यूसीसी को लेकर लोगों के मन में कई सवाल
एक शंका यह भी है कि सरकार यूसीसी की आड़ में हिंदू सामाजिक धार्मिक कानूनों को इतर धर्मियों पर थोप सकती है। यह इसलिए संभव नहीं है, क्योंकि खुद हिंदुओं को भी यूसीसी के लिए अपने कुछ नियमों-परंपराओं को ताक पर रखना पड़ सकता है। इसमें प्रमुख हिंदू अविभाजित परिवार (एचयूएफ) है।
एआईएमआईम नेता असदउद्दीन ओवैसी ने इसी मुद्दे पर पीएम मोदी को घेरते हुए सवाल किया है कि क्या वो एचयूएफ को खत्म करेंगे? बताया जाता है कि देश में इसके जरिए हिंदू परिवार हर साल 3 हजार करोड़ रु. आयकर अधिनियम के तहत एचयूएफ को एक अलग ईकाई माना जाता है। अब बेटियां भी परिवार की संपत्ति में हिस्सा हैं और इसके तहत उन्हें टैक्स देनदारियों में कुछ छूट मिलती है। हालांकि हिंदुओं में भी अब संयुक्त परिवार प्रथा बहुत कम रह गई है, उसकी जगह ईकाई परिवार प्रथा ने ले ली है।
इसका अर्थ यह है कि कुछ चुनिंदा कानूनों को छोड़कर बाकी में सभी धर्मों की अपनी-अपनी प्रथा परंपराएं कायम रहेंगी। लेकिन ऐसे मामलो में अलग-अलग कानून होने से वर्तमान में जारी मुकदमेबाजी पर कुछ अंकुश लग सकता है। अब असली सवाल यह है कि मोदी सरकार यह मुद्दा अभी ही क्यों उठा रही है? सरकार चाहती तो मोदी 2.0 के पहले या दूसरे साल में ही इसे ला सकती थी। लेकिन उसने ऐसा नहीं किया गया।
हालांकि इस मुद्दे पर बहस की शुरुआत तो पिछले साल दिसंबर में भाजपा सांसद किरोडीलाल मीणा द्वारा राज्यसभा में समान नागरिक संहिता लागू करने को लेकर लाए गए प्राइवेट बिल के साथ ही हो गई थी। इस बिल को भाजपा का समर्थन था। भाजपा के लिए यह मुद्दा जनसंघ के जमाने से है। भाजपा बनने के बाद 90 के दशक में पार्टी जिन मुद्दों को लेकर बढ़ती रही है, उनमें कश्मीर में धारा 370 हटाना, अयोध्या में राम मंदिर निर्माण और देश में समान नागरिक संहिता लागू करना प्रमुख रहे हैं।
इनमें से दो तो पूरे हो चुके हैं, केवल यूसीसी का मुद्दा बचा है। उधर विधि आयोग ने भी 2018 में यूसीसी पर राय मांगकर सनसनी फैला दी थी, लेकिन कुछ वर्गों के विरोध के बाद उसने खुद यह पहल ये कहकर वापस ले ली थी कि फिलहाल देश में इसकी जरूरत नहीं है।
यूसीसी देश की जरूरत?
लेकिन 2023 के चुनाव के पहले मोदी सरकार और विधि आयोग को लगने लगा है कि अब यूसीसी देश की जरूरत है। इसके पीछे ‘अनेकता में एकता’ का भाव भी है, लेकिन दूसरे तरीके से। कुछ लोगों का मानना है कि समान नागरिक संहिता देश के धर्म निरपेक्ष चरित्र को मजबूत करेगी। शायद इसी मकसद से प्रधानमंत्री ने कहा कि ‘एक देश और दो कानून’ व्यवस्था नहीं चल सकती। पार्टी कभी ऐसा ही नारा ‘एक देश, दो विधान, दो प्रधान और दो निशान’ वाला नारा जम्मू कश्मीर के बारे में दिया करती थी। लेकिन यूसीसी का मुद्दा वोटों की भट्टी में ‘राम मंदिर’ की तरह पक सकेगा?
क्या वोटर और खासकर बहुसंख्यक समाज यूसीसी मुद्दे से उतना ही भावनात्मक जुड़ाव महसूस कर सकेगा, जैसा राम मंदिर के मामले में हुआ है? क्योंकि यह मुद्दा विभिन्न सामाजिक धार्मिक रीति-रिवाजों के एक समान संहिताकरण से जुड़ा है और कानूनी ज्यादा है। इसे वोटों की गोलबंदी में बदलना आसान नहीं है। यूसीसी को लेकर मतदाताओं का ध्रुवीकरण तो होगा, लेकिन कितना, यह कहना बहुत मुश्किल है और इस मुद्दे के आगे बाकी के जमीनी मुद्दे और जवाबदेहियां दफन हो जाएंगी, यह मान लेना राजनीतिक भोलापन होगा।
वोटों के ध्रुवीकरण के लिए जरूरी है कि पहले वो ड्राफ्ट तो सामने आए, जिससे प्रस्तावित समान नागरिक संहिता का स्वरूप स्पष्ट हो सके और लोग इसके पक्ष-विपक्ष में राय बना सकें। यह ड्राफ्ट कब तक आएगा, अभी स्पष्ट नहीं है। अलबत्ता यूसीसी को सबसे पहले लागू करने का वादा करने वाले उत्तराखंड राज्य में 15 बिंदुओं पर आधारित यूसीसी ड्राफ्ट तैयार होने की खबर है, लेकिन अभी वह सार्वजनिक नहीं हुआ है।
हो सकता है कि विधि आयोग उसे ही बेसिक ड्राफ्ट मान ले। लेकिन अगर आयोग को साढ़े आठ लाख से ज्यादा सुझाव मिले हैं तो उनके अध्ययन और उन्हें ड्राफ्ट में शामिल करने (बशर्ते ऐसा हो) के लिए काफी समय लगेगा। यह काम अगले लोकसभा चुनाव के पहले पूरा हो जाएगा, इसकी संभावना कम है। अगर जल्दबाजी में कोई ड्राफ्ट लाया भी गया तो उस पर बवाल मचना तय है। उसी हल्ले में चुनाव भी हो जाएंगे।
मतलब ये कि यूसीसी को कानून में तब्दील होने में अभी बहुत से रोड़े हैं। कोशिश माहौल बनाए रखने की है, जो हो रही है।
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