जिक्र नहीं किया। यानी तब तक सब कुछ यहां जमींदोज हो चुका होगा। ये वाकई बहुत रोचक है। वक्त कैसे सबकुछ तबाह और बर्बाद कर देता है।
सिन्धु सभ्यता और धोलावीरा के अनपढ़े अभिलेखों में तमाम रहस्य दफन हैं। ये लिपि-चित्र बेशक उस समाज के विश्वास-परम्परा और अनमोल साहित्य की एक तस्वीर पेश करेंगे क्योंकि ये भारतीय सभ्यता के उद्भव के शुरूआती पद चिन्ह हैं। धोलावीरा के अवशेषों को विश्व धरोहर सूची में शामिल करके यूनेस्को ने सारी दुनिया के पुराविदों के सामने ज्ञान की एक खिड़की खोली है।
नई पीढ़ी इस दिलचस्प इतिहास की खिड़की से झांकने की नए सिरे से कोशिश कर सकती है। भारत, जापान तथा दुनिया के मशहूर कम्प्यूटर डिजाइनरों ने इस प्राचीन नगर के अवशेषों के आधार पर की कुछ तस्वीरें बनाई है। इन्हें देखकर आप अंदाजा लगा सकते हैं कि 5000 साल पुरानी महानगर की भव्यता कैसी रही होगी।
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