दिल्ली चुनाव परिणाम 2025
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कांग्रेस में भी खुशी का माहौल
भारतीय जनता पार्टी के साथ कांग्रेस भी दिल्ली विधानसभा चुनाव परिणामों पर जश्न मना रही है। भाजपा तो विजय का जश्न मना रही है, लेकिन पराजय के देशव्यापी सिलसिले के कायम रहने के बावजूद कांग्रेस को आम आदमी पार्टी की पराजय की खुशी है। कांगेस और आप में अदावत लोकसभा चुनाव के बाद से ही शुरू हो गई थी, जो चुनाव का कारवां बढ़ने के साथ-साथ तीखी कटुता में बदलती चली गई।
इंडी गठबंधन के अन्य दलों दकि आप को समर्थन मिलने के बाद तो यह लड़ाई कांग्रेस के अस्तित्व का सवाल बन गई थी। ऐसे में अकेले ही चुनाव लड़ना उसकी मजबूरी बन गई। हालांकि कांग्रेस के लिए प्रसन्नता का विषय यह है कि उसके पास खोने के लिए कुछ था भी नहीं और उसने खोया भी नहीं। उसने अपने 2020 के चार प्रतिशत वोट बैंक में दो प्रतिशत का इजाफा जरूर किया।
निश्चित ही यह राहुल प्रियंका के परिश्रम का प्रतिफल हर्ष है। लेकिन लगता है कांग्रेस में इससे अधिक खुशी इस बात की है कि कांग्रेस आम आदमी पार्टी की चौदह सीटें हरवाने में कामयाब रही, जिसमें स्वयं अरविंद केजरीवाल की नई दिल्ली सीट भी शामिल है। यहां केजरीवाल चार हजार से अधिक मतों से भाजपा के प्रवेश वर्मा से चुनाव हारे।
तीसरे स्थान पर रहे कांग्रेस उम्मीदवार पूर्व सांसद संदीप दीक्षित को 4,500 से अधिक वोट मिले। इस तरह उन्होंने तीन बार सीएम रहीं अपनी मां शीला दीक्षित की हार का बदला केजरीवाल से ले लिया। यह परिणाम बताते हैं कि यदि दिल्ली में आप और कांग्रेस मिलकर लड़ते तो 36 सीट जीत सकते थे क्योंकि 22 पर आप जीती है और 14 पर कांंग्रेस के कारण पराजित हुई। इसे इस तरह भी देखा जा सकता है कि कांग्रेस ने अप्रत्यक्ष रूप से भाजपा के लिए बी-टीम का काम किया है और इस बात की कांग्रेस को खुशी भी है क्योंकि वह आप से बदला लेने में सफल रही।
इस प्रकार दिल्ली में आप और कांग्रेस की आमने-सामने की लड़ाई भाजपा को बहुत भाई। यह बात अलग है कि कांग्रेस के कुल सत्तर में से नब्बे फीसदी उम्मीदवार जमानत भी नहीं बचा पाए जो कि एक राष्ट्रीय पार्टी के लिए दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति ही कही जाएगी।
कुल मिलाकर 27 वर्ष बाद भाजपा दिल्ली में अपना परचम फहराने में सफल रही है। उसके दुर्भाग्य की शुरूआत 1993 से प्रारंभ हुई थी जब नईदिल्ली राज्य गठन के बाद पार्टी को सफलता हासिल हुई और दिल्ली के लोकप्रिय नेता मदनलाल खुराना मुख्यमंत्री बने, लेकिन आंतरिक गुटबाजी के चलते साहिब सिंह वर्मा मुख्यमंत्री बना दिए गए।
अगले 1998 के चुनाव आने के पूर्व सुषमा स्वराज भी दिल्ली की मुख्यमंत्री रह चुकी थीं। पांच साल में तीन मुख्यमंत्री बनने के बाद 1998 में कांग्रेस की शीला दीक्षित मुख्यमंत्री बनीं और चुनाव जीतकर लगातार तीन बाद मुख्यमंत्री बनीं। बाद में 2013 से केजरीवाल की नवगठित पार्टी ने दिल्ली की सत्ता संभाल ली।
भाजपा के हाथ आया 'इंद्रप्रस्थ'
बहरहाल, लंबे वनवास के बाद भाजपा को एक बार फिर इंद्रप्रस्थ हाथ आया है। उसके सामने मुख्यमंत्री चयन की चुनौती है। अपनी परंपरा को बरकरार रखते हुए लगता है कि वह कोई चौंकाने वाला नाम ही देगी। वैसे पूर्व मुख्यमंत्री साहिब सिंह वर्मा के पुत्र प्रवेश वर्मा भी केजरीवाल को हराकर जाइंट किलर कहे जा रहे हैं। वैसे भी वे पार्टी के वरिष्ठ नेता हैं तथा पूर्व सांसद भी हैं। उनका मध्यप्रदेश से भी नाता है, वे वरिष्ठ भाजपा नेता पूर्व मंत्री , पूर्व नेता प्रतिपक्ष, पूर्व भाजपा प्रदेश अध्यक्ष, पूर्व राज्य सभा सदस्य विक्रम वर्मा के दामाद हैं। उधर दिल्ली के पूर्व उप मुख्यमंत्री मनीष सिसौदिया को हराकर तरविंदर सिंह मारवाह भी जाइंट किलर बन गए हैं।
इससे इतर दिल्ली प्रदेश भाजपा के अध्यक्ष वीरेंद्र सचदेव की मेहनत भी कमतर नहीं आंकी जा सकती। पूर्व अध्यक्ष मनोज तिवारी भी पूर्वांचलियों के नेता बनकर दावेदारों की सूची में शामिल हैं। देखना यह है कि इंद्रप्रस्थ का सिंहासन किसे मिलता है।
सीएम कुर्सी मिले किसी को लेकिन दिल्ली में चलेगी मोदी की ही जिन्होंने अपने विजय संदेश में यमुना की सफाई और आप के भ्रष्टाचार की धुलाई को प्राथमिकता के तौर पर जाहिर कर दिया है। उम्मीद की जाना चाहिए कि दिल्ली अब भारत की विश्व स्तरीय राजधानी बनने की यात्रा शुरू करेगी।
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