फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

यादों में मोहम्मद रफी: सादगी और अलहदा गायकी की मिसाल थे रफी साहब 

सार

आज मोहम्मद रफ़ी साहब की पुण्यतिथि है। रफी साहब की गायकी और उनका व्यक्तित्व अलहदा था। कहते हैं उनके परिवार का संगीत से कोई सरोकार नहीं था। ऐसे में उनका इतना महान गायक बनना एक नियति ही थी। आज रफी साहब की पुण्यतिथि पर पढ़ें उनकी यादों का संजोता यह लेख..!
विज्ञापन
"मेरी तारीफ मत करिए ये तो ऊपर वाले का करम है, उनकी देन है- रफी साहब - फोटो : Social Media
विज्ञापन

विस्तार
वॉट्सऐप चैनल फॉलो करें

जय जय राम जय श्री राम,

विज्ञापन

दो अक्षर का प्यारा नाम… 

कभी राम नाम का यह सुंदर भजन गाकर लोगों के दिलों में ‘भक्त की आवाज’ बनने वाले रफी साहब को भजन गाना बहुत पसंद था। रफी साहब अपने करियर की ऊंचाइयों को कभी खुद महसूस नहीं करना चाहते थे। चकाचौंध की इस दुनिया में भी वो बेहद सादगी से भरे से इंसान थे। कुछ सालों पहले रफी साहब के बारे में बात करने के लिए उनके बेटे शाहिद रफी मेरे साथ एक इंटरव्यू में बैठे थे और उन्होंने उनकी सादगी के बारे में कुछ बेहतरीन बातें बताईं थी- उनका कहना था कि रफी साहब उसूलों से चलते थे।  वो बहुत ज्यादा लोगों के बीच नहीं जाते थे और तमाम व्यस्तताओं के बीच परिवार के साथ रहना ज्यादा पसंद करते थे।

 

दरअसल, रफी साहब का व्यक्तित्व फिल्म इंडस्ट्री में सबसे अनोखा था क्योंकि अमूमन यहां पर पार्टियों का दौर चलता रहता है। ये भी कहा जाता है कि मिलने-जुलने वाले लोग ही इंडस्ट्री में अपनी जगह बना पाते हैं। यहां बहुत चापलूसी करनी पड़ती है जैसी बहुत सी बातें हैं। मोहम्मद रफी को आप जब अतीत में जाकर देखते हैं तो वे इस तरह की कवायदों से दूर ही रहे इसकी एक बड़ी वजह रही उनके यही उसूल। 

 

रफी साहब के बेटे ये भी बताते-

उन्हें खुद कभी ये अहसास नहीं होता था कि वो एक बहुत बड़े स्टार के बेटे हैं। रफी साहब हमेशा ऊपर वाले की बात करते थे। ईश्वर में उनकी बहुत आस्था थी। ये आस्था उनके शानदार भजनों में सुनने को मिलती है। रफी साहब से जब भी कोई उनकी आवाज की तारीफ करता था। तो वो हमेशा अपने कानों पर हाथ लगाकर ऊपर देखते हुए कहते थे- "मेरी तारीफ मत करिए ये तो ऊपर वाले का करम है, उनकी देन है। ओ दुनिया के रखवाले और मन तड़पत हरि दर्शन जैसे उनके गीत लोगों में लोकप्रिय थे"  

 

 

 

महज सात साल की उम्र में वे एक फकीर के गाने से बहुत प्रभावित थे और उसकी नकल किया करते थे। - फोटो : Twitter

जब गायकी छोड़ दी रफी साहब ने 

मेरे साथ हुई बातचीत में तो नहीं, लेकिन एक अन्य इंटरव्यू में शाहिद रफी ने ये भी बताया था की 1971 में रफी साहब ने हज से आने के बाद गाना गाना छोड़ दिया था। उन्हें कुछ मौलवियों ने कहा था आप हाजी हो गए हैं अब गाना-वाना छोड़ दीजिए। इस बात का असर भी रफी साहब पर हुआ था। बाद में उन्हें एहसास हुआ की संगीत से बड़ी बंदगी उनके लिए कुछ और नहीं,  क्योंकि इसी संगीत से वो अपने ईश्वर को पाते थे। 
 

रफी साहब के जीवन में सूफी जीवन और फकीरों का बड़ा प्रभाव था। वे बेहद शर्मीले व्यक्ति थे और लोगों से बहुत ज्यादा घुलते मिलते नहीं थे। किसी का कष्ट उनसे देखा नहीं जाता था।



आपको उनकी दरियादिली के भी कई किस्से पढ़ने-सुनने को मिलेंगे। वो दान करने और दूसरों की मदद करने को बहुत अहमियत देते थे। ये उनके भीतर की भक्ति थी जो वे भारतीय श्रोताओं को कई अमर भजन दे पाए। 1970 में आई, गोपी फिल्म में सुख के सब साथी गीत गाया था। इसके अलावा बैजू बावरा फिल्म में मन तड़पत हरि-दर्शन को आज, मधुमती में मधुबन में राधिका नाचे रे जैसे भजन आज भी रफी साहब को अमर बनाए हुए हैं। 



परिवार का संगीत से कोई लेना देना नहीं था  

मोहम्मद रफ़ी के परिवार का संगीत से कोई सरोकार नहीं था। ऐसे में उनका इतना महान गायक बनना एक नियति ही मानी जाएगी। ये जानकारियां भी मिलती हैं कि रफी साहब के बड़े भाई की नाई की दुकान थी, और रफ़ी साहब भी दुकान पर रहा करते थे। महज सात साल की उम्र में वे एक फकीर के गाने से बहुत प्रभावित थे और उसकी नकल किया करते थे। ऐसे ही उनके जीवन में संगीत का प्रवेश हुआ। फिर बड़े भाई की मदद से उन्होंने संगीत सीखा। ऑल इंडिया रेडियो, लाहौर में उस समय के प्रख्यात गायक-अभिनेता के.एल.सहगल के कार्यक्रम के बारे में भी कई जगह जानकारियां मिलती हैं।

दरअसल, उस समय के सुपर स्टार सहगल साहब को सुनने के लिए मोहम्मद रफ़ी और उनके बड़े भाई भी गए थे। बिजली गुल हो जाने की वजह से सहगल ने गाने से मना कर दिया। रफ़ी के बड़े भाई ने आयोजकों से निवेदन किया की भीड़ की व्यग्रता को शांत करने के लिए मोहम्मद रफ़ी को गाने का मौका दिया जाए। उनको अनुमति मिल गई और 13 वर्ष की आयु में मोहम्मद रफ़ी का ये पहला सार्वजनिक प्रदर्शन था।

खैर, घटनाओं की सत्यता पर तो कुछ नहीं कहा जा सकता लेकिन ये निश्चित है कि रफी साहब के जीवन में संगीत का आगमन बहुत छोटी उम्र से हो गया था। महज 20 साल की उम्र में पंजाबी फिल्म गुल बलोच में उन्होंने पहला गाना गाया था, फिर मुंबई में नौशाद साहब की नजर पड़ी और रफी साहब के करियर ने धीरे धीरे रफ्तार पकड़ ली। 

 

विज्ञापन

बहुत लंबे समय तक लता जी और रफी साहब ने साथ में गाना नहीं गाया। - फोटो : सोशल मीडिया


लता और रफी की जोड़ी क्यों टूटी? 

रफी साहब जिस स्वभाव के इंसान थे उनका किसी से विवाद हो ये मुश्किल लगता है। इसके बावजूद बहुत लंबे समय तक लता जी और रफी साहब ने साथ में गाना नहीं गाया। निश्चित तौर पर दोनों ही अपने समय के सुपर स्टार थे और दोनों बेहतरीन गायकों को सुनना किसे पसंद नहीं आएगा। इसके बावजूद दोनों कई वर्षों तक साथ में गाना नहीं गाया। इसके पीछे कोई पुष्ट कारण दिखाई नहीं पड़ता। मनमुटावों को सार्वजनिक मंच पर कलाकार स्वीकार नहीं करते हैं लेकिन अन्य लोगों के इंटरव्यूज और यादों के आधार पर ये बात सामने आती है कि रॉयल्टी को लेकर ये अनबन शुरू हुई थी।

लता जी गायक को रॉयल्टी दिए जाने के पक्ष में थी जबकि रफी साहब इस बात से इत्तेफाक नहीं रखते थे। ये मनमुटाव खत्म हुआ या यूं कहें लंबे समय बाद रफी साहब और लता जी ने साथ में गाना गाया और ये गाना था ज्वेल थीफ का दिल पुकारे.. आ रे आ रे... इसके बाद दोनों के कई गाने साथ आए।  

लाहौर में पले-बढ़े रफी साहब ने विभाजन का दौर भी देखा, अमृतसर में जन्में और मुंबई में काम करने वाले रफी साहब के दिल में हिंदुस्तान ही बसता था। कट्टरपंथियों ने कला को हमेशा दबाने की कोशिश की है। निश्चित तौर पर रफी साहब जैसा फनकार कभी ऐसे लोगों का समर्थन नहीं कर सकता था। रफी साहब ने एक मिसाल कायम की और आज उनकी नक्शे कदम पर चलकर भारत ही नहीं पाकिस्तान के युवा भी गायकी में हाथ आजमा रहे हैं। जबकि एक दौर वो भी था जब मौलवियों का दबाव रफी साहब को भी झेलना पड़ा था। 

रफी साहब का जीवन हमें ये भी सिखाता है कि यदि हम दकियानूसी बातों में उलझने के बजाय हर एक को गले लगाते हैं, मुहब्बत का पैगाम देते हैं, तो बदले में हमें भी कितना प्यार मिलता है। रफी साहब ने जो भजन गाए हैं वो हर मंदिर में आज भी गूंजते हैं जबकि वो खुद पांच वक्त के नमाजी थे और हाजी भी। 


डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।
 

विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें