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यूनेस्को और धोलावीराः कच्छ के रेगिस्तान में 5 हजार साल पुरानी मुंबई

सार

यूनेस्को ने गुजरात के सिंधु-हड़प्पा कालीन ऐतिहासिक शहर धोलावीरा के अवशेषों को विश्व धरोहर सूची में शामिल कर लिया है। ये शहर प्राचीन संस्कृत भाषा से भी सदियों साल पुराना था।

इस शहर की अपनी लिपि और अपनी भाषा थी जिसे आज तक कोई विद्वान नहीं पढ़ सका है। वरिष्ठ पत्रकार दयाशंकर शुक्ल धोलावीरा के महत्व और इस नगर सभ्यता के महत्व  पर प्रकाश डाल रहे हैं। 
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यूनेस्को ने गुजरात के सिंधु-हड़प्पा कालीन ऐतिहासिक शहर धोलावीरा के अवशेषों को विश्व धरोहर सूची में शामिल कर लिया है। - फोटो : दयाशंकर शुक्ल सागर
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विस्तार
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भारत को इतिहास लिखने में कभी भरोसा नहीं रहा। भारत के पास अपना कोई लिखा हुआ इतिहास नहीं है। वेद हैं, उपनिषद हैं, पुराण हैं, किस्से हैं कहानियां हैं, नाटक हैं लेकिन सहेजा हुआ इतिहास नहीं है। जैसा कि मैगस्थनीज ने ईसा से कोई 400 साल पहले सिकन्दर के वक्त 'इंडिका' लिखी। शायद हम हिन्दुस्तानी वर्तमान में जीने वाले लोग थे। खाओ-पियो मस्त रहो टाइप। जो हो चुका उसे भूल जाओ और आगे बढ़ो। पुरानी स्मृतियां क्या संभाल के रखना। भारत ने जिस चीज को मूल्य दिया वो चीज थी संस्कृति। इसे हमने बचाए रखा।

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मिस्त्र खत्म हुआ, यूनान खत्म हुआ, सीरिया, बेबीलोन दुनिया की सारी संस्कृतियां पैदा हुई और मर गईं। लेकिन हमारी संस्कृति अभी तक जिंदा है। पता नहीं ये गर्व करने की बात है कि नहीं। क्योंकि इंसानों की तरह संस्कृतियां और सभ्यताएं पैदा होती हैं और एक दिन मर जाती हैं। फिर नई सभ्यता विकसित होती है जो बेशक पुरानी सभ्यता से और अधिक उन्नत और उम्मीद से भरी होनी चाहिए।
 

हड़प्पा कालीन ऐतिहासिक शहर धोलावीरा और यूनेस्को 

आज इतिहास पर लिखने का संदर्भ है- यूनेस्को ने गुजरात के सिंधु-हड़प्पा कालीन ऐतिहासिक शहर धोलावीरा के अवशेषों को विश्व धरोहर सूची में शामिल कर लिया है। धोलावीरा ने मुझे हमेशा आकर्षित किया है। चार साल पहले गुजरात गया था तो बड़ा मन था कि यहां भी एक चक्कर लगा लूं। लेकिन वक्त ने साथ नहीं दिया। सोमनाथ मंदिर से आगे नहीं जा पाया। दोबारा प्लान बना कि कि हवाई जहाज से कच्छ के पुराने ऐतिहासिक पाटनगर भुज हवाई अड्डे पर उतरा जाए। लेकिन यहां से भी धोलावीरा कोई 300 किलोमीटर की दूरी है। 

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हालांकि एयरपोर्ट से सड़क मार्ग पक्का है। लेकिन इस बार भी बात नहीं बन सकी। तीसरी दफा फिर कार्यक्रम बना तो पता चला कि अब वहां जाने पर रोक लग गई है, क्योंकि पाकिस्तान के सीमा होने के कारण इस इलाके में दाखिल होने के लिए बॉर्डर सिक्योर्टी फोर्स से इजाजत लेनी होगी, पर अब धोलवीरा के विश्व धरोहर सूची में शामिल होने के बाद शायद सरकार इस दिशा में कोई नया कदम उठाए।

खैर, गुजरात के कच्छ के रण यानी रेगिस्तान को 'नमक का रेगिस्तान' कहा जाता है। कोई 23,000 वर्ग फीट में फैला ये वीरान इलाका कभी समुंदर का हिस्सा था। लेकिन आज से कोई पांच हजार साल पहले ये इलाका समुंदर के किनारे कोई 150 एकड़ इलाके में बसा एक शानदार महानगर हुआ करता था। आज की मुम्बई की तरह। शायद उससे कहीं उन्नत और सम्पन्न।

दरअसल, इस सभ्यता के स्वर्ण काल में समुंदर के रास्ते भारतीयों का मैसोपोटेमिया से व्यापार होता था। यह महानगर तब बसा था जब वेद, पुराण और उपनिषद नहीं लिखे गए थे। तब तक न सिकन्दर विश्व विजय के लिए निकला था और न महात्मा बुद्ध का युग शुरू हुआ था। 

ये शहर प्राचीन संस्कृत भाषा से भी सदियों साल पुराना था। इस शहर की अपनी लिपि और अपनी भाषा थी जिसे आज तक कोई विद्वान नहीं पढ़ सका है। इस शहर के तबाह हो जाने के हजारों साल बाद सिकन्दर कोई 327-325 ईसा पूर्व के बीच विश्व विजय से थका-हारा घर वापसी के वक्त सिन्ध नदी की यात्रा करते हुए इस इलाके में आया था। तब इस इलाके में छोटे छोटे खूबसूरत द्वी्प हुआ करते थे। मीठे पानी की बड़ी झीलें भी थीं।

सिकन्दर के हमसफर दोस्त नियार्खस ने अपनी डायरी में लिखा कि किस तरह कच्छ के लोगों की मदद से सिकन्दर ने समुंदर का रास्ता पार करने के लिए उनसे करीब 800 बड़ी नावें बनवाईं। लेकिन काम नहीं बन पाया और उसे दूसरे रास्ते से लौटना पड़ा। और हैरत की बात देखिए कच्छ के निवासी 5000 साल से लेकर आज तक अच्छे नाविक माने जाते हैं।

सदियों की हवाओं ने उड़ते-उड़ते इस प्राचीन नगर के ऊपर से रेत की चादर जरा सी सरका दी थी। गांव वाले बरसों से एक कच्ची पक्की ईंटों के खंडहर के नजदीक रह रहे थे। - फोटो : दयाशंकर शुक्ल सागर

किताबों से झांकता इतिहास और धोलावीरा

राबर्ट सिवराइट, रशब्रुक और मिसेज पोस्टन तक ने कच्छ के रण पर बेहतरीन किताबें लिखीं। सब ने ये बात लिखी। जहांगीर ने तो कच्छ के लोगों का लगान इस शर्त पर माफ कर दिया था कि वे गरीब लोगों को पानी के जहाज से मुफ्त में मक्का और मदीना की यात्रा कराएंगे। 1838 में पोस्टन ने कुछ पुराने कच्छ नाविकों से बातचीत में निकाला कि वे अपने जहाज खुद बनाते थे और अपने बनाए समुद्री नक्शों पर ही यात्रियों को जहाज से इंग्लैंड, पोलैंड से लेकर अफ्रीका तक की यात्राएं कराते थे।

कच्छ के कई कुख्यात समुन्द्री डाकू भी हुए। ये कंपनी के जहाज लूट लेते। इन्होंने समुन्द्र के रास्ते से आने वाले फिरंगियों को पानी पिला दिया था। इन्हें स्थानीय राव राजाओं का संरक्षण था। इन्हीं के दम पर राव ने 1818 में कंपनी से समझौता किया कि वे इन दस्युओं से कंपनी को बचाएंगे बदले में कंपनी उनके स्वशासन में कोई हस्तक्षेप नहीं करेगी।

खैर, ये तो है इस इलाके की ऐतिहासिकता। इसी इलाके की 20वीं सदी की कहानी सुनिए। कच्छ में एक पिछड़ा उजाड़ गांव है धोलावीरा। मजे की बात ये है कि इस शहर की खोज से पहले कच्छ के लोगों ने गुजरात को भी अपना नहीं माना था। आजादी के दस साल बाद तक कच्छ गुजरात का हिस्सा न होकर एक केन्द्र शासित राज्य था।

यहां के स्थानीय लोगों की अपनी संस्कृति और अपनी सभ्यता है। ये लोग आदिम टोटम नाग, राक्षस, यदु, सिन्धी से लेकर ग्रीक देवताओं को अपना मानते रहे हैं। वे आज भी भारत को तो अपना मानते हैं लेकिन गुजरातियों को अपना नहीं समझते।

सदियों की हवाओं ने उड़ते-उड़ते इस प्राचीन नगर के ऊपर से रेत की चादर जरा सी सरका दी थी। गांव वाले बरसों से एक कच्ची पक्की ईंटों के खंडहर के नजदीक रह रहे थे। वे नहीं जानते थे कि ये खंडहर कितने पुराने हैं। उन्हें दूर दूर तक इस बात का अंदाजा नहीं था कि जहां वे रहते हैं कभी 5000 साल पहले वो मुम्बई जैसा कोई शहर रहा होगा। उनके खुद के घर, मिट्टी और रेत के थे, इसलिए उन्हें ये पक्की ईंटें देखकर हैरत होती। इसे वो स्थानीय भाषा में कोटड़ा कहते जिसका मतलब था गढ़। इन खंडहरों के पत्थर से गांव वाले अपने नए घर बना सकते थे लेकिन नहीं। 

गांव के बुजुर्गों की सख्त हिदायत थी कि वे इन ईंटों को गांव में न लाएं क्योंकि इनमें दुष्ट आत्माओं का वास है। इसे वे मरे हुए लोगों का घर कहते थे जिनका सामान चुराना अशुभ है। याद करें इसी सभ्यता से जुड़े मोहनजोदाडो का स्थानीय भाषा में मतलब था- मुर्दो का टीला। वहां का सामान भी वहां के स्थानीय लोग घर नहीं लाते थे। इस खंडहर के बगल में एक बडा मैदानी इलाका था जहां खेती होती थी। ये इलाका सरकारी कागजों में भी 'बाजार' के नाम से मशहूर था। जबकि यहां कोई बाजार दूर दूर तक नहीं था। सिर्फ खेत थे लेकिन जगह का नाम बाजार था। फिर साठ के दशक में धोलावारा के पोस्टमास्टर को कोई अजीब सी चीज मिली। उन्हें लगा ये कोई प्राचीन चीज है। 

उन्होंने गुजरात के पुरातत्व विभाग को खत पोस्ट कर दिया। वो नेहरू जी का जमाना था। न केवल जवाब आया बल्कि कुछ ही महीनों में पुरातत्व विभाग की एक छोटी सी टीम वहां पहुंच गई। और कुछ ही सालों में पुराविद आरएस बिष्ट के नेतृत्व में वहां खुदाई शुरू हो गई। तब वहां से निकला देश का एक प्राचीनतम शहर। अब तक हुई खोजों में पता चला है कि ये शहर उस जमाने की सिंधु सभ्यता के अन्य शहरों की तरह कच्ची पक्की ईंटों से बना था। ये ईंटे आज की ईटों की तरह चकोर होती थीं।

समन्दर के किनारे होने के कारण जल मार्ग से दूसरे देशों से कारोबार होता था, तब शहर की आबादी कोई साठ सत्तर हजार रही होगी। शहर में ज्यादातर लोग व्यापारी थे और यह महानगर व्यापार का मुख्य केन्द्र था। शहर की बसावट किसी शानदार कॉलोनी जैसी थी। ये महानगर किसी चौकोर दीवारों की एक श्रृंखला से घिरा हुआ था। इस शहर के दो हिस्से थे।
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हैरत की बात है कि इस पूरे महानगर में धार्मिक स्थलों के कोई अवशेष नहीं मिले। न ही किसी देवी देवता की कोई मूर्ति मिली। - फोटो : दयाशंकर शुक्ल सागर

धोलावीरा और एक सभ्यता की कहानी 

"मध्य शहर" और "निचला शहर।" एक जैसे मकान, सड़क पक्की नालियां, गटर ये सब था उस शहर में। हैरत की बात है कि इस पूरे महानगर में धार्मिक स्थलों के कोई अवशेष नहीं मिले। न ही किसी देवी देवता की कोई मूर्ति मिली। अंतिम संस्कार की व्यवस्था ये थी कि मृत्यु के बाद लोगों को दफनाया भी जाता था। यहां शहर की चहारदीवारी के बाहर बड़े दायरे में बना एक विशाल कब्रिस्तान भी मिला है।

ये महानगर एक प्रोटो-ऐतिहासिक कांस्य युगीन शहरी बस्ती की एक असाधारण मिसाल है। इसकी अद्भुत सिटी प्लानिंग, शहर की किलेबंदी, परिष्कृत तालाब और जल निकासी व्यवस्था और निर्माण सामग्री के रूप में पत्थर का इस्तेमाल हड़प्पा सभ्यता के पूरे सरगम में धोलावीरा की अनूठेपन को दिखाती है। इस इलाके में पानी की उस वक्त भी कमी थी। तो पानी को संग्रहित करने के लिए तब के लोगों ने तालाबों के अलावा रॉक-कट कुएं बनाए थे। मनसर और मनहर, इन दो स्थानीय नदियों के बीच बसे इस प्राचीन शहर में पानी कर आपूर्ति इन नदियों के पानी से होती थी। 

तब इन नदियों का स्रोत सरस्वती नदी रही होगी जिसका अब नामों-निशान नहीं है। लेकिन इन दोनों नदियों के चिन्ह आज भी सूखी बरसाती नदी के रूप में मौजूद हैं। नदी के प्रवाह को रोककर इसे शहर के तालाबों और कुओं में पानी स्टोर किया जाता था। यहां जमीन के अंदर पत्थर के स्लेटों की पानी की टंकी बनाने की अद्भुत और दुर्लभ कला थी। मौजूद पानी की हर बूंद को स्टोर करने के लिए डिज़ाइन की गई विस्तृत जल प्रबंधन प्रणाली लोगों की तीव्र भू-जलवायु परिवर्तनों के खिलाफ जीवित रहने का एक संघर्ष सरीखा था।

सोचिए जरा आज से पांच हजार साल पहले इस शहर की खुदाई में लिखी हुई चीजें तो नहीं मिलीं लेकिन एक घर के दरवाजे के ऊपर उस जमाने का साइन बोर्ड जैसा कुछ पाया गया जिस पर दस बड़े-बड़े अक्षरो में कुछ लिखा है। ये दस सुंदर अक्षर, चित्रात्मक शैली के हैं, जो पांच हजार साल के बाद आज भी सुरक्षित बच गए। 

इस लिखने का मतलब क्या है यह आज भी एक रहस्य है। करीब चार हजार साल पहले धीरे-धीरे ये सभ्यता खत्म हो गई। ये इलाका समुद्र में डूब गया होगा। चार हजार साल तक रण आफ कच्छ की रेत ने इस शहर को हमेशा के लिए दफना लिया। मुस्लिम आक्रमणकारियों के आने के बाद जमीन में दफन इस शहर के आसपास फिर इंसानी बसाहट शुरू हुई। इस इलाके में पहली बार हड़प्पा संस्कृति के अवशेष साठ के दशक में मिलने शुरू हो गए थे। कोई बीस साल की खुदाई के बाद इसमें से एक नायाब शहर के अवशेष मिले। पता चला ये शहर भी हड़प्पा, मोहन जोदडो, गनेरीवाला, राखीगढ़, लोथल जैसी पुरातन संस्कृति का नगर था। 


भारत के लिए एक विरासत 

मोहनजोदाड़ो और बाकी शहर तो अब पाकिस्तान के हिस्से में चले गए। लेकिन धोलावीरा और लोथल भारत में ही है। धोलावीरा में दो मौसमी धाराएं हैं। एक उत्तर में मानसर और दूसरी दक्षिण में मनहर। धोलावीरा पर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण का कहना है कि इस साइट पर खुदाई से सिंधु सभ्यता के उत्थान और पतन का दस्तावेजीकरण करते हुए सात सांस्कृतिक चरणों का पता चला है। पहली संस्कृति (2650-2550 ईसा पूर्व) टेराकोटा और कांस्य युगीन थी। संस्कृति के दूसरे से पांचवें स्तर पर (2550-1850 ईसा पूर्व) के लोगों ने इस आधुनिक शहर को बसाया था। 

फिर सातवें चरण में (1650-1450 ईसा पूर्व) ये शहर उजड़ गया। और जहां तहां छोटे मोटे गांव और कबीले बन गए। और उन कबिलों में नाविक भी रहे होंगे। फिर इस पतन के भी कोई एक हजार साल बाद सिकन्दर इस वीरान इलाके में आया होगा। जब यहां झीलें और छोटे-छोटे द्वीप उग आए थे। सिकन्दर के किसी इतिहासकार ने अपने वृतान्त में इस जगह की ऐतिहासिकता का जिक्र नहीं किया। यानी तब तक सब कुछ यहां जमींदोज हो चुका होगा। ये वाकई बहुत रोचक है। वक्त कैसे सबकुछ तबाह और बर्बाद कर देता है। 

सिन्धु सभ्यता और धोलावीरा के अनपढ़े अभिलेखों में तमाम रहस्य दफन हैं। ये लिपि-चित्र बेशक उस समाज के विश्वास-परम्परा और अनमोल साहित्य की एक तस्वीर पेश करेंगे क्योंकि ये भारतीय सभ्यता के उद्भव के शुरूआती पद चिन्ह हैं। धोलावीरा के अवशेषों को विश्व धरोहर सूची में शामिल करके यूनेस्को ने सारी दुनिया के पुराविदों के सामने ज्ञान की एक खिड़की खोली है।

नई पीढ़ी इस दिलचस्प इतिहास की खिड़की से झांकने की नए सिरे से कोशिश कर सकती है। भारत, जापान तथा दुनिया के मशहूर कम्प्यूटर डिजाइनरों ने इस प्राचीन नगर के अवशेषों के आधार पर की कुछ तस्वीरें बनाई है। इन्हें देखकर आप अंदाजा लगा सकते हैं कि 5000 साल पुरानी महानगर की भव्यता कैसी रही होगी।

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।
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