महज सात साल की उम्र में वे एक फकीर के गाने से बहुत प्रभावित थे और उसकी नकल किया करते थे।
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जब गायकी छोड़ दी रफी साहब ने
मेरे साथ हुई बातचीत में तो नहीं, लेकिन एक अन्य इंटरव्यू में शाहिद रफी ने ये भी बताया था की 1971 में रफी साहब ने हज से आने के बाद गाना गाना छोड़ दिया था। उन्हें कुछ मौलवियों ने कहा था आप हाजी हो गए हैं अब गाना-वाना छोड़ दीजिए। इस बात का असर भी रफी साहब पर हुआ था। बाद में उन्हें एहसास हुआ की संगीत से बड़ी बंदगी उनके लिए कुछ और नहीं, क्योंकि इसी संगीत से वो अपने ईश्वर को पाते थे।
रफी साहब के जीवन में सूफी जीवन और फकीरों का बड़ा प्रभाव था। वे बेहद शर्मीले व्यक्ति थे और लोगों से बहुत ज्यादा घुलते मिलते नहीं थे। किसी का कष्ट उनसे देखा नहीं जाता था।
आपको उनकी दरियादिली के भी कई किस्से पढ़ने-सुनने को मिलेंगे। वो दान करने और दूसरों की मदद करने को बहुत अहमियत देते थे। ये उनके भीतर की भक्ति थी जो वे भारतीय श्रोताओं को कई अमर भजन दे पाए। 1970 में आई, गोपी फिल्म में सुख के सब साथी गीत गाया था। इसके अलावा बैजू बावरा फिल्म में मन तड़पत हरि-दर्शन को आज, मधुमती में मधुबन में राधिका नाचे रे जैसे भजन आज भी रफी साहब को अमर बनाए हुए हैं।
परिवार का संगीत से कोई लेना देना नहीं था
मोहम्मद रफ़ी के परिवार का संगीत से कोई सरोकार नहीं था। ऐसे में उनका इतना महान गायक बनना एक नियति ही मानी जाएगी। ये जानकारियां भी मिलती हैं कि रफी साहब के बड़े भाई की नाई की दुकान थी, और रफ़ी साहब भी दुकान पर रहा करते थे। महज सात साल की उम्र में वे एक फकीर के गाने से बहुत प्रभावित थे और उसकी नकल किया करते थे। ऐसे ही उनके जीवन में संगीत का प्रवेश हुआ। फिर बड़े भाई की मदद से उन्होंने संगीत सीखा। ऑल इंडिया रेडियो, लाहौर में उस समय के प्रख्यात गायक-अभिनेता के.एल.सहगल के कार्यक्रम के बारे में भी कई जगह जानकारियां मिलती हैं।
दरअसल, उस समय के सुपर स्टार सहगल साहब को सुनने के लिए मोहम्मद रफ़ी और उनके बड़े भाई भी गए थे। बिजली गुल हो जाने की वजह से सहगल ने गाने से मना कर दिया। रफ़ी के बड़े भाई ने आयोजकों से निवेदन किया की भीड़ की व्यग्रता को शांत करने के लिए मोहम्मद रफ़ी को गाने का मौका दिया जाए। उनको अनुमति मिल गई और 13 वर्ष की आयु में मोहम्मद रफ़ी का ये पहला सार्वजनिक प्रदर्शन था।
खैर, घटनाओं की सत्यता पर तो कुछ नहीं कहा जा सकता लेकिन ये निश्चित है कि रफी साहब के जीवन में संगीत का आगमन बहुत छोटी उम्र से हो गया था। महज 20 साल की उम्र में पंजाबी फिल्म गुल बलोच में उन्होंने पहला गाना गाया था, फिर मुंबई में नौशाद साहब की नजर पड़ी और रफी साहब के करियर ने धीरे धीरे रफ्तार पकड़ ली।
बहुत लंबे समय तक लता जी और रफी साहब ने साथ में गाना नहीं गाया।
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लता और रफी की जोड़ी क्यों टूटी?
रफी साहब जिस स्वभाव के इंसान थे उनका किसी से विवाद हो ये मुश्किल लगता है। इसके बावजूद बहुत लंबे समय तक लता जी और रफी साहब ने साथ में गाना नहीं गाया। निश्चित तौर पर दोनों ही अपने समय के सुपर स्टार थे और दोनों बेहतरीन गायकों को सुनना किसे पसंद नहीं आएगा। इसके बावजूद दोनों कई वर्षों तक साथ में गाना नहीं गाया। इसके पीछे कोई पुष्ट कारण दिखाई नहीं पड़ता। मनमुटावों को सार्वजनिक मंच पर कलाकार स्वीकार नहीं करते हैं लेकिन अन्य लोगों के इंटरव्यूज और यादों के आधार पर ये बात सामने आती है कि रॉयल्टी को लेकर ये अनबन शुरू हुई थी।
लता जी गायक को रॉयल्टी दिए जाने के पक्ष में थी जबकि रफी साहब इस बात से इत्तेफाक नहीं रखते थे। ये मनमुटाव खत्म हुआ या यूं कहें लंबे समय बाद रफी साहब और लता जी ने साथ में गाना गाया और ये गाना था ज्वेल थीफ का दिल पुकारे.. आ रे आ रे... इसके बाद दोनों के कई गाने साथ आए।
लाहौर में पले-बढ़े रफी साहब ने विभाजन का दौर भी देखा, अमृतसर में जन्में और मुंबई में काम करने वाले रफी साहब के दिल में हिंदुस्तान ही बसता था। कट्टरपंथियों ने कला को हमेशा दबाने की कोशिश की है। निश्चित तौर पर रफी साहब जैसा फनकार कभी ऐसे लोगों का समर्थन नहीं कर सकता था। रफी साहब ने एक मिसाल कायम की और आज उनकी नक्शे कदम पर चलकर भारत ही नहीं पाकिस्तान के युवा भी गायकी में हाथ आजमा रहे हैं। जबकि एक दौर वो भी था जब मौलवियों का दबाव रफी साहब को भी झेलना पड़ा था।
रफी साहब का जीवन हमें ये भी सिखाता है कि यदि हम दकियानूसी बातों में उलझने के बजाय हर एक को गले लगाते हैं, मुहब्बत का पैगाम देते हैं, तो बदले में हमें भी कितना प्यार मिलता है। रफी साहब ने जो भजन गाए हैं वो हर मंदिर में आज भी गूंजते हैं जबकि वो खुद पांच वक्त के नमाजी थे और हाजी भी।
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